एपस्टीन प्रकरण: पश्चिमी नैतिकता का टूटता भ्रम
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बलवीर पुंज
February 07, 2026
लेख › वैश्विक राजनीति
हर सभ्यता अपनी कुछ छवियां बनाती और कहानियां गढ़ती है। इसमें वह स्वयं को और दूसरों को बताती है कि उसका मूल उद्देश्य क्या है और वह किन मूल्यों को प्राथमिकता देता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी संस्कृति के द्योतक देशों ने स्वयं को मानवाधिकारों का संरक्षक, कानूनी शासन का आदर्श, लैंगिक समानता का अग्रदूत, आधुनिक नैतिकता का मानक और स्वतंत्रता-अधिकारों का पैरोकार घोषित किया। यह स्वघोषणा केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही; इसे पूरी दुनिया पर थोपने का भी प्रयास किया गया। आर्थिक दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, सांस्कृतिक प्रभुत्व और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य शक्ति— इन सबके माध्यम से पश्चिमी मूल्यों को विश्व पर लागू किया गया। इसमें गैर-पश्चिमी सभ्यताओं को ‘पिछड़ा’ या ‘अप्रगतिशील’ बताकर हाशिए पर रखा गया।
परंतु जेफ्री एपस्टीन संबंधित ‘एपस्टीन फाइल्स’, जिसकी नई खेप— 35 लाख पन्ने, 2,000 वीडियो और डेढ़ लाख से अधिक तस्वीरों को अमेरिकी न्याय विभाग ने गत 30 जनवरी को जारी किया था, उसने उस बनावटी नैतिक मुखौटे को चीरकर रख दिया, जिसे पश्चिमी दुनिया ने स्वयं की छवि के लिए तैयार किया था। अमेरिकी उप-मुख्य न्यायाधीश टॉड ब्लैंच ने इसे एक कानूनी दायित्व बताया, लेकिन वैश्विक प्रतिक्रियाओं से संकेत मिलता है कि यह पश्चिमी सभ्यता का अपने नैतिक संकट से सामना था। अमेरिकी-यूरोपीय मीडिया इसे केवल शक्ति, पैसा और यौन अपराधों के सनसनीखेज मिश्रण के रूप में परोस रहा है। लेकिन इसे केवल एक व्यक्तिगत अपराध के रूप में देखना, वास्तविकता को दबाने का उपक्रम है। एपस्टीन प्रकरण कोई अपवाद नहीं, बल्कि पश्चिमी सभ्यता की आंतरिक विफलताओं, नैतिक द्वंद और पतन का लक्षण है।
जेफ्री एपस्टीन कोई गुमनाम और मामूली अपराधी नहीं था। वह एक संगठित शिकारी था, जिसे राजनीतिक, वित्तीय, शैक्षणिक और राजपरिवार समूहों का संरक्षण प्राप्त था। उस पर 2006 में नाबालिगों के यौन शोषण के आरोप लगे, पर 2008 में उसे असाधारण रूप से कानूनी राहत मिल गई। वर्ष 2019 में वह फिर संघीय यौन तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार हुआ और न्यूयॉर्क की जेल में उसकी मौत को एकाएक “आत्महत्या” घोषित कर दिया गया। इस पर आज प्रश्न उठते हैं।
एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ मुख्यतः अदालती आदेशों पर सामने आए। ये दस्तावेज— उड़ान रिकॉर्ड, संपर्क सूचियां, गवाहियां, बयान और आंतरिक पत्राचार— उस गठजोड़ का विवरण देते हैं, जिसमें एपस्टीन राष्ट्रपति, धनाढ्यों, मीडिया, विश्वविद्यालय, राजघरानों आदि सबके बीच सहज रूप से उठता-बैठता था। यह स्पष्ट है कि दस्तावेजों में केवल नामों का उल्लेख अपराध की पुष्टि नहीं करता, किंतु इस लंपट के आसपास प्रभुत्व हस्तियों का घेरा— पश्चिमी नैतिकता के पतन की ओर इशारा अवश्य करता है। एपस्टीन का विमान, जिसका नाम ‘लोलिता एक्सप्रेस’ था— वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों को उसके निजी द्वीप और आवासों तक ले जाता था।
