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गुरुद्वारों में प्रदर्शनकारियों की जबरन घुसपैठ और नारेबाजी पर शिरोमणि कमेटी का AAP पर तीखा हमला

By डॉ. मयंक चतुर्वेदी October 11, 2026
लेख › समसामयिक
गुरुद्वारों में प्रदर्शनकारियों की जबरन घुसपैठ और नारेबाजी पर शिरोमणि कमेटी का AAP पर तीखा हमला
राष्ट्रीय राजधानी के दिल में राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और आस्था की सनातन मर्यादा के बीच शनिवार को एक ऐसा टकराव देखने को मिला, जिसने देश के सबसे अनुशासित और सम्मानित धार्मिक समुदायों में से एक, सिख समाज को गहरे आक्रोश से भर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतरे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के हजारों प्रदर्शनकारियों ने पुलिसिया हिरासत और कार्रवाई से बचने के लिए ऐतिहासिक गुरुद्वारा बंगला साहिब और गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब को अपना सियासी 'सुरक्षा कवच' (शील्ड) बना लिया। सिख इतिहास और मर्यादा में 'सरबत का भला' (सबका भला) और 'शरण आए को गले लगाना' सर्वोपरि सिद्धांत माना गया है, लेकिन मर्यादा की इसी उदारता का दुरुपयोग जब राजनीतिक नारेबाजी, प्लेकार्ड (तख्तियों) के प्रदर्शन और परिसर के भीतर हुड़दंग के लिए किया गया, तो पूरी सिख संगत इसके खिलाफ एकजुट हो गई है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका और महासचिव जगदीप सिंह काहलों ने इस कृत्य की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। कालका ने इसे धार्मिक स्थलों को "गंदी राजनीति" में घसीटने की साजिश करार देते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) पर तीखा निशाना साधा है। https://x.com/hskalka/status/2108912657000804743?s=20

आस्था के आंगन में राजनीतिक हुड़दंग

उल्‍लेखनीय है कि शनिवार सुबह से ही चुनाव सुधारों और मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर दिल्ली का राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ था। हजारों की संख्या में आए प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर, कनॉट प्लेस और संसद की तरफ कूच करने की फिराक में थे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जैसे ही अनाधिकृत भीड़ को रोकने और हिरासत में लेने की प्रक्रिया शुरू की, प्रदर्शनकारियों के बीच अफरा-तफरी मच गई। पुलिस की पकड़ से बचने के लिए प्रदर्शनकारियों के जत्थे गुरुद्वारा बंगला साहिब और गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब के प्रवेश द्वारों की ओर भागे। गुरुद्वारा प्रबंधन के सेवादारों और सुरक्षा कर्मचारियों ने भीड़ की मंशा को भांपते हुए उन्हें द्वारों पर ही रोकने का प्रयास किया। सेवादारों ने स्पष्ट हिदायत दी कि वे अपनी राजनीतिक सामग्री, झंडे और तख्तियां बाहर छोड़ दें और एक आम श्रद्धालु की तरह भीतर जाएं, लेकिन राजनीतिक आवेश में अंधी हो चुकी भीड़ सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए गुरुद्वारा परिसर और परिक्रमा क्षेत्र के भीतर तक जा घुसी।

प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और डिजिटल साक्ष्य

घटना के कुछ ही मिनटों बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो फुटेज ने सिख जगत को स्तब्ध कर दिया। पवित्र सरोवर और दरबार हॉल के ठीक बाहर, जहां चौबीसों घंटे 'गुरुबाणी' का कीर्तन गूंजता है, वहां प्रदर्शनकारी राजनीतिक मांगों से जुड़ी तख्तियां लहरा रहे थे और जोर-जोर से नारेबाजी कर रहे थे। हद तो तब हो गई जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने गुरुद्वारा परिसर के सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल घंटों तक छिपने के ठिकाने के रूप में किया ताकि वे पुलिस डिटेंशन से बच सकें। https://x.com/NeerajRoyKumar/status/2108898233179333070?s=20

मर्यादा का सवाल: "शरण और सियासत में फर्क होता है"

