संकट में संबल देते हैं हनुमान : भय के क्षणों में हनुमान चालीसा
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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
October 04, 2026
लेख › समसामयिक
कैप्टन स्मित
संकट का क्षण हमेशा अचानक आता है। उस समय आसपास बहुत कुछ दिखाई देता है, फिर भी मन सबसे पहले अपने भीतर किसी ऐसे सहारे को खोजता है, जो भय के बीच उसे स्थिर रख सके। सांसें तेज होती हैं, शरीर दर्द से गुजर रहा होता है और भविष्य कुछ क्षणों के लिए अनिश्चित दिखाई देता है। ऐसे समय में किसी के लिए परिवार की याद शक्ति बनती है, किसी के लिए डॉक्टरों पर विश्वास और किसी के लिए प्रार्थना।
फ्लाईदुबई के कैप्टन स्मित मछार के लिए ऐसे ही कठिन क्षणों में ‘हनुमान चालीसा’ सहारा बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि जब भी उन्हें डर या दर्द महसूस होता है, वे हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। उस कठिन घड़ी में भी उनके होंठों पर यही पाठ था। उनके मन में विश्वास था कि ईश्वर ने उनकी रक्षा की है।
दूर से देखने पर किसी को यह महज एक व्यक्ति की धार्मिक अनुभूति लग सकती है, किंतु इसके पीछे भारतीय समाज की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक मनोभूमि है। संकट के समय आराध्य का स्मरण मन को संभालता है, भय के सामने खड़े होने का साहस देता है और व्यक्ति को अपने कर्तव्य की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
हनुमान : शक्ति, साहस और सेवा के प्रतीक
भारतीय आध्यात्मिक चेतना में हनुमान शक्ति, साहस, सेवा, समर्पण और संरक्षण के प्रतीक हैं। उनका व्यक्तित्व इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि उनके पास असाधारण शक्ति होते हुए भी उसका केंद्र स्वयं वे नहीं, बल्कि श्रीराम की सेवा है।
रामायण का समुद्र लांघने वाला प्रसंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सामने अथाह समुद्र था और कार्य असंभव जैसा दिखाई दे रहा था। हनुमान अपनी सामर्थ्य को लेकर स्वयं आश्वस्त नहीं थे। तब जामवंत ने उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराया और वही हनुमान समुद्र लांघने के लिए उठ खड़े हुए।
जीवन में भी कई बार परिस्थिति से बड़ी चुनौती भय होता है। जब व्यक्ति को अपनी क्षमता, अपने विश्वास और अपने उद्देश्य का स्मरण हो जाता है, तब वही कठिन राह कुछ अलग दिखाई देने लगती है। हनुमान की कथा इसी ‘आत्मबोध’ की कथा भी है।
तुलसीदास और फतेहपुर सीकरी की प्रसिद्ध लोककथा
हनुमान चालीसा की लोकप्रियता से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में एक प्रसंग मुगल सम्राट अकबर और गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ा है। लोक परंपरा के अनुसार, संत तुलसीदास की ख्याति सुनकर अकबर ने उन्हें दरबार में बुलाया और उनसे चमत्कार दिखाने को कहा। तुलसीदास ने स्वयं को श्रीराम का सेवक बताते हुए किसी चमत्कार का दावा करने से इनकार किया।
कथा के अनुसार, इससे नाराज होकर अकबर ने उन्हें फतेहपुर सीकरी में बंदी बना दिया। वहीं तुलसीदास ने हनुमानजी का ध्यान किया और हनुमान चालीसा की रचना की।
लोककथा आगे बताती है कि इसके बाद फतेहपुर सीकरी में बंदरों का असाधारण उत्पात मच गया। महल और परिसर में अफरा-तफरी फैल गई। अंततः तुलसीदास को मुक्त कर दिया गया और बंदरों का उत्पात भी शांत हो गया।
इतिहास और लोकविश्वास के बीच इस कथा की प्रमाणिकता को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन भारतीय जनमानस में इसका सांस्कृतिक प्रभाव गहरा है। हनुमान चालीसा ‘संकटमोचन’ के रूप में घर-घर पहुंची और आज भी करोड़ों लोग कठिन समय में इसका पाठ करते हैं।
जब तुलसी की पीड़ा बनी ‘हनुमान बाहुक’
तुलसीदास के जीवन से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण प्रसंग ‘हनुमान बाहुक’ का है। परंपरा के अनुसार, जीवन के अंतिम काल में वे शारीरिक पीड़ा से गुजर रहे थे। विशेष रूप से उनकी भुजाओं में तीव्र दर्द था। इसी पीड़ा की अवस्था में उन्होंने हनुमानजी की स्तुति में पदों की रचना की, जो आगे चलकर ‘हनुमान बाहुक’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इस रचना में हनुमानजी के विराट स्वरूप, पराक्रम और करुणा का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण मिलता है। भक्त परंपरा में इसे पीड़ा के बीच ईश्वर की शरण में जाने और आस्था से आत्मबल प्राप्त करने का उदाहरण माना जाता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझ आती है। भक्ति भारतीय परंपरा में पलायन का माध्यम नहीं, बल्कि भीतर से वह हिम्मत देने वाली शक्ति भी रही है, जिसके चलते भक्त कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार होता है। संकट के बीच मन को स्थिर करना और फिर अपने कर्म की ओर लौटना भी भक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कैप्टन स्मित और दो साल के बेटे तक पहुंचती परंपरा
