मूलनिवासी दिवस के बहाने भारत को बांटने का आख्यान
जनजातीय समाज के अधिकार और सम्मान की चिंता आवश्यक, लेकिन भारत की सभ्यता को ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ के पश्चिमी चश्मे से देखना ऐतिहासिक भूल
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डॉ. ईश्वर बैरागी
August 09, 2026
लेख › वैश्विक राजनीति
हर वर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव 49/214 के माध्यम से 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया था। यह दिनांक 1982 में संयुक्त राष्ट्र के Working Group on Indigenous Populations की पहली बैठक की स्मृति से जुड़ी है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस दिवस का उद्देश्य दुनिया भर के मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति, ज्ञान-परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के संरक्षण तथा उनके सामने मौजूद चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
इस उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। दुनिया के अनेक हिस्सों में औपनिवेशिक विस्तार ने वहां के मूल समुदायों को विस्थापन, हिंसा, सांस्कृतिक दमन और भूमि से बेदखली का सामना कराया। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का इतिहास इसके अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
लेकिन भारत की कहानी क्या वही है?
इसी प्रश्न से मूलनिवासी दिवस के बहाने चलने वाले विमर्श की असली परीक्षा शुरू होती है।
भारत को पश्चिमी इतिहास के खांचे में क्यों फिट किया जाए?
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का औपनिवेशिक अनुभव यूरोपीय बसाहट और वहां पहले से रह रहे समुदायों के बीच संघर्ष की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ। यूरोपीय शक्तियां समुद्र पार से गईं, उन्होंने राजनीतिक सत्ता स्थापित की और अनेक स्थानों पर स्थानीय समुदायों को उनकी भूमि से विस्थापित किया।
भारत का इतिहास इस प्रकार का नहीं है।
भारत कोई ऐसा भूभाग नहीं रहा जहां किसी एक औपनिवेशिक समुदाय ने बाहर से आकर यहां के ‘मूल निवासियों’ को हटाकर अपना समाज बसाया हो। भारत की सभ्यता की विशेषता ही उसकी दीर्घकालिक सांस्कृतिक निरंतरता, विविधता और समन्वय में रही है।
यहां वनवासी और जनजातीय समाज भारतीय जीवन से अलग कोई बाहरी इकाई नहीं रहा। भारत की लोकस्मृति, धार्मिक आख्यानों, प्रकृति-दृष्टि, कला, कृषि, लोकज्ञान और स्वतंत्रता संघर्ष में जनजातीय समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
इसलिए भारत में यदि ‘मूलनिवासी’ शब्द को इस अर्थ में स्थापित किया जाता है कि कुछ लोग ही इस भूमि के ‘असली निवासी’ हैं और बाकी किसी समय बाहर से आए होने के कारण ‘बाहरी’ हैं, तो यह भारत के इतिहास को पश्चिमी औपनिवेशिक अनुभव की नकल में ढालने का प्रयास होगा।
भारत की पहचान किसी एक नस्ल, जाति या जनसमूह से नहीं बनी। भारत की पहचान उन असंख्य समुदायों की सहस्राब्दियों पुरानी सहयात्रा से बनी है।
जनजाति को अधिकार चाहिए, अलगाव का आख्यान नहीं
जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा, उनकी भूमि, जल, जंगल, संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना एक संवैधानिक और राष्ट्रीय दायित्व है। लेकिन इन अधिकारों की चर्चा को ‘हम मूलनिवासी हैं और बाकी बाहरी’ जैसे राजनीतिक आख्यान में बदल देना एक अलग बात है।
