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भारत: सह-अस्तित्व की सनातन परंपरा

By Staff Writer March 20, 2026
लेख
भारत: सह-अस्तित्व की सनातन परंपरा
भारत को केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और प्राचीन सभ्यता के रूप में समझा जाता है। यहाँ हजारों वर्षों से विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों और संस्कृतियों के लोग साथ-साथ रहते आए हैं। यही कारण है कि भारत को अक्सर “विविधताओं का देश” कहा जाता है। परंतु इस विविधता के भीतर जो गहरी सांस्कृतिक एकता है, वही इसकी वास्तविक पहचान है। जनसंख्या, भाषा, धर्म, संस्कृति, भोजन, परंपरा और त्योहार—हर स्तर पर भारत में असाधारण विविधता दिखाई देती है, फिर भी यह विविधता किसी विभाजन का कारण नहीं बनती, बल्कि एक साझा सभ्यता के सूत्र में पिरोई हुई दिखाई देती है। यही कारण है कि भारत को “एकता में अनेकता” की जीवंत मिसाल माना जाता है। भारतीय सभ्यता की मूल भावना “वसुधैव कुटुम्बकम्” में निहित है, जिसका अर्थ है—सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। इसी दर्शन ने भारत में सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और विविधता के सम्मान की परंपरा को जन्म दिया। यहाँ अलग-अलग आस्थाओं, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग केवल साथ नहीं रहते, बल्कि एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हुए एक साझा सामाजिक जीवन का निर्माण करते हैं। जनसांख्यिकीय संरचना 2025–2026 के अनुमानों के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.47 अरब से अधिक है, जो इसे विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बनाती है। भारत की जनसांख्यिकीय संरचना युवा, गतिशील और तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ती हुई है। 2026 में भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है, जो यह दर्शाती है कि देश की एक बड़ी आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है। आयु संरचना के अनुसार लगभग 24% आबादी 0–14 वर्ष की है, लगभग 68% लोग 15–64 वर्ष के कार्यशील आयु वर्ग में आते हैं, जबकि 7–8% आबादी 65 वर्ष से अधिक आयु की है। यह संरचना भारत को एक महत्वपूर्ण “डेमोग्राफिक डिविडेंड” प्रदान करती है और भविष्य की आर्थिक तथा सामाजिक संभावनाओं को मजबूत बनाती है। भारत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी पीढ़ियों के बीच ज्ञान का आदान-प्रदान है। भारतीय परिवार व्यवस्था में बच्चे अपने बुज़ुर्गों से संस्कृति, परंपराएँ और जीवन के मूल्य सीखते हैं, वहीं युवा पीढ़ी नई तकनीक और आधुनिक ज्ञान को अपनाकर उसे समाज तक पहुँचाती है। बुज़ुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा मिलकर एक ऐसा सामाजिक संतुलन बनाते हैं जिसमें परंपरा और आधुनिकता दोनों साथ-साथ आगे बढ़ती हैं। इस प्रकार भारत में ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवंत परंपराओं से भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता है। सामाजिक संरचना भारत की सामाजिक संरचना भी अत्यंत बहुरंगी है। यहाँ लगभग 18,000 से अधिक जातियाँ और सामाजिक समूह पाए जाते हैं। अनुसूचित जातियों में 1,100 से अधिक जातियाँ, अनुसूचित जनजातियों में लगभग 744 जनजातियाँ और अन्य पिछड़ा वर्ग में हजारों समुदाय शामिल हैं। इतनी विविध सामाजिक संरचना के बावजूद भारतीय समाज में सह-अस्तित्व और सामंजस्य की परंपरा दिखाई देती है। गाँवों और शहरों में अलग-अलग समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं, काम करते हैं और जीवन के अनुभव साझा करते हैं। धार्मिक दृष्टि से भी भारत असाधारण विविधता का उदाहरण है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन—सभी प्रमुख धर्मों के अनुयायी यहाँ रहते हैं। इस्लाम के भीतर भी अनेक परंपराएँ और पंथ मौजूद हैं। इस्लामी परंपरा में 73 संप्रदायों का उल्लेख मिलता है और भारत उन कुछ स्थानों में से एक है जहाँ इस्लाम के लगभग सभी प्रमुख संप्रदायों के अनुयायी पाए जाते हैं। इसी प्रकार भारत में ईसाई धर्म के भी लगभग सभी प्रमुख संप्रदाय—रोमन कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स तथा प्राचीन सेंट थॉमस ईसाई समुदाय—साथ-साथ निवास करते हैं। अन्य धर्मों और पंथों की भी विविध पहचानें यहाँ बिना किसी विभाजन के सह-अस्तित्व में रहती हैं। यही कारण है कि भारत को धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। भारत की बहुलतावादी परंपरा केवल आधुनिक समय की देन नहीं है, बल्कि इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। प्राचीन विश्वविद्यालयों जैसे तक्षशिला और नालंदा में चीन, तिब्बत, कोरिया और मध्य एशिया से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। यह परंपरा दर्शाती है कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान और विचारों के खुले आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। भाषाई और पाक विविधता भारत की भाषाई विविधता भी अद्भुत है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 121 प्रमुख भाषाएँ और लगभग 19,500 मातृभाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। यह भाषाई विविधता केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक भी है। 