कैप्टन स्मित की कहानी का एक दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे अपने दो वर्ष के बेटे को प्रतिदिन सुबह हनुमान चालीसा सुनाते हैं।
मुंबई से दुबई स्थानांतरण के बाद भी यह दिनचर्या बनी हुई है। एक छोटे बच्चे की सुबह हनुमान चालीसा के स्वर से शुरू होना उस सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है, जो भौगोलिक सीमाओं से बड़ी होती है।
आज भारतीय परिवार दुनिया के अनेक देशों में रहते हैं। नई भाषा, नई जीवनशैली और अलग सामाजिक वातावरण के बीच अपनी सांस्कृतिक स्मृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना उनके सामने स्वाभाविक चुनौती है। ऐसे में घर की छोटी-छोटी परंपराएं महत्वपूर्ण बन जाती हैं।
कोई बच्चा दादा-दादी से रामायण या रामचरितमानस सुनता है, कोई परिवार त्योहारों को उसी श्रद्धा से मनाता है और कोई पिता अपने छोटे बेटे को प्रतिदिन हनुमान चालीसा, गणेश वंदना, शिव स्तोत्र या रामरक्षा स्तोत्र सुनाता है। वस्तुतः यह धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक स्मृति का भी हस्तांतरण है।
हनुमान की शक्ति का अर्थ सिर्फ पराक्रम नहीं
हनुमान की लोकप्रियता का कारण उनका बल तो है ही, साथ ही उनके व्यक्तित्व में शक्ति और विनम्रता का अद्भुत संतुलन भी है। वे विद्वान हैं, योद्धा हैं, संदेशवाहक हैं, रणनीतिकार हैं और सबसे बढ़कर सेवक हैं।
समुद्र लांघने से लेकर मां सीता की खोज, लंका में प्रवेश और संजीवनी लाने तक उनके हर कार्य में उद्देश्य की स्पष्टता दिखाई देती है। उनकी शक्ति निजी प्रदर्शन के लिए नहीं, कर्तव्य के लिए है। इसीलिए हनुमान भारतीय मानस में उस शक्ति के प्रतीक बनते हैं, जो भय को चुनौती देती है, कठिनाई के सामने खड़ी होती है और सफलता के बाद भी अहंकार से दूर रहती है।
हनुमान चालीसा की पंक्ति—
“संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।”
भक्त के लिए इसी विश्वास को व्यक्त करती है। प्रार्थना परिस्थितियों को तुरंत बदल दे, यह वैज्ञानिक या चिकित्सकीय निष्कर्ष नहीं है, लेकिन प्रार्थना व्यक्ति के मन को स्थिर करने, धैर्य बनाए रखने और कठिन समय का सामना करने में आत्मबल देने वाली अनुभूति बन सकती है।
संकट से संस्कृति तक
कैप्टन स्मित के अनुभव में एक ओर संकट के क्षण में हनुमान चालीसा का सहारा दिखाई देता है, तो दूसरी ओर अपने बच्चे को वही चालीसा सुनाने की परंपरा भी। एक पीढ़ी में जो आस्था संकट के समय शक्ति देती है, वही अगली पीढ़ी में संस्कार बनकर पहुंचती है।
यही भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की विशेषता है। मंदिर से घर तक, कथा से साहित्य तक और पूजा से दैनिक जीवन तक हनुमानजी की उपस्थिति दिखाई देती है।
समय बदल गया है। संकटों का स्वरूप बदल गया है। आज का मनुष्य विमान उड़ाता है, समुद्र पार करता है, दूसरे देशों में रहता है और तकनीक से घिरा जीवन जीता है। फिर भी भय, पीड़ा, अनिश्चितता और आशा की मानवीय अनुभूति वही है।
ऐसे में हनुमान की कथा आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है, क्योंकि वह मनुष्य को सिर्फ यह स्मरण नहीं कराती कि उसके पास शक्ति है, बल्कि यह भी सिखाती है कि उस शक्ति का उपयोग किसके लिए किया जाना चाहिए।
आस्था से आगे, जीवन की प्रेरणा
हनुमानजी को समझने का एक रास्ता उनकी आराधना है, दूसरा उनके चरित्र से प्रेरणा लेना। वे शक्ति के साथ विनम्रता, ज्ञान के साथ विवेक, पराक्रम के साथ अनुशासन और भक्ति के साथ सेवा का संदेश देते हैं।
शायद इसीलिए जब किसी भयभीत मनुष्य के होंठों पर संकट की घड़ी में हनुमान चालीसा आती है, तब वहां केवल शब्दों का उच्चारण नहीं होता। उसके साथ एक सांस्कृतिक स्मृति भी जागती है—तुलसीदास की साधना, रामायण के प्रसंग, परिवार से मिले संस्कार और आराध्य के प्रति विश्वास एक साथ मन को थाम लेते हैं।
संकट समाप्त होने में समय लग सकता है। परिस्थितियां तुरंत बदलें, यह आवश्यक भी नहीं। लेकिन संकट के बीच मनुष्य स्वयं को संभाल सके, अपने भीतर साहस खोज सके और अगला कदम उठा सके—यही किसी भी संबल का सबसे बड़ा अर्थ है।
सच ही है, ‘हनुमान’ इसी संबल का नाम हैं—संकट में स्मरण किए जाने वाले आराध्य के रूप में भी और जीवन में साहस, सेवा, कर्तव्य तथा समर्पण की प्रेरणा देने वाले चरित्र के रूप में भी।
कैप्टन स्मित मछार की कहानी इसी विश्वास की एक समकालीन तस्वीर सामने रखती है—एक ओर संकट की घड़ी में हनुमान चालीसा का स्मरण और दूसरी ओर अगली पीढ़ी तक उसी परंपरा को पहुंचाने का संकल्प। यही वह बिंदु है जहां आस्था व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर संस्कृति और जीवन-मूल्यों का हिस्सा बन जाती है।
— डॉ. मयंक चतुर्वेदी