क्या पीड़ित की पहचान तय करती है संवेदना?
By
अखिलेश चौधरी
June 01, 2026
लेख
कौन कहेगा कि रहते हैं कलमनवीस भी इधर,
सन्नाटा इतना पसरा है जब भवनों में!
यह पंक्तियाँ आज केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान समय के तथाकथित बुद्धिजीवियों और मीडिया विमर्श पर एक गम्भीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी हैं। प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकार, लेखक या बुद्धिजीवी किस विचारधारा को मानते हैं। प्रश्न यह है कि क्या उनकी सम्वेदनशीलता और मुखरता भी अब विचारधारा के पैमाने से तय होने लगी है?
देश की राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद एवं नोएडा में देश के अनेकों प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, स्तम्भकार, जनमत-निर्माता और सामाजिक विश्लेषक रहते हैं। ये वही लोग हैं जो राष्ट्रीय राजनीति से लेकर अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं तक पर अपनी प्रखर राय रखते हैं। किसी राजनीतिक विवाद, किसी सामाजिक आन्दोलन, किसी कथित अन्याय या किसी अल्पसंख्यक मुद्दे पर उनकी कलम तुरन्त चल पड़ती है। सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखे जाते हैं, टीवी डिबेट्स में तीखी बहसें होती हैं और समाचार पत्रों में लम्बे-लम्बे लेख प्रकाशित होते हैं।
लेकिन जब गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में एक हिन्दू युवक सूर्या की चाकू गोदकर नृशंस हत्या कर दी जाती है, तब वही आवाजें अचानक मौन क्यों हो जाती हैं?
समाचारों के अनुसार, ईद के दिन सूर्या की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। एक हंसते-खेलते परिवार का संसार उजड़ गया और स्थानीय समाज में आक्रोश फैल गया। लेकिन राष्ट्रीय विमर्श में इस घटना को वह स्थान या न्याय नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जानी चाहिए थी।
यहीं से यह यक्ष प्रश्न उठता है कि क्या हमारे देश में पीड़ित की पहचान उसके प्रति मिलने वाली सम्वेदना का आधार बनने लगी है?
अभी हाल ही में एक राजनीतिक दल के नेता पर हुए जनविरोध को लेकर देशभर में विमर्श का वातावरण बनाया गया। उसे लोकतंत्र पर हमला, राजनीतिक असहिष्णुता और सार्वजनिक मर्यादा के पतन का प्रतीक बताया गया। आश्चर्य यह है कि यही बौद्धिक वर्ग तब प्रायः मौन रहता था, अथवा ऐसी घटनाओं को जनभावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति कहकर उनका औचित्य सिद्ध करता था, जब विरोध का लक्ष्य उनके राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वी हुआ करते थे। सिद्धान्त यदि परिस्थितियों और चेहरों के अनुसार बदल जाएँ, तो वे सिद्धान्त नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा के उपकरण मात्र रह जाते हैं।
लेकिन क्या एक सामान्य नागरिक या युवक की हत्या, लोकतंत्र की चिन्ता से कम महत्वपूर्ण है?
यदि किसी राजनेता के साथ हुई अभद्रता राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन सकती है, तो एक साधारण हिन्दू परिवार के युवक की नृशंस हत्या भी राष्ट्रीय सम्वेदना और चिन्ता का केन्द्र बननी चाहिए। आखिर लोकतंत्र केवल किसी विशेष वर्ग, विचारधारा या राजनीतिक दल के नेताओं के लिए नहीं, बल्कि उन करोड़ों सामान्य नागरिकों के लिए भी है, जिनके जीवन, सुरक्षा और न्याय की रक्षा ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक कसौटी होती है।
समस्या तब पैदा होती है जब समाज को यह साफ महसूस होने लगता है कि कुछ घटनाओं को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है और कुछ घटनाओं को कालीन के नीचे छुपाकर भुला दिया जाता है। जब ऐसा भेदभाव होता है, तो पत्रकारिता की निष्पक्षता और उसकी साख पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
आज देश के सामान्य नागरिक के मन में यही प्रश्न है कि क्या सम्वेदना भी अब वैचारिक चश्मे से देखी जाने लगी है?