भारत ने जनजातीय समाज को अधिकार देने के लिए किसी विदेशी संस्था के निर्देश की प्रतीक्षा नहीं की। संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष संरक्षण की व्यवस्था की। पांचवीं और छठी अनुसूची, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और रोजगार में आरक्षण तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े प्रावधान इसी संवैधानिक दृष्टि का हिस्सा हैं।
इसके बाद PESA और वनाधिकार कानून जैसे प्रावधानों ने भी जनजातीय समुदायों के अधिकारों को मजबूत किया।
भारत का रास्ता जनजातीय समाज को अलग करने का नहीं, उसे अधिकार, सम्मान और सहभागिता देने का रहा है।
आर्य-द्रविड़ से मूलनिवासी बनाम बाहरी तक
भारत में ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ की राजनीति के लिए आर्य-द्रविड़ विभाजन को बार-बार सामने लाया जाता है। औपनिवेशिक काल में भारतीय समाज को नस्लीय श्रेणियों में बांटने के प्रयास हुए। बाद के राजनीतिक विमर्शों में इन धारणाओं को नए रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन भारत की जनसंख्या का इतिहास अत्यंत जटिल है। हजारों वर्षों के प्रवास, संपर्क, अंतर्विवाह और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने यहां की सामाजिक संरचना को आकार दिया है। इसलिए यह दावा करना कि भारत में एक ‘शुद्ध मूलनिवासी’ समाज था और उसके बाद कोई अलग ‘बाहरी’ समूह आया जिसने पूरे भारत पर अधिकार कर लिया—इतिहास को एक राजनीतिक नारे में बदल देना है। भारत को समझने के लिए नस्लीय शुद्धता का चश्मा नहीं, बल्कि सभ्यतागत निरंतरता का दृष्टिकोण चाहिए।
दुनिया का औपनिवेशिक इतिहास चेतावनी देता है
इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया के मूलनिवासी समुदायों के साथ हुए अत्याचारों को नकार दिया जाए। अमेरिका में यूरोपीय विस्तार के साथ युद्ध, बीमारी, भूमि अधिग्रहण और जबरन विस्थापन ने मूल समुदायों को गहरा आघात पहुंचाया। 1830 का Indian Removal Act और उसके बाद हुआ जबरन विस्थापन अमेरिकी इतिहास के काले अध्यायों में गिना जाता है। ‘Trail of Tears’ इसी त्रासदी की स्मृति है।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी औपनिवेशिक विस्तार ने स्थानीय समुदायों की भूमि, राजनीतिक स्वायत्तता और सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित किया।
इन घटनाओं को याद करना आवश्यक है। लेकिन इसी इतिहास को भारत पर यांत्रिक ढंग से आरोपित करना उचित नहीं। भारत में जनजातीय समाज के साथ हुए अन्यायों और चुनौतियों का समाधान भारतीय इतिहास, भारतीय संविधान और भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं के संदर्भ में ही खोजा जाना चाहिए।
मिशनरी गतिविधियां : सेवा के साथ सांस्कृतिक प्रश्न भी
भारत में मिशनरी संस्थाओं की भूमिका का मूल्यांकन भी संतुलित दृष्टि से होना चाहिए।
शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा की आड़ में मिशनरी संस्थाओं द्वारा औपनिवेशिक काल से धार्मिक प्रचार तथा मतांतरण की गतिविधियां भी अनेक क्षेत्रों में चलती रहीं हैं।
यदि किसी समुदाय की गरीबी, अशिक्षा या सामाजिक कमजोरी को उसके धार्मिक-सांस्कृतिक आधार को बदलने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तो यह केवल धार्मिक परिवर्तन का प्रश्न नहीं रह जाता। यह संस्कृति, पहचान और सामाजिक संरचना का प्रश्न भी बन जाता है। इसलिए जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा अवश्य पहुंचे, लेकिन वह सेवा किसी समुदाय को उसकी जड़ों से काटने का माध्यम न बने। सेवा का अर्थ सशक्तीकरण होना चाहिए, सांस्कृतिक विस्मृति नहीं।
जनजातीय समाज को उसकी जड़ों से कौन जोड़ता है?
