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उजड़े आंगन के गुलजार होने की प्रतीक्षा में बीत गए 36 वर्ष, कश्‍मीरी हिन्दुओं का दर्द बरकरार है!

चिनार की छांव में, मंदिरों की घंटियों के साथ इसी आशा के साथ आज का एक दिन ओर गुजर गया….।

By मयंक चतुर्वेदी January 21, 2026
लेख
उजड़े आंगन के गुलजार होने की प्रतीक्षा में बीत गए 36 वर्ष, कश्‍मीरी हिन्दुओं का दर्द बरकरार है!
घर बनाने में वर्षों लग जाते हैं, परंपराएं निभाने में पीढ़ियां गुजर जाती है, लेकिन एक दिन न घर रहे और न वो मंदिर, जहां परंपराओं का निर्वाह होता था, तब जो कष्‍ट होता है, उस का वर्णन शायद ही कोई कर पाए। कश्‍मीरी हिन्दुओं ने जानें गंवाईं, घर छोड़े, मंदिर छोड़े लेकिन आशा नहीं छोड़ी। उन्हें अब भी लगता है कि उनका वह उजड़ा आंगन एक दिन जरूर गुलजार होगा, वे लौटेंगे। कहने को इस्‍लामिक जिहादी हिंसा को समाप्त‍ हुए 36 वर्ष गुजर चुके हैं, जम्‍मू-कश्‍मीर से धारा 370 भी हट चुकी है, अब कोई भी कश्‍मीर में आशियाना बना सकता है, लेकिन इसके बाद भी हिन्दुओं के जीवन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। पता नहीं फिर कब वो इस्लामिक आंधी चल पड़े और फिर से वे विस्‍थापन का दर्द सहने के लिए जानमाल के नुकसान के साथ विवश कर दिए जाएं। यह दर्द बड़ा भयंकर है। वो सर्द जनवरी की रात थी- 19 जनवरी 1990। कश्मीर घाटी में बिजली गुल हो चुकी थी। मस्जिदों को छोड़कर हर तरफ अंधेरा पसर गया था। लाउडस्पीकरों पर गूंज रही थीं भड़काऊ आवाजें; “काफिरो, कश्मीर छोड़ो, वरना कब्रों में दफन हो जाओ!” घाटी की कई मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से कश्मीरी हिन्दुओं के विरुद्ध सांप्रदायिक नारे और धमकियां गूंज रही थीं। नारे लगाए जा रहे थे, “असि गछी पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान" (हमें पाकिस्तान चाहिए, हिन्दू पुरुषों के बिना और उनकी औरतों के साथ) और “रलिव, गलिव या चलिव” (इस्लाम में शामिल हो जाओ, मर जाओ या यहाँ से भाग जाओ)। राधिका देवी के घर में सन्नाटा था। श्रीनगर के अनंतनाग क्षेत्र में बसा उनका छोटा-सा घरौंदा, जहां हर मकर संक्रांति पर ठंडी चाय और गर्माहट भरी बातें होती थीं, आज खौफ से थरथरा रहा था। पिता ने जल्दी से मां को आवाज दी, “सबको उठाओ, भागना होगा।” बस एक रात में, वो सब छोड़कर भागे- घर, मंदिर, परंपराएं। राधिका तब 12 साल की थी। आज 48 की हो चुकी है, लेकिन उस रात का दर्द आज भी ताजा है। यह कहानी सिर्फ राधिका की नहीं, बल्कि 3-5 लाख कश्मीरी हिन्दुओं की है। 1989 के अंत से शुरू हुई इस्लामिक जिहादी हिंसा ने धीरे धीरे पूरी घाटी को अपने आगोश में ले लिया। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) जैसे संगठनों ने अलगाववाद को हवा दी। भाजपा नेता टीका लाल टपलू की उनके घर के बाहर हत्या कर दी गई। यह कश्मीरी हिन्दुओं के विरुद्ध शुरू हुई लक्षित हत्याओं (Targeted Killings) का पहला बड़ा मोड़ था। भारतीय वायुसेना के अधिकारियों पर हमला भी उग्रवाद के शुरुआती चरम का हिस्सा था। 