क्रांतिकारी विचार और वैचारिक क्रांति : आधुनिक भारत के संदर्भ में भगत सिंह
विशेष: 28 सितंबर - सरदार भगत सिंह के जन्मदिन के अवसर पर
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डॉ. अविनाश पंवार
September 28, 2026
लेख › समसामयिक
जब 23 मार्च1931 को युवा क्रांतिकारी त्रयी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के सर्वोच्च बलिदान से संपूर्ण भारत उद्वेलित था, तब इस फांसी के 2 माह बाद ही उनके अनन्य साथी और क्रांतिकारी जितेंद्र नाथ सान्याल ने एक प्रामाणिक और अत्यंत प्रेरक जीवनी लिखी—'सरदार भगत सिंह'(संदर्भ: जितेंद्र नाथ सान्याल, 'सरदार भगत सिंह', 1931)। इस ग्रंथ के प्रकाशित होते ही अंग्रेजी सत्ता में हड़कंप मच गया। ब्रिटिश प्रशासन ने इसे इतना संकटपूर्ण और राजद्रोहात्मक माना कि न केवल पुस्तक पर तत्काल प्रतिबंध लगाकर उसकी प्रतियां जब्त कर ली गईं, अपितु लेखक जितेंद्र नाथ सान्याल को भी कारागार में डाल दिया गया। अंग्रेजी हुकूमत को भय था कि यह जीवनी भारतीय युवाओं के भीतर क्रांति की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित कर देगी जिसे बुझाना असंभव होगा।
जितेंद्र नाथ सान्याल के इस प्रतिबंधित ग्रंथ तथा कालांतर में भगत सिंह जी की भतीजी डॉ. वीरेंद्र संधू द्वारा संकलित परिवार के दुर्लभ संस्मरणों और दस्तावेजों के माध्यम से भगत सिंह जी के बाल्यकाल, पारिवारिक पृष्ठभूमि और खेत में बंदूक बोने से लेकर फांसी तक की यात्रा और उनके आजीवन रहे संकल्पजिन पृष्ठों पर उकेरे गए वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम की अनमोल धरोहर हैं (संदर्भ: डॉ. वीरेंद्र संधू, 'युगदृष्टा भगत सिंह और उनके साथी')।
'भागों वाले' का अवतरण और पारिवारिक संस्कार
28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा ग्राम में जब इस बालक का जन्म हुआ, तब उस परिवार में केवल एक शिशु का आगमन नहीं हुआ था, अपितु एक आलौकिक संयोग घटित हुआ था। उसी दिन बालक के पिता सरदार किशन सिंह जी और चाचा अजीत सिंह जी —जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता की जड़ें हिलाने वाले 'पगड़ी संभाल जट्टा' कृषक आंदोलन का नेतृत्व किया था—कारागार से मुक्त होकर घर लौटे थे। और उधर उनके दूसरे चाचा स्वर्ण सिंह बर्मा में मांडले जेल में कारावास की यातनाएं सह रहे थे उनको भी बरी करने के आदेश हो गए थे।
घर में दुगुनी प्रसन्नता देखकर दादी जयकौर ने नवजात को गोद में उठाकर दुलारते हुए कहा था—"ए तां वड्डा भागों वाला ए" (यह तो बड़े भाग्य वाला है)। इसी आधार पर बालक का नाम 'भगत सिंह' रखा गया। जो प्रांगण देशभक्ति के गीतों, निर्वासन की पीड़ा और कारावास की गाथाओं से गूंजता हो, वहाँ पलने वाले बालक के अंतःकरण में स्वाधीनता केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, अपितु जीवन के आरंभिक संस्कारों में घुट्टी के साथ ही घुल गई।
बाल्यकाल:स्वतंत्रता संकल्प का बीजारोपण
भगत सिंह की प्रखर राष्ट्रभक्ति किसी तात्कालिक उत्तेजना का परिणाम नहीं थी, अपितु बचपन से सींचा गया एक सुदृढ़ संकल्प थी। पारिवारिक संस्मरणों में प्राथमिक शिक्षा के समय का वह प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है, जब खेत में उनके पिता सरदार किशन सिंह जी अपने घनिष्ठ मित्र मेहता आनंद किशोर के साथ आम के नए पौधे लगा रहे थे । 3-4 साल का भगत साथ था। तभी मेहता जी का ध्यान नन्हे भगत पर गया। भगत सिंह एक कोने में बैठकर अपनी छोटी छोटी उंगलियों से मिट्टी में नन्हे नन्हे गड्ढे कर पास में पड़ी छोटी-छोटी डंडियों को एक-एक कर उनमेंगाड़ रहा था । जब पूछा गया कि क्या कर रहे हो तो बालक भगत ने कहा मैं बंदूकें बो रहा हूँ ताकि धरती से बहुत सारी बंदूकें उगें और अपने देश को इन फिरंगियों से आजाद करा सकूँ।’ यह केवल बचपन का खेल नहीं था, बल्कि उनके भीतर सुलगती आजादी की पहली चिंगारी थी(संदर्भ: जितेंद्र नाथ सान्याल, 'सरदार भगत सिंह')। मित्रों को लेकर फिरंगियों को देश से भगाने का खेल खेलना उन्हें अत्यंत प्रिय था।