भारत की जनजातीय परंपराओं में प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है। जंगल केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। पर्वत, नदियां, वृक्ष, पशु-पक्षी और धरती के प्रति श्रद्धा अनेक जनजातीय परंपराओं में दिखाई देती है। यह दृष्टि भारतीय सभ्यता की व्यापक प्रकृति-दृष्टि से संवाद करती है।
भारत की लोकपरंपराओं में भगवान राम और वनवासी समाज का संबंध हो, निषादराज की कथा हो, शबरी की भक्ति हो, महाभारत और पुराणों की विविध लोकस्मृतियां हों या स्वतंत्रता संग्राम में तिलका मांझी, बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती और अनेक अन्य जनजातीय नायकों का योगदान—ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि जनजातीय समाज को भारत की सांस्कृतिक यात्रा से काटकर नहीं समझा जा सकता।
यही कारण है कि भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को भारत सरकार ने ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। सरकार के अनुसार बिरसा मुंडा स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक सुधारक थे तथा उन्होंने औपनिवेशिक शासन की शोषणकारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध ‘उलगुलान’ का नेतृत्व किया था। यह केवल किसी एक समुदाय के नायक का सम्मान नहीं है। यह उस भारत का सम्मान है जिसमें जनजातीय समाज ने राष्ट्रजीवन के निर्माण और स्वतंत्रता संघर्ष में अपना योगदान दिया।
भारत की जनजातीय चेतना को किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं
विडंबना यह है कि जिन जनजातीय समाजों की सांस्कृतिक समृद्धि का आज विश्व मंचों पर उल्लेख किया जाता है, भारत में कभी-कभी उन्हीं समुदायों को आधुनिकता के नाम पर उनकी परंपराओं से काटने का प्रयास किया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र स्वयं आज जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरणीय अनुभव और सांस्कृतिक प्रणालियों के महत्व को रेखांकित करता है। उसके अनुसार विश्व में लगभग 47.6 करोड़ Indigenous Peoples, 90 देशों में रहते हैं और वे दुनिया की जैव-विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के जनजातीय समाज के संदर्भ में भी यही दृष्टि होनी चाहिए—उन्हें पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में नहीं, ज्ञान और अनुभव की जीवंत परंपरा के रूप में देखा जाए।
मूलनिवासी दिवस का भारतीय उत्तर क्या हो?
इस प्रश्न का उत्तर किसी दिवस के विरोध में नहीं, बल्कि विमर्श की दिशा तय करने में है।
यदि 9 अगस्त जनजातीय समाज के अधिकारों, उनकी संस्कृति, भाषा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और सम्मान पर चर्चा का अवसर बनता है तब तो इसपर विचार किया जा सकता है। लेकिन यदि इस दिन के बहाने भारत के जनजातीय समाज को शेष भारतीय समाज से अलग करने का राजनीतिक आख्यान खड़ा किया जाता है, आर्य-द्रविड़ जैसे विवादित औपनिवेशिक सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत किया जाता है या ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ का संघर्ष पैदा किया जाता है, तो उस विमर्श पर गंभीरता से प्रश्न उठना चाहिए।
विभाजन नहीं, एकात्मता ही भारत की शक्ति
भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विविधता ने एकता को जन्म दिया है, विभाजन को नहीं। जनजातीय समाज भारत से बाहर खड़ा कोई समाज नहीं है। वह भारत के भीतर भारत की एक प्राचीन और जीवंत अभिव्यक्ति है। इसलिए जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा, उनकी संस्कृति का संरक्षण करना राष्ट्रहित है। उनके नायकों का सम्मान करना राष्ट्रीय कर्तव्य है। उनके विकास के अवसर बढ़ाना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। लेकिन उन्हें किसी राजनीतिक प्रयोगशाला में ‘अलग मूलनिवासी’ सिद्ध करना न उनके हित में है और न भारत के।
भारत की जनजातीय चेतना भारत की ही चेतना है।
भगवान बिरसा मुंडा से लेकर रानी दुर्गावती तक, शबरी से लेकर निषादराज तक और अनगिनत लोकनायकों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के वीरों तक—इस भूमि की सांस्कृतिक स्मृति में जनजातीय समाज अलग अध्याय नहीं, उसी भारत की कथा का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए भारत के लिए मूल प्रश्न यह नहीं कि ‘मूलनिवासी कौन है?’
मूल प्रश्न यह है कि क्या हम अपने ही समाज के उन लोगों को उनकी संस्कृति, अधिकार और सम्मान के साथ आगे बढ़ाएंगे, जिन्होंने सदियों से भारत की धरती, जंगल और सभ्यता की रक्षा की है?
उत्तर स्पष्ट है—उन्हें अधिकार भी मिलेंगे, सम्मान भी मिलेगा और विकास भी। लेकिन भारत को बांटने वाली किसी ऐसी अवधारणा के लिए स्थान नहीं होगा, जो एक भारतीय को दूसरे भारतीय के सामने ‘बाहरी’ खड़ा कर दे।