इस पूरे प्रकरण ने एक और कटु सत्य को पुनः उजागर किया है। आज समाज में मोटे तौर पर तीन प्रकार की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। एक वर्ग ऐसा है जिसकी संवेदनाएँ प्रायः वैचारिक आग्रहों और पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से संचालित होती प्रतीत होती हैं। दूसरा वर्ग राष्ट्र, संस्कृति, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करता है। किन्तु सबसे बड़ी चिंता उस तीसरे और सबसे बड़े वर्ग को लेकर है, जो अधिकांश सामाजिक, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रश्नों के प्रति तब तक उदासीन बना रहता है, जब तक उनका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके अपने जीवन पर न पड़ने लगे।
यही मूक और निष्क्रिय वर्ग समाज की सबसे बड़ी विडंबना भी है। उसे किसी सामाजिक अन्याय, राष्ट्रीय चुनौती अथवा किसी निर्दोष व्यक्ति की पीड़ा से विशेष सरोकार नहीं होता, जब तक कि संकट उसके अपने द्वार तक न पहुँच जाए। वह अपने सुरक्षित परिवेश में रहकर घटनाओं को दूर से देखता है, उनसे स्वयं को असंबद्ध मानता है और सार्वजनिक जीवन के दायित्वों से प्रायः विमुख रहता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ उसके अपने जीवन को प्रभावित करती हैं, तब अचानक उसकी चेतना जागृत होती है और वह अपेक्षा करता है कि सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र और वे सभी संगठन उसके समर्थन में खड़े हों, जिनकी आवश्यकता और महत्ता को उसने पहले कभी गंभीरता से नहीं समझा था।
वास्तव में यह उदासीनता केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति के क्षरण का कारण बनती है। कोई भी समाज केवल सक्रिय और सजग नागरिकों के बल पर ही सुरक्षित, संगठित और समर्थ बनता है। जब समाज का बड़ा वर्ग अपने समय की चुनौतियों के प्रति उदासीन हो जाता है, तब समस्याएँ धीरे-धीरे विकराल रूप धारण कर लेती हैं। इसलिए केवल अन्याय होने पर प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है बल्कि अन्याय की सम्भावना के प्रति भी समय रहते सजग होना उतना ही आवश्यक है।
यदि पीड़ित बहुसंख्यक समाज से न होकर किसी विशेष वर्ग का हो, तो राष्ट्रीय बहसें शुरू हो जाती हैं। यदि आरोपी किसी विशेष पृष्ठभूमि का हो, तो मीडिया और बुद्धिजीवियों द्वारा शब्दों का चयन अत्यंत सावधानी से 'कथित' और 'अज्ञात' जैसे आवरणों में किया जाता है। लेकिन यदि पीड़ित हिंदू हो, उसका परिवार साधारण हो और उसके पीछे कोई राजनीतिक वोटबैंक या विखंडनकारी ताकतों की शक्ति न हो, तब क्या उसकी पीड़ा उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती?