1956 में राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया, जो इस बात का उदाहरण है कि भारत ने विविध भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देते हुए राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। भारतीय जीवन में भोजन और जीवन शैली की विविधता भी उतनी ही समृद्ध है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, मध्य और पूर्वोत्तर भारत की अपनी विशिष्ट पाक परंपराएँ हैं। अनुमानतः भारत में 2,000 से अधिक विशिष्ट व्यंजन प्रचलित हैं और लगभग 40 से अधिक प्रकार के मसालों का उपयोग विभिन्न प्रकार के भोजन में किया जाता है। भोजन यहाँ केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, कृषि और संस्कृति का भी दर्पण है। त्योहार और सांस्कृतिक उत्सव भारत को त्योहारों का देश भी कहा जाता है। यहाँ वर्ष के लगभग हर दिन किसी न किसी समुदाय का त्योहार या सांस्कृतिक उत्सव मनाया जाता है। यही कारण है कि भारत की कई सांस्कृतिक परंपराएँ वैश्विक स्तर पर भी मान्यता प्राप्त कर चुकी हैं। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में भारत की अनेक परंपराएँ शामिल हैं—जैसे दुर्गा पूजा (कोलकाता), कुंभ मेला, नौरोज़, मणिपुर का संकीर्तन, लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चार, छऊ नृत्य और राजस्थान के कालबेलिया लोकगीत तथा नृत्य। कुंभ मेला को विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम माना जाता है, जिसमें करोड़ों लोग एक साथ भाग लेते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी अद्भुत उदाहरण है। भारतीय संस्कृति की विशेषता यह भी है कि एक ही त्योहार देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। उदाहरण के लिए दीपावली उत्तर भारत में भगवान राम के अयोध्या लौटने की स्मृति में मनाई जाती है, बंगाल में काली पूजा के रूप में, दक्षिण भारत में नरकासुर वध की कथा से जुड़ी है, जबकि गुजरात और महाराष्ट्र में यह लक्ष्मी पूजा और नववर्ष के रूप में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी प्रकार मकर संक्रांति भी देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों—लोहड़ी, उत्तरायण, पोंगल, भोगाली बिहू और तिल-गुल—के साथ मनाई जाती है। सांस्कृतिक एकता का आधार भारत की सांस्कृतिक एकता का आधार केवल सामाजिक या भौगोलिक नहीं है, बल्कि इसकी गहरी दार्शनिक परंपरा में निहित है। वेदों में कहा गया है—“एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति”, अर्थात सत्य एक है, परंतु ज्ञानी उसे अनेक रूपों में व्यक्त करते हैं। यही विचार भारतीय समाज में विविध आस्थाओं और विचारों के सह-अस्तित्व को संभव बनाता है। भारतीय दर्शन में भगवान राम और भगवान कृष्ण जैसे आदर्श केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि नैतिकता, धर्म और सामाजिक संतुलन के प्रतीक भी हैं। विष्णु के दशावतार—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण (या बलराम), बुद्ध और कल्कि—भारतीय सांस्कृतिक चेतना में धर्म और न्याय की स्थापना के प्रतीक माने जाते हैं। आज भारत की सांस्कृतिक विविधता केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। विश्व के लगभग हर क्षेत्र में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय अपने-अपने त्योहारों, भाषाओं और परंपराओं को जीवित रखते हुए भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर प्रसारित कर रहे हैं। इस प्रकार भारत की विविधता केवल सांख्यिकीय तथ्य नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव है। यहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों और परंपराओं के लोग बिना किसी विभाजन के साथ रहते हैं, अपने-अपने त्योहार मनाते हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखते हुए एक साझा सभ्यता का निर्माण करते हैं। इसीलिए भारत को केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में देखा जाता है— जहाँ अनेक मार्ग हो सकते हैं, परंतु सांस्कृतिक चेतना एक ही रहती है। लेखक परिचय :- डॉ अर्पित कुमार सहायक आचार्य मणिपाल विश्विविद्यालय जयपुर, जयपुर।

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