जलियांवाला बाग और चेतना का विस्तार
पराधीनता का यह दंश उनके बाल-मन पर कितना गहरा था, इसका प्रमाण 13 अप्रैल 1919 को मिला। जलियांवाला बाग में निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाकर हृदय विदारक भीषण हत्याकांड किया गया। उस समय भगत सिंह की आयु मात्र बारह वर्ष थी। इस वीभत्स घटना की सूचना मिलते ही भगत सिंह विद्यालय से सीधे ही बिना घर पर बताए बस से कई कोस की यात्रा कर अमृतसर पहुंचे और बस से उतर पैदल ही उस रक्त-रंजित स्थल पर पहुंच गए । चारों ओर का दृश्य देखकर बालक आंखों में खून उतर आया, मन प्रतिशोध और संकल्प से भर उठा। उन्होंने हुतात्माओं के रक्त से भीगी पावन मिट्टी को एक कांच की शीशी में भरा । यह शीशी उनके लिए किसी देव-विग्रह के समान थी, जिसके समक्ष वे कई दिनों तक नित्य फूल चढ़ाते और भारत माता को मुक्त कराने का प्रण दोहराते थे।
1857 से HSRA तक : वैचारिक विकास
आयु बढ़ने के साथ-साथ भगत सिंह का राष्ट्रप्रेम एक गंभीर बौद्धिक चेतना में परिवर्तित होता गया। इतिहासकार डॉ. विक्रम संपत अपनी पुस्तक 'Waiting for Swaraj' में स्पष्ट करते हैं कि इन युवा बलिदानियों का आंदोलन कोई बाह्य विचार नहीं था; यह उसी राष्ट्रीय चेतना का विस्तार था, जिसकी प्रेरणा छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोबिंद सिंह और 1857 के वीरों से प्रवाहित होती थी (संदर्भ: डॉ. विक्रम संपत, 'Waiting for Swaraj', पेंगुइन बुक्स)। वे 1857 के स्वाधीनता संग्राम के गहन अध्येता थे। जहां औपनिवेशिक इतिहासकार इसे मात्र 'सैनिक विद्रोह' कहकर मिथ्या प्रचार करते थे, वहीं भगत सिंह ने इसे भारत की स्वाधीनता का साझा महासंग्राम माना। वे विनायक दामोदर सावरकर के गुप्त रूप से प्रसारित ग्रंथ '1857 का स्वातंत्र्य समर' के निष्ठावान पाठक थे और उन्होंने इस पुस्तक का तीसरा संस्करण छपवाया।जब एक क्रांतिकारी को HSRA में शामिल किया जा रहा था तो भगत सिंह ने उससे पूछा कि क्या तुमने 1857 का स्वातंत्र्य समर पढ़ा है?
1926 में भगत सिंह ने युवाओं को एकजुट करने के लिए 'नौजवान भारत सभा' का गठन किया। इसके पश्चात सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के ऐतिहासिक खंडहरों में अन्य राष्ट्रभक्तों के साथ मिलकर 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का पुनर्गठन किया और उसमें 'सोशलिस्ट' जोड़कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना की। इस संगठन का लक्ष्य केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं था, अपितु एक ऐसे समाज की रचना थी जहां किसी भी मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण न हो, और राष्ट्र की संपदा पर कृषकों तथा श्रमिकों का सम्यक अधिकार हो। यहीं उनके जीवन में एक और मोड़ आया । अपने केश कटवाकर उन्होंने अपना रूप बदला कि वो अंग्रेजों के जासूसों से छुपकर पूरे भारत में भ्रमण कर क्रांति की अलख जगा सकें।
क्रांतिकारी के भीतर का पाठक और संवेदनशील मन
वे काव्य और साहित्य के भी अनन्य अनुरागी थे। जब शासक वर्ग दमन चक्र चलाता था, तब वे रामप्रसाद 'बिस्मिल' और अन्य कवियों की पंक्तियों से साथियों में नव-ऊर्जा का संचार करते थे। वे प्रायः दोहराया करते थे:
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है,
हमें यह शौक है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
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डॉ. वीरेंद्र संधू (उनके छोटे भाई कुलतार सिंह की सुपुत्री) के संस्मरणों से यह स्पष्ट होता है कि भगत सिंह के कठोर क्रांतिकारी व्यक्तित्व के भीतर एक अत्यंत कोमल और संवेदनशील हृदय भी विद्यमान था (संदर्भ: डॉ. वीरेंद्र संधू, पूर्वोक्त)। वे परिवार के प्रति अत्यंत उत्तरदायी पुत्र और भ्राता थे। कारावास के कठिन दिनों में भी वे अपनी पूज्य माता विद्यावती और छोटे भाइयों के अध्ययन तथा स्वास्थ्य की चिंता करते हुए पत्र लिखते थे।
