कम्युनिस्ट आतंक : RSS की शाखा पर CPM का हमला कोई नई बात नहीं!
By
कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
October 04, 2026
लेख › समसामयिक
केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखा पर हुआ हमला कोई पहली घटना नहीं है। संघ वर्षों से विरोध और हिंसा की परिस्थितियों के बीच समाज संगठन के अपने कार्य को निरंतर आगे बढ़ाता रहा है। 30 सितंबर 2026 को केरल के पय्यनूर संघ जिले के चेरपूझा खंड स्थित अरवमचल में RSS की शाखा में गीत गा रहे स्वयंसेवकों पर CPM और DYFI से जुड़े लोगों द्वारा हमला किए जाने का आरोप सामने आया। इस दौरान स्वयंसेवकों के साथ मारपीट की गई। शाखा में बाल स्वयंसेवक भी मौजूद थे।
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। शाखा में मौजूद स्वयंसेवक यदि हिंसा का उसी तरीके से जवाब देते, तो परिस्थितियां कहीं अधिक गंभीर हो सकती थीं। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने प्रतिकार का हिंसक रास्ता नहीं चुना। संघ का मूल स्वभाव समाज को संगठित करने और सामाजिक जीवन में सकारात्मक भूमिका निभाने का रहा है। यही कारण है कि हिंसा और विरोध के बावजूद स्वयंसेवक अपने कार्य में लगे रहते हैं।
यहां सवाल केवल एक शाखा पर हुए हमले का नहीं है, बल्कि राजनीतिक हिंसा और उसके प्रति दिखाई जाने वाली कथित चयनात्मक संवेदनशीलता का भी है। यदि ऐसी घटना किसी भाजपा शासित राज्य में घटित होती, तो संभव है कि इसे लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक और मीडिया विमर्श खड़ा हो जाता। लोकतंत्र, संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को लेकर बहस तेज हो जाती। लेकिन जब इसी प्रकार की घटना केरल में होती है, तो सवाल उठता है कि उस पर राष्ट्रीय विमर्श उतना मुखर क्यों नहीं दिखाई देता?
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UDF सरकार है। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन हैं। कांग्रेस और CPM राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन RSS के संदर्भ में लेखक के अनुसार दोनों के राजनीतिक विरोध के बावजूद एक समानता दिखाई देती है। संघ के प्रति कांग्रेस और वामपंथी राजनीति के विरोध का इतिहास पुराना है। यही कारण है कि केरल में RSS कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों को केवल एक स्थानीय घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
केरल में RSS, ABVP और भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं पर राजनीतिक हिंसा के आरोप लंबे समय से सामने आते रहे हैं। CPM, CPI(M), SFI और अन्य वामपंथी संगठनों से जुड़े राजनीतिक संघर्षों में हिंसा की घटनाओं का इतिहास भी रहा है। इन घटनाओं के बावजूद संघ के कार्यकर्ताओं ने अपना संगठनात्मक कार्य जारी रखा है।
इस संदर्भ में सदानंद मास्टर का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। त्रिशूर के रहने वाले सदानंद मास्टर पर 1994 में हमला हुआ था, जिसमें उन्होंने अपने दोनों पैर गंवा दिए। बाद में वे भाजपा से राज्यसभा के सांसद बने। 2 फरवरी 2026 को राज्यसभा में उन्होंने अपने कृत्रिम पैर सदन की मेज पर रखकर अपने साथ हुई हिंसा की पीड़ा को देश के सामने रखा। इस घटना ने राजनीतिक हिंसा के प्रश्न को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सदानंद मास्टर का उल्लेख करते हुए राजनीतिक हिंसा की निंदा की और कहा कि इतनी भयावह घटना के बावजूद उनके भीतर कड़वाहट और क्रोध नहीं है। उन्होंने सदानंद मास्टर के धैर्य और राष्ट्रसेवा के संकल्प को प्रेरणादायी बताया।
केरल में ऐसे अनेक प्रकरण रहे हैं, जिनमें RSS, ABVP और भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं पर हमले और राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे हैं। इन परिस्थितियों में भी संघ का संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक कार्य रुक नहीं पाया। पश्चिम बंगाल इसका एक अन्य उदाहरण है, जहां लंबे समय तक राजनीतिक विरोध और हिंसा के बीच संघ ने अपना कार्य जारी रखा। समय के साथ वहां सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले।
वास्तव में संघ के इतिहास को देखें तो उसके सामने विरोध की परिस्थितियां नई नहीं हैं। जब-जब संघ के दमन के लिए राजनीतिक या प्रशासनिक प्रयास हुए और जब-जब उसके कार्यकर्ताओं को हिंसा का सामना करना पड़ा, तब-तब संघ अपने संगठनात्मक कार्य के साथ समाज के बीच उपस्थित रहा।
पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने संघ के समर्पण, भगवा ध्वज और उसके ध्येय को लेकर अपनी कविता में स्वयंसेवकों की इसी अदम्य जिजीविषा को अभिव्यक्त किया था—
“कभी थे अकेले हुए आज इतने
नहीं तब डरे तो भला अब डरेंगे
विरोधों के सागर में चट्टान हैं हम
जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे
लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा
कदम बढ़ रहा है कभी न रुकेगा
न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा
निडर हैं सभी हम अमर हैं सभी हम
के सर पर हमारे वरदहस्त करता
गगन में लहरता है भगवा हमारा”
केरल की हालिया घटना को इसी व्यापक राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद का समाधान हिंसा नहीं हो सकता। राजनीतिक विचारधाराएं एक-दूसरे की आलोचना कर सकती हैं, चुनावी संघर्ष कर सकती हैं, लेकिन किसी संगठन की शाखा, कार्यकर्ता या विचार से असहमति को हिंसा का आधार बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है।
संघ के स्वयंसेवकों पर हुए हमले का जवाब हिंसा से न देकर अपने संगठनात्मक कार्य को जारी रखना यह संदेश देता है कि किसी भी विचारधारा की वास्तविक शक्ति केवल उसके विरोध में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने ध्येय पर टिके रहने में है।
— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार