मद्रास हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी: हिंदू धर्म समावेशी, अब्राहमिक धर्मों में विशिष्टतावाद की प्रवृत्ति
Zen Meditation Centre के FCRA मामले में कोर्ट ने कहा- धार्मिक संस्था को अपनी प्रकृति और गतिविधियों का सही खुलासा करना जरूरी, विदेशी अंशदान कोई मौलिक अधिकार नहीं
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वीएसके डेस्क
October 08, 2026
समाचार › देश-विशेष
चेन्नई। मद्रास हाई कोर्ट ने कोडाइकनाल स्थित एक Zen Meditation Centre संचालित करने वाले ट्रस्ट के FCRA पंजीकरण से जुड़े मामले में धर्म, धार्मिक पहचान, विदेशी अंशदान और धर्मांतरण को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्ट को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के तहत पंजीकरण देने से इनकार किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि किसी धार्मिक संस्था के लिए अपनी वास्तविक प्रकृति और गतिविधियों का सही-सही खुलासा करना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एमडी सुमति की खंडपीठ के समक्ष कोडाइकनाल में Zen Meditation Centre और Montessori School संचालित करने वाले Kanjion Public Charitable Trust का मामला था। ट्रस्ट ने दलील दी थी कि Zen Meditation की गतिविधियां मूल रूप से ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास से जुड़ी हैं और इन्हें धार्मिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से ट्रस्ट की गतिविधियों को धार्मिक स्वरूप वाला बताया गया था।
धार्मिक पहचान छिपाने की जरूरत नहीं
अदालत ने मामले में यह महत्वपूर्ण बिंदु रखा कि Zen Buddhism, महायान बौद्ध परंपरा का हिस्सा है। ऐसे में FCRA के लिए आवेदन करते समय ट्रस्ट को अपनी धार्मिक प्रकृति स्पष्ट रूप से बतानी चाहिए थी।
कोर्ट ने कहा कि FCRA के तहत धार्मिक संगठन भी पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकता है। कानून किसी धार्मिक संस्था को केवल उसके धार्मिक स्वरूप के कारण विदेशी अंशदान प्राप्त करने से स्थायी रूप से बाहर नहीं करता। हालांकि, आवेदन में संगठन की प्रकृति, उद्देश्य और गतिविधियों के संबंध में सही जानकारी देना अनिवार्य है।
अदालत ने इस संदर्भ में स्पष्ट किया कि विदेशी अंशदान प्राप्त करना कोई अधिकार नहीं बल्कि कानून के तहत मिलने वाला विशेषाधिकार है। इसलिए पंजीकरण के लिए आवेदन करने वाली संस्था को आवश्यक तथ्यों का पूरा खुलासा करना होगा।
‘हिंदू धर्म समावेशी, अब्राहमिक धर्म विशिष्ट’
फैसले में धर्मों की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने हिंदू धर्म और अब्राहमिक धार्मिक परंपराओं के बीच अंतर का उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि हिंदू धर्म स्वभाव से समावेशी है, जबकि अब्राहमिक धर्मों में विशिष्टतावादी दृष्टिकोण दिखाई देता है।
अदालत ने यह टिप्पणी यहूदी, ईसाई और इस्लामी परंपराओं के संदर्भ में की और कहा कि इन धर्मों के अनुयायियों में अपने धर्म को अंतिम अथवा पूर्ण धार्मिक सत्य मानने की धारणा पाई जाती है। हालांकि, यह टिप्पणी मामले के व्यापक संदर्भ में की गई थी और इसे धार्मिक समुदायों के प्रत्येक व्यक्ति पर लागू सामान्य निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
धर्मांतरण के लिए विदेशी फंडिंग पर जताई चिंता
FCRA के प्रावधानों पर चर्चा करते हुए अदालत ने धर्मांतरण और विदेशी वित्तीय सहायता के संभावित संबंध पर भी चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि यदि विदेशी धन का इस्तेमाल धार्मिक धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के लिए किया जाता है, तो इससे देश की संप्रभुता और सामाजिक संतुलन से जुड़े प्रश्न उठ सकते हैं।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि FCRA की संबंधित शर्तें सभी धार्मिक संगठनों पर समान रूप से लागू होती हैं। यानी नियम किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं हैं।
इसी संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कट्टरपंथी हिंदू संगठन ‘घर वापसी’ जैसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो वह भी FCRA पंजीकरण का हकदार नहीं होगा। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी अंशदान से जुड़ी कानूनी पाबंदियां धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकतीं।
भारत को ‘बहुलतावादी राष्ट्र’ बताया
पीठ ने भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का उल्लेख करते हुए देश को एक बहुलतावादी राष्ट्र बताया। अदालत ने कहा कि भारत की विशेषता यह है कि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचानें एक साथ अस्तित्व में रहती हैं।
कोर्ट ने यह चिंता भी जताई कि यदि कोई एक धार्मिक समूह अत्यधिक प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, तो इससे देश के बहुलतावादी स्वरूप पर असर पड़ सकता है। इसी संदर्भ में अदालत ने धर्मांतरण के लिए विदेशी धन के अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर सावधानी की आवश्यकता बताई।
ईसाई पादरी से जुड़े तथ्य का भी उल्लेख
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि ट्रस्ट के संस्थापक और प्रमुख व्यक्ति एक नियुक्त ईसाई पादरी हैं। अदालत ने ट्रस्ट की गतिविधियों और उसके धार्मिक स्वरूप का आकलन करते समय इस तथ्य के साथ-साथ Zen Meditation Centre में मौजूद धार्मिक प्रतीकों और गतिविधियों पर भी विचार किया।
हालांकि, पीठ ने यह स्पष्ट किया कि वह याचिकाकर्ता ट्रस्ट पर धर्मांतरण का एजेंडा चलाने का आरोप नहीं लगा रही है। अदालत का मुख्य जोर इस बात पर था कि FCRA आवेदन में संस्था की वास्तविक प्रकृति को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
भारतीय ज्ञान परंपराओं को लेकर भी अहम टिप्पणी
फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू भारतीय ज्ञान परंपराओं से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि वे संस्थाएं जो वेदांत, भगवद्गीता, उपनिषद, योग और अन्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों का व्यवस्थित अध्ययन, शिक्षण, शोध, प्रकाशन या पांडुलिपियों के संरक्षण का काम करती हैं, उन्हें केवल इसी आधार पर धार्मिक संस्था नहीं माना जा सकता।
अर्थात किसी संस्था की गतिविधियों का स्वरूप देखकर यह तय किया जाना चाहिए कि वह मुख्य रूप से धार्मिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक या सामाजिक संस्था के रूप में काम कर रही है।
FCRA पंजीकरण के लिए ‘सही खुलासा’ जरूरी
अदालत ने अंततः ट्रस्ट की अपील को खारिज करते हुए केंद्र सरकार के FCRA पंजीकरण से इनकार के निर्णय को बरकरार रखा। पीठ के अनुसार, ट्रस्ट को अपनी धार्मिक प्रकृति स्पष्ट करने में संकोच नहीं करना चाहिए था।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि FCRA के तहत पंजीकरण का निर्णय लेते समय संबंधित प्राधिकरण को पर्याप्त विवेकाधिकार प्राप्त है। हालांकि, यदि इस विवेकाधिकार का गलत इस्तेमाल हो, प्रासंगिक तथ्यों पर विचार न किया जाए या निर्णय मनमाना हो, तो न्यायिक समीक्षा के जरिए अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
इस पूरे मामले में मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणियों का केंद्रीय संदेश यही रहा कि धार्मिक संस्था होना अपने आप में FCRA पंजीकरण से वंचित होने का कारण नहीं है, लेकिन विदेशी अंशदान मांगने वाली संस्था को अपनी पहचान, उद्देश्य और गतिविधियों के बारे में पूरी पारदर्शिता बरतनी होगी