Breaking News
VSK Foundation Jaipur Logo - विश्व संवाद केंद्र जयपुर
विश्व संवाद केंद्र, जयपुर ( VSK Foundation Jaipur )

क्या एनसीईआरटी संसद से भी ऊपर नया प्रतीक गढ़ रही है?

सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान या भय?

By मयंक चतुर्वेदी July 12, 2026
लेख
क्या एनसीईआरटी संसद से भी ऊपर नया प्रतीक गढ़ रही है?
भारत की संसद सर्वोपरि है, वे महापुरुष भी सर्वोपरि हैं- जिनके कारण से भारत वास्‍तव में आज भारत है, वह उन महान नेताओं और त्‍यागी पुरुषों एवं स्‍त्री शक्‍ति के बलिदान का परिणाम है, जिन्‍होंने स्‍वाधीनता आन्‍दोलन में अपना र्स्‍वस्‍व दिया और नए भारत के निर्माण में आगे भी अपना पूर्ण योगदान दिया है, किंतु जो कृत्‍य राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा संशोधित कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के आवरण पर संसद के स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय को सबसे प्रमुख दृश्य के रूप में दर्शा कर किया गया है, उससे लगता है कि या तो एनसीईआरटी में उस स्‍तर के विद्वान नहीं है, जो इस महत्‍व को समझें या फिर सर्वोच्च न्यायालय का भय उसके ऊपर इतना हावी हो चुका है कि वह सत्‍य को, सत्‍य भी स्‍वीकार नहीं कर पा रही है! क्‍या इस बात को कोई नकार सकता है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है और नागरिकों के अधिकारों की अंतिम प्रहरी भी? वस्‍तुत: यह हम सभी के लिए बहुत ध्‍यान रखने योग्‍य है कि सम्मान और भय के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। जब किसी संस्था के सम्मान में संतुलन खोने लगे और उसकी छाया राष्ट्रीय प्रतीकों पर पड़ने लगे, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है। यही कारण है जोकि आज राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक का नया आवरण ठीक ऐसे ही प्रश्नों को जन्म दे रहा है! पिछले संस्करण में संसद और सर्वोच्च न्यायालय दोनों को अपेक्षाकृत संतुलित स्थान दिया गया था। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक महानायक, भारत की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक भारत के प्रतीक भी साथ दिखाई देते थे, किंतु अब जो नया संशोधित संस्करण सामने आया है उसमें सर्वोच्च न्यायालय सबसे ऊपर और सबसे प्रमुख दृश्य के रूप में उभरता है, जबकि संसद नीचे चली गई है। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों के चित्र भी गायब हो गए हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या यह डिजाइन का परिवर्तन है? या फिर यह प्रतीकों के माध्यम से इतिहास और लोकतंत्र की नई व्याख्या करने का प्रयास है? अथवा पूर्व सामने आए प्रकरण से एनसीईआरटी पूरी तरह से सर्वोच्‍च न्‍यायालय से भय आक्रांत है?

भारत संसद से चलता है, न्यायपालिका से नहीं

वस्‍तुत: भारतीय लोकतंत्र का मूल स्रोत न्यायपालिका कभी नहीं हो कसती है, क्‍योंकि वह जनता को न्‍याय दिलाने केा माध्‍यम है न कि जनता की सीधी अथवा अप्रत्‍यक्ष प्रतिनिधि, जबकि जनता अपनी संप्रभु इच्छा संसद के माध्यम से व्यक्त करती है, इसलिए ही यही संसद संविधान में संशोधन करती है, कानून बनाती है, सरकार को उत्तरदायी बनाती है और राष्ट्रीय नीतियों की दिशा तय करती है। यहां तक कि यदि संसद चाह ले तो एक झटके में सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम प्रणाली को वह ध्‍वस्‍त कर सकती है। हालांकि अभी कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है, किंतु यदि सरकार सीधे अपने स्‍तर पर संसद से जजों की नियुक्‍ति के लिए कोई प्रावधान लेकर आ जाए तो उसे स्‍वीकार करना सर्वोच्‍च न्‍यायालय का काम है, उसमें फिर कोई किंतु और परन्‍तु नहीं है। फिर इसमें कोई कितनी भी पीआईएल लगा ले, सर्वोच्‍च न्‍यायालय संसद के निर्णय के बाहर कोई निर्णय नहीं दे सकती है। ध्‍यान रहे- न्‍यायालय का दायित्व संविधान की रक्षा करना है, शासन चलाना नहीं है। यह जानते हुए भी एनसीईआरटी संसद से ऊपर सर्वोच्‍च न्‍यायालय को रख रही है! इसलिए जब किसी विद्यालय की पाठ्यपुस्तक के आवरण पर सर्वोच्च न्यायालय को संसद से अधिक प्रमुख रूप में दिखाया जाता है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विद्यार्थियों के मन में लोकतंत्र की कौन-सी प्रतीकात्मक संरचना स्थापित की जा रही है? वस्‍तुत: इसे आप न्यायपालिका का विरोध नहीं समझें, क्‍योंकि यह तो लोकतांत्रिक संतुलन का प्रश्न है। फिर यहां सबसे अधिक चिंता उस तथ्य पर भी होनी चाहिए कि नए आवरण से भगत सिंह, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, बाल गंगाधर तिलक, अरबिंदो, सरोजिनी नायडू, सावित्रीबाई फुले, कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसे अनेक राष्ट्रनिर्माताओं के चित्र हटा दिए गए हैं। क्या भारत की अगली पीढ़ी को यह संदेश दिया जाएगा कि राष्ट्र के निर्माण में इन महापुरुषों और महान महिलाओं की दृश्य उपस्थिति अब पहले जितनी आवश्यक नहीं रही? क्‍या हमें सदैव यह याद नहीं रखना चाहिए कि भारत की स्वतंत्रता किसी न्यायालय के आदेश से नहीं मिली थी। वह लाखों ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारियों, सत्याग्रहियों, समाज सुधारकों, किसानों, महिलाओं और युवाओं के त्याग और बलिदान से प्राप्त हुई थी? वस्‍तुत: आज संसद इसलिए है क्योंकि पहले स्वतंत्र भारत का स्वप्न था, संविधान इसलिए है क्योंकि पहले स्वतंत्रता का संघर्ष था और इसके साथ ही यह सर्वोच्च न्यायालय भी इसलिए हमारे सामने मौजूद है क्योंकि पहले एक स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आया। अब यदि राष्ट्र की स्मृति से उसके निर्माता ही धीरे-धीरे दृश्य रूप से अनुपस्थित होने लगें, तब फिर इसे क्‍यों न राष्ट्रीय चेतना की दिशा बदलने वाला संकेत माना जाए ?

एक विवाद एवं निर्णय ने बदला पूरा स्वरूप

यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि यह परिवर्तन सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुआ है। पूर्व संस्करण में "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" शीर्षक वाला खंड प्रकाशित हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया। पुस्तक वापस ली गई। एनसीईआरटी ने माफी मांगी। अध्याय फिर से लिखा गया। यहीं तक बात रहती तो इसे सामान्य शैक्षणिक संशोधन कहा जा सकता था, किंतु जब उसी के बाद प्रकाशित संस्करण में न्यायपालिका से जुड़े आलोचनात्मक हिस्से हटा दिए जाते हैं, सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक भूमिका का विस्तार किया जाता है और पुस्तक के आवरण पर भी उसी संस्था को सबसे प्रमुख दृश्य बनाया जाता है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह शैक्षणिक पुनर्समीक्षा है, या संस्थागत अति-सावधानी का परिणाम? सम्मान और भय में अंतर समझना होगा यह सच है और सर्वमान्‍य स्‍वीकार्य भी कि किसी भी लोकतंत्र में न्यायपालिका सम्मान की पात्र होती है, किंतु यदि किसी संस्था की आलोचनात्मक चर्चा ही समाप्त होने लगे, उसके प्रति केवल प्रशंसात्मक प्रस्तुति रह जाए और प्रतीकों में भी वही सर्वोपरि दिखाई देने लगे, तो लोकतांत्रिक विमर्श का संतुलन कैसे बचा रह सकता है ? निश्‍चित ही इसका प्रभावित हो जाना लाजमी है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि लोकतंत्र किसी संस्था के प्रति भय पर नहीं चलता। लोकतंत्र प्रश्न पूछने की संस्कृति से मजबूत होता है। यदि कोई शैक्षणिक संस्था न्यायालय के निर्णय का पालन करती है, तो यह उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है, किंतु यदि पालन की प्रक्रिया में वह अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता और प्रतीकात्मक संतुलन भी खो दे, तो उस पर प्रश्न उठना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