सिख धर्म का इतिहास और इसकी वर्तमान व्यवस्था इस बात की गवाह है कि गुरु घर के दरवाजे हर उस व्यक्ति के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं जो भूखा है, बेघर है, या संकट में है। दिल्ली के दंगों से लेकर हाल ही के कई नागरिक आंदोलनों के दौरान, गुरुद्वारा बंगला साहिब ने घायलों को चिकित्सा सहायता और भोजन उपलब्ध कराने में कभी किसी की जाति या राजनीतिक विचारधारा नहीं पूछी, मगर इस मानवीय दृष्टिकोण का मतलब यह कतई नहीं है कि धार्मिक परिसरों को राजनीतिक अखाड़ा बनने दिया जाए। 'सिख रहत मर्यादा' के अनुसार, गुरुद्वारे की परिक्रमा और दरबार साहिब के भीतर केवल 'अकाल पुरख' (ईश्वर) की महिमा और धार्मिक सिमरन की अनुमति है। किसी भी सांसारिक राजा, पार्टी या सरकार के पक्ष या विपक्ष में नारे लगाना गुरु ग्रंथ साहिब की हज़ूरी (उपस्थिति) का अपमान माना जाता है। हरमीत सिंह कालका ने इसी संवैधानिक धार्मिक पक्ष को मजबूती से सामने रखते हुए कहा, "गुरुद्वारा कोई प्रोटेस्ट स्टेज (प्रदर्शन का मंच) नहीं है। गुरु घर हर उस व्यक्ति का स्वागत करता है जो माथा टेकने, शरण लेने या लंगर छकने आता है। लेकिन यदि कोई समूह हमारी धार्मिक सलाह को दरकिनार कर पवित्र परिसर को राजनीतिक मंच बनाने का प्रयास करेगा, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिसिया हस्तक्षेप के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। धार्मिक स्थलों के इस दुरुपयोग को सिख समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा।" सिख नेता तेजेन्‍दर बग्‍गा ने कहा, शर्म से डूब के मर जा अरविन्‍द केजरीवाल तुमने आज सिखों के इतिहासिक गुरुद्वारे में प्रदर्शन और राजनैतिक नारे लगवाए हैं जो इतिहास में कभी नहीं हुआ । तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई गुरद्वारे के अंदर घुसके प्रदर्शन करने की । सिख तुम्हें इस घटिया और घिनौने कृत्य के लिए कभी माफ नहीं करेंगे। https://x.com/mssirsa/status/2108941011326271516?s=20 इसके अलावा दिल्‍ली सरकार में उद्योग, पर्यावरण, खाद्य एवं आपूर्ति, वन एवं वन्यजीव मंत्री, सिख नेता मन्‍जिन्‍दर सिंह सिरसा कहते हैं, गुरु घर की पवित्रता पर सियासी हमला कतई बर्दाश्त नहीं! यह पवित्र परिसर गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब जी का है, गुरबाणी, सेवा, अरदास और सिख मर्यादा का पावन स्थान। लेकिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि केजरीवाल के लोग गुरु घर के पवित्र आंगन को अपने राजनीतिक प्रदर्शन और नारेबाजी का मंच बना रहे हैं और केजरीवाल जी इस कृत्य को सही ठहराने में लगे हैं। मन्‍जिन्‍दर सिंह सिरसा ने आगे कहा कि राजनीति की भी एक सीमा और मर्यादा होती है। गुरु घर किसी राजनीतिक दल का अखाड़ा नहीं है। सत्ता की भूख में गुरु घर की मर्यादा और संगत की आस्था को चोट पहुँचाना न केवल निंदनीय है, बल्कि पूरी सिख संगत की भावनाओं का अपमान है। केजरीवाल जी और इस कृत्य का समर्थन करने वाले तमाम नेताओं को सिख समाज और संगत से तत्काल बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए। सियासत कहीं और कीजिए, गुरु घर की पवित्रता और मर्यादा से खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं होगा। गुरु की मर्यादा सर्वोपरि है!

संगत की आवाज: "हमारी आस्था को अपनी ढाल मत बनाओ"

बंगला साहिब में नियमित रूप से सेवा करने वाले दिल्ली के निवासी जसपाल सिंह (52 वर्ष) ने ग्राउंड जीरो पर चल रहे तनाव को बयां करते हुए कहा, "हम रोज यहां देश-दुनिया के भले की अरदास करते हैं। प्रदर्शनकारी अपनी जायज-नाजायज मांगें लेकर जंतर-मंतर जाएं, लेकिन हाथों में तख्तियां लेकर सरोवर के पास भागना और नारे लगाना हमारी आत्मा को ठेस पहुंचाता है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे श्रद्धालु नहीं बल्कि राजनीतिक एजेंट हैं।" इसी तरह से अन्‍य सिख बुद्धिजीवियों और विचारकों का भी मानना है कि यदि आज इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो भविष्य में हर छोटा-बड़ा राजनीतिक आंदोलन पुलिस से बचने के लिए धार्मिक स्थलों की शरण लेगा, जिससे इन परिसरों की सुरक्षा, शांति और आध्यात्मिक वातावरण पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। उल्‍लेखनीय है कि शनिवार की इस अभूतपूर्व घटना से सबक लेते हुए, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने भविष्य के लिए कमर कस ली है। सूत्रों के अनुसार, गुरुद्वारा बंगला साहिब और रकाबगंज साहिब के चारों तरफ सुरक्षा और सेवादारों की तैनाती को दोगुना किया जा रहा है। * किसी भी राजनीतिक रैली, मार्च या प्रदर्शन के दिनों में प्रवेश द्वारों पर विशेष चेकिंग पॉइंट बनाए जाएंगे। * किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक बैनर, तख्ती, झंडा या टोपी पहनकर भीतर जाने की अनुमति पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। * गुरुद्वारा परिसर के भीतर की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरों के जरिए एक विशेष मॉनिटरिंग सेल चौबीसों घंटे काम करेगा ताकि मर्यादा भंग करने वाले तत्वों की पहचान तुरंत पुलिस को दी जा सके। कुल मिलाकर यहां कहना यही होगा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन हर नागरिक और दल का मौलिक अधिकार है, लेकिन जब यह अधिकार दूसरों की धार्मिक स्वतंत्रता, आस्था और सदियों पुरानी पवित्र मर्यादाओं पर अतिक्रमण करने लगे, तो वह अराजकता का रूप ले लेता है। दिल्ली के गुरुद्वारों में जो हुआ, वह राजनीति के गिरते स्तर का एक खतरनाक संकेत है। समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल और संगठन यह लक्ष्मण रेखा तय करें कि वे अपनी सियासी लड़ाइयों को लड़ते हुए कम से कम भगवान और गुरुओं के घरों को बिल्‍कुल भी निशाना नहीं बनाएंगे ।

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