लाहौर षड्यंत्र अभियोग के समय जब उनके अनुज कुलतार कारागार में उनसे मिलने पहुंचे और भावुक होकर रोने लगे, तब भगत सिंह ने उनका ढांढस बंधाते हुए कहा था—"हौसला रखो, रुदन का समय नहीं है। यदि हम प्रसन्नतापूर्वक फांसी का वरण करेंगे, तभी देश की कोटि-कोटि माताएं अपने पुत्रों को राष्ट्र रक्षा हेतु सहर्ष समर्पित कर सकेंगी।"
विचारों की सान' और समकालीन भारत
केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के उपरांत धुएं के बीच उन्होंने जो ऐतिहासिक पर्चे उछाले उसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया। उसमें फ्रांसीसी शहीद ऑगस्टे वैलांट की बात लिखी थी—‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंचे धमाके की जरूरत होती है।’ कितनी हिम्मत रही होगी कि धमाका कर वे भागे नहीं, वहीं खड़े रहकर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए सीना तानकर अपनी मर्जी से गिरफ्तार हुए।न्यायालय में दिया गया उनका वक्तव्य आज भी भारतीय लोकतंत्र का पाथेय है (संदर्भ: ए. जी. नूरानी, 'The Trial of Bhagat Singh')। उन्होंने कहा था: "बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।" वे जानते थे कि मुकदमा चलेगा तब वे अपनी बात दुनिया और अंग्रेजों के कानों को सुना पायेंगे । उन्हें लगा कि उनका बलिदान ही इस देश में लाखों भगत पैदा करेग़ा। न्यायालय में जब उनसे पूछा गया कि वे अपने जीवन के विषय में क्या सोचते हैं, तब उन्होंने नश्वर शरीर से परे विचारों की अमरता को रेखांकित करते हुए कहा था:
हवा में रहेगी मेरे ख़याल की बिजली,
ये मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे।
अंतिम पत्र : मृत्यु से परे विचारों की अमरता
3 मार्च 1931 को कारागार से कुलतार को भेजे अपने अंतिम पत्र में उन्होंने अपने जीवन-दर्शन को इस शेर के माध्यम से व्यक्त किया (संदर्भ: भगत सिंह, 'जेल पत्र एवं डायरी'):
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्या गिला करें,
हमारा जहाँ है मुख़्तलिफ़, हम अपना जहाँ पैदा करें।
युवाओं के लिए संदेश
आज इक्कीसवीं सदी के आत्मनिर्भर भारत में भगतसिंह के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं:
* तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: उन्होंने युवाओं को रूढ़ियों और मानसिक संकीर्णता से मुक्त होकर बौद्धिक विवेक और विज्ञान-सम्मत मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी।
* अखंड राष्ट्रीय समरसता: उन्होंने नौजवान भारत सभा के माध्यम से आह्वान किया कि जाति, मत-पंथ और प्रांतीय विवादों से परे रहकर ही राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाया जा सकता है।
* सशक्त युवा चेतना: उनका दृढ़ विश्वास था कि युवा केवल मूक दर्शक न बनें, अपितु अपनी मेधा, अध्ययन और पुरुषार्थ से नए भारत का निर्माण करें।
मात्र तेईस वर्ष की आयु में हंसते हुए मृत्यु का आलिंगन करने वाले अमर बलिदानी सरदार भगत सिंह आज भी प्रत्येक उस नागरिक के हृदय में जीवित हैं, जो एक सशक्त, स्वाभिमानी और वैभवशाली भारत की कामना करता है। उनका जीवन स्मरण कराता है कि राष्ट्र के लिए प्राणोत्सर्ग करना जितना वंदनीय है, राष्ट्र निर्माण के लिए वैचारिक रूप से समर्पित रहना उससे भी अधिक श्रेयस्कर है।
नौजवान भारत सभा, लाहौर का घोषणा-पत्र में भगत सिंह ने जो कहा आज भी वह प्रासंगिक है। वे युवाओं को स्वतंत्र, शांत और संगठित होकर देश की स्वाधीनता को ही जीवन का मुख्य लक्ष्य बनाने की सीख देते हैं। वे उन्हें किसी के बहकावे में आए बिना सेवा, त्याग और बलिदान के मार्ग पर चलने का आह्वान करते हैं। राष्ट्रनिर्माण केवल तभी संभव है जब युवा अपने निजी हितों और प्राणों से ऊपर उठकर देश को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
अमर बलिदानी भगतसिंह जी की जयंती पर उन्हीं के शब्दों में जगत जननी भारत मां की सेवा में अपने खून को पसीने सा बहाने वाले तरुणाई की दहलीज पर कदम रख रहे युवक युवतिय़ों को संदेश
"देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुख सहने की तत्परता, उनकी बेखौफ़ बहादुरी और लहराती कुर्बानी दर्शाती है कि भारत का भविष्य उनके हाथ में सुरक्षित है।"