एनसीईआरटी से अपेक्षा अधिक है

अब यह एनसीईआरटी को भी समझना होगा कि वह सिर्फ पाठ्यपुस्तकें छापने वाली संस्था नहीं है। भारत की आने वाली पीढ़ियों के मन में राष्ट्र का पहला बौद्धिक नक्शा तैयार करनेवाली वह एक ज्ञान की सर्वोच्‍च संस्‍था है।ऐसी संस्था से अपेक्षा होती है कि वह किसी भी संवैधानिक संस्था के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए लोकतंत्र की संपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करे। जिसमें कि सर्वोपरि संसद ही रहेगी। ऐसे में उसके द्वारा भारतीय संसद के बाद क्रमश: संविधान, न्यायपालिका, स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक सुधार आंदोलनों, वैज्ञानिक उपलब्धियों और सांस्कृतिक विरासत इस क्रम में सभी को संतुलित रूप से स्थान देना चाहिए। वस्‍तुत: तभी विद्यार्थी भारत को उसकी वास्तविक व्यापकता में समझ पाएंगे।

लोकतंत्र में सर्वोच्च कौन?

इस प्रश्न का उत्तर भारतीय संविधान स्वयं यह कहकर देता है- "हम भारत के लोग।" जनता अपनी संप्रभुता संसद के माध्यम से व्यक्त करती है। संसद कानून बनाती है और न्यायपालिका उन कानूनों और कार्यपालिका की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करती है। इस तरह से दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, किंतु प्रतिस्पर्धी नहीं, इसलिए शिक्षा में भी किसी एक संस्था को ऐसा प्रतीकात्मक स्थान नहीं मिलना चाहिए जिससे लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित होता हुआ प्रतीत हो।

अंतिम प्रश्न

एनसीईआरटी के नए आवरण को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय को सम्मान क्यों मिला। प्रश्न यह है कि क्या उस सम्मान की कीमत पर संसद की प्रतीकात्मक उपस्थिति कम हो गई? क्या स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों की दृश्य स्मृति कमजोर हुई? और क्या आने वाली पीढ़ियों को भारत की लोकतांत्रिक संरचना का संतुलित चित्र मिल पाएगा? एनसीईआरटी भी समझे, लोकतंत्र की रक्षा अकेले संविधान की धाराओं से नहीं होती; वह उन प्रतीकों से भी होती है जो बच्चों के मन में राष्ट्र की पहली छवि बनाते हैं, इसलिए आवश्यक है कि सम्मान बना रहे, भय कभी शिक्षा का आधार न बने; न्यायपालिका का गौरव अक्षुण्ण रहे, पर संसद, संविधान-निर्माताओं, स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनिर्माताओं की ऐतिहासिक भूमिका भी उसी गरिमा के साथ अगली पीढ़ी के सामने उपस्थित रहे, जिसके कि वे वास्‍तविक हकदार हैं।

Related Articles

बंगाल की आत्मा की वापसी: लोकतांत्रिक परिवर्तन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय एकात्मता का जनादेश

2026 के चुनाव परिणामों में अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और भारत की आध्यात्मिक परंपरा का पुनरुत्थान

Jun 22, 2026