25 जनवरी 1990 को रावलपोरा में वायुसेना के अधिकारियों पर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना सहित चार जवान बलिदान हुए थे। इस हमले का मुख्य आरोपी जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक था। वीआरसी भट्ट (मार्च 1990), सरवानंद कौल प्रेमी (सितंबर 1990), इस तरह एक के बाद एक कुल 399 हिन्दुओं की हत्या कर दी गई, 650 पर हमले हुए। अनुमानित 1,08,000 परिवारों ने घाटी छोड़ी और जम्मू, दिल्ली, उज्जैन जैसे स्थानों पर शरण ली। राधिका अब जम्मू के जगती कैंप - कश्मीरी हिन्दुओं के सबसे बड़े शरणार्थी शिविर में रहती हैं। यहां 5,000 से अधिक परिवार रह रहे हैं। राधिका आंसू पोंछते हुए बताती हैं- परंपराओं का निर्वाह! पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन काला मटका, हरतालिका तीज जैसी रस्में अब यादों में सिमट गई हैं। बच्चे पैदा होते हैं, लेकिन कश्मीरी संस्कृति भूलते जाते हैं। एक सर्वे के अनुसार, 70% युवा हिन्दू घाटी की बोली तक भूल चुके हैं। राधिका की बेटी नेहा स्कूल जाती है, लेकिन सपने देखती है श्रीनगर की डल झील के। “मां, कब लौटेंगे?” वो पूछती है। राधिका चुप हो जाती हैं। घर बनाने में वर्ष लगते हैं, परंपराएं निभाने में पीढ़ियां, लेकिन एक दिन सब उजड़ जाए, तो वो दर्द फिर शब्दों से परे हो जाता है। वहां सिर्फ मौन आह है। आज भी उजड़े कश्मीरी हिन्दू उस इस्लामिक आंधी को याद कर सिहर उठते हैं। सरकार ने 2025 में कश्मीरी हिन्दू पुनर्वास नीति की घोषणा की, लेकिन कुछ नहीं हुआय। 2026 तक, 25,000 नौकरियां देने का वादा अब भी अधर में है। 5 अगस्त 2019 को धारा 370 हट गई। अब कोई भी भारत का नागरिक कश्मीर में जमीन खरीद सकता है। लेकिन उजाड़ दिए गए हिन्दुओं की वापसी? सिर्फ 6,000 परिवार लौटे, वो भी कंपनियों में नौकरियां लेकर। 2023 तक, घाटी में सिर्फ 4,000 हिन्दू बचे। 2022 में आतंकी हमलों में 20 हिन्दू मारे गए। वर्ष 2023, 24 और 2025 में लक्षित हिंसा जारी है, हिन्‍दू अब भी मारे जा रहे हैं। कश्मीरी हिन्दुओं का पलायन 1990 में घाटी से हुआ था, जब अलगाववादी शक्तियों और हिंसा के कारण हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा। आज भी कई परिवार जम्मू और अन्य जगहों पर शरणार्थी कैंपों में रह रहे हैं। ऐसे में फिल्ममेकर और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पंडित ने इसी दर्द को एक बार फिर उकेरा है। इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट कर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की है। “36 वर्ष हो गए, हम अब भी शरणार्थी हैं। जगती कैंप दयनीय है। एक उच्च स्तरीय समिति बनाएं, जिसमें वरिष्ठ नेता हों। वो कैंप जाएं, आवश्यकताएं समझें, सुविधाएं दें।” अशोक पंडित ने याद दिलायी, 18-19 जनवरी 1990 की वो आधी रात, जब बिजली कटी, मस्जिदों से धमकियां गूंजीं। फिर भी, आशा बाकी है। नेहा जैसे युवा सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे हैं। अशोक पंडित जैसे कार्यकर्ता इस पर व्‍यापक कार्य एवं संवाद की बात कह रहे हैं। शायद; इस पर कोई समिति बन जाए, कोई जगती के कैंप में जाए और वो चमत्कार हो जाए, जिसकी प्रतीक्षा पिछले 36 वर्षों से हर कश्‍मीरी हिन्दू को है, घर वापसी की। तब तक उनका दर्द बरकरार है। वो दर्द जो परंपराओं से दूर होने का, विस्थापन का, अनंत प्रतीक्षा का है। एक दिन अवश्य लौटेंगे, अपनी धरती पर। चिनार की छांव में, मंदिरों की घंटियों के साथ इसी आशा के साथ आज का एक दिन ओर गुजर गया….।

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