पश्चिम का दावा है कि कानून के सामने सभी समान हैं, जिसे ‘एपस्टीन फाइल्स’ ध्वस्त कर देती हैं। साधारण नागरिक के लिए न्याय तत्काल और कठोर, और उच्च वर्ग के लिए विलंबित और लचीला— यह असमानता संरचनात्मक समस्या का प्रमाण है। यह सब एकाएक नहीं हुआ है। यह घटनाक्रम उस सांस्कृतिक चिंतन का परिणाम है, जिसमें स्वतंत्रता को जिम्मेदारी से, इच्छाओं को संयम से और अधिकारों को कर्तव्यों से अलग कर दिया गया। जब मानव शरीर का बाजारीकरण, स्वतंत्रता-आधुनिकता के नाम पर वैध ठहराया जाने लगे और वह जीवन का हिस्सा बन जाए, तो वहां सशक्तिकरण का स्थान शोषण-क्रूरता ले लेता है।
‘एपस्टीन फाइल्स’ पश्चिमी आधुनिकता का अपवाद नहीं, बल्कि उसी नैतिक भौंडेपन का तार्किक परिणाम है, जिसमें 40 प्रतिशत अमेरिकी युवा अकेलापन, अवसाद और मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे हैं, जिससे वार्षिक 400–600 सामूहिक गोलीबारी की घटनाओं का जन्म होता हैं। 1960 में केवल 13 प्रतिशत अमेरिकी अकेले रहते थे, जो 2022 में बढ़कर 29 प्रतिशत हो गए। तलाक दर 40–80 प्रतिशत के बीच है, तो एक-तिहाई युवा अमेरिकी अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहते। 2019 में अमेरिकी सरकार ने बुजुर्गों के देखभाल पर 1.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए थे, जिसके 2029 तक दोगुना होने की संभावना है। यही नहीं, “री-होमिंग” नामक भूमिगत आयोजनों से ‘अनचाहे’ बच्चों की परेड कराकर उन्हें नए अभिभावकों तक पहुंचाया जाता है। ये सामाजिक दरारें उसी तथाकथित ‘पश्चिमी मॉडल’ की हैं, जिसे कभी सार्वभौमिक आदर्श माना गया था।
इतिहास भी पश्चिमी नैतिक दावों की असलियत दिखाता है। चर्च प्रेरित इंक्विजिशन में लाखों लोगों को जलाकर और असंख्य महिलाओं को चुड़ैल घोषित कर यातना देकर मार डाला गया था। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में मूलनिवासियों की संस्कृति को ध्वस्त किया गया। भारत में अनुसूचित जातियों-जनजातियों और अमेरिका में अश्वेतों की सांस्कृतिक पहचान छीन ली गई। चर्च प्रेरित संस्थानों में यौन अपराधियों की रक्षा का भी इतिहास रहा है। वर्ष 2004 के जॉन जे रिपोर्ट ने अमेरिका में 4,392 पादरियों के यौन शोषण का खुलासा किया था। ऐसे ही अक्टूबर 2022 में फ्रांसीसी चर्चों में पादरियों द्वारा 3,30,000 बच्चों के यौन शोषण का भंडाफोड़ हुआ था। इस प्रकार के कई मामले है और इसी शृंखला की नई कड़ी ‘एपस्टीन फाइल्स’ हैं।
दुर्भाग्य से औपनिवेशवाद का शिकार रहे भारत सहित कई देशों ने पश्चिमी ढांचे को आधुनिकता समझा। यह सुखद है कि भारत धीरे-धीरे अपनी कालजयी सनातन नैतिकता की ओर से लौट रहा है। गीता का कर्मयोग— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”— को सर्वोपरि मानता है। जब धर्म का पालन किया जाता है, तब दूसरों के अधिकार स्वतः सुरक्षित हो जाते हैं। यहां ‘धर्म’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, जिम्मेदारी का मार्ग है। सूर्य का ‘धर्म’ प्रकाश देना, जल का जीवन देना है। इसी प्रकार पिता, माता, शिक्षक और शासक का ‘धर्म’ उनके दायित्वों को निभाना है। यही नैतिक ढांचा समाज में न्याय, समरसता और अधिकारों को सुनिश्चित करता है।
‘एपस्टीन फाइल्स’ केवल आपराधिक तानाबाना नहीं, बल्कि एक सभ्यता की विफलता हैं। भारत को इससे सीखना चाहिए कि पश्चिम की त्रुटियों को न दोहराएं, बल्कि अपने कर्म, धर्म, संयम और नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित सभ्यतागत विरासत को मजबूत करें।
(स्तंभकार ‘ट्रिस्ट विद अयोध्या: डिकॉलोनाइजेशन ऑफ इंडिया’ और ‘नैरेटिव का मायाजाल’ पुस्तक के लेखक हैं)