यह प्रश्न किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है। अपराधी का कोई धर्म नहीं होता और अपराध को केवल अपराध के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन यही सिद्धांत तब भी समान रूप से लागू होना चाहिए जब पीड़ित हिंदू हो। न्याय का तराजू कभी एकतरफा नहीं हो सकता।
सूर्या की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और बाद में मुख्य आरोपी असद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। कानून-व्यवस्था की दृष्टि से यह त्वरित कार्रवाई चर्चा का विषय बनी। लेकिन विमर्श का इससे भी बड़ा विषय यह होना चाहिए था कि आखिर एक युवा जान क्यों गई? समाज में ऐसी हिंसक और कट्टरपंथी मानसिकता क्यों विकसित हो रही है, जहाँ छोटी-छोटी बातों पर हत्या जैसी जघन्य वारदातें हो जाती हैं? मुख्यधारा का मीडिया अक्सर मूल घटना और पीड़ित परिवार की त्रासदी को छोड़कर केवल मुठभेड़ की कानूनी बारीकियों और मानवाधिकारों पर बहस करने लगता है, जिससे न्याय का मूल उद्देश्य ही भटक जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि इस मूल प्रश्न और पीड़ित परिवार के दर्द पर अपेक्षित विमर्श नहीं हुआ।
आज सोशल मीडिया के इस दौर में जनता सब कुछ देख रही है। लोग तुलना कर रहे हैं। वे यह भी देख रहे हैं कि किस घटना पर कौन छाती पीट रहा है और किस घटना पर किसने रहस्यमयी मौन साध रखा है। यही कारण है कि मुख्यधारा के मीडिया और छद्म बुद्धिजीवियों के प्रति आम जनता का अविश्वास लगातार बढ़ता जा रहा है।
पत्रकारिता की असली शक्ति उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता में होती है। यदि कोई पत्रकार किसी विशेष विचारधारा का समर्थक है, तो यह उसका व्यक्तिगत अधिकार हो सकता है। लेकिन जब वे स्वयं को निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ घोषित करके केवल चुनिंदा मुद्दों पर ही सक्रिय दिखाई देते हैं, तब जनता की अदालत में उनसे प्रश्न पूछा जाना अनिवार्य हो जाता है।
सूर्या की हत्या का प्रकरण केवल एक साधारण आपराधिक घटना भर नहीं है। समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि यह उस कट्टरपंथी और असहिष्णु मानसिकता का परिणाम है, जो समय-समय पर सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों के समक्ष चुनौती बनकर खड़ी होती है। यही कारण है कि इस घटना ने सामान्य कानून-व्यवस्था के दायरे से आगे बढ़कर एक व्यापक सामाजिक विमर्श को जन्म दिया है।
आम नागरिक के मन में अब यह भावना घर कर चुकी है कि उसकी पीड़ा और उसकी चिंताएँ तब तक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनतीं, जब तक वे किसी पूर्वनिर्धारित राजनीतिक नैरेटिव, वैचारिक अभियान अथवा चुनावी समीकरण में फिट न बैठती हों। विशेष रूप से तब, जब विषय हिंदुत्व, भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं, ऐतिहासिक धरोहरों या बहुसंख्यक समाज की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा हो, तो कई प्रभावशाली मंचों पर एक अजीब सी उदासीनता और उपेक्षा दिखाई देती है।
यही दोहरा मापदंड समाज के एक बड़े वर्ग में उपेक्षा और असमानता की भावना को जन्म देता है। जब किसी समुदाय की वास्तविक पीड़ा को मुख्यधारा में स्थान नहीं मिलता, तो अविश्वास की खाई और अधिक गहरी होने लगती है तथा सामाजिक दूरी बढ़ने लगती है।
जबकि भारत की सभ्यता का मूल सिद्धांत इसके ठीक विपरीत रहा है। हमारी सांस्कृतिक दृष्टि सदैव पीड़ित, वंचित और अन्याय के शिकार व्यक्ति के साथ खड़े होने की रही है—चाहे उसकी जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। यदि हम इस 'सर्वभूतहिते रताः' की मूल भावना से विचलित होते हैं, तो समाज में विभाजन, कटुता और परस्पर अविश्वास की खाई और अधिक गहरी होती चली जाएगी।
सूर्या अब वापस नहीं आएगा। उसके परिवार का यह शून्य शायद कभी नहीं भरेगा। लेकिन इस घटना ने आधुनिक समाज के सामने एक बड़ा और कड़वा प्रश्न अवश्य छोड़ दिया है कि क्या हम वास्तव में हर पीड़ित के लिए समान रूप से खड़े हैं, या हमारी संवेदनाएँ भी अब उसका नाम, जाति, पंथ और वैचारिक पहचान देखकर तय होती हैं?
जब तक इस प्रश्न का एक ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक यह सन्नाटा केवल खोड़ा की गलियों में नहीं, बल्कि हमारी पत्रकारिता, बौद्धिकता और सार्वजनिक विमर्श की आत्मा में भी गूंजता रहेगा।