श्राद्ध : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
By
गिरीश जोशी
October 06, 2026
लेख › समसामयिक
श्राद्धपक्ष हिंदू जीवनशैली में अपने पूर्वजों का स्मरण करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की सद्गति की कामना के साथ किए जाने वाले संकल्पों का पर्व है। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति में निहित कृतज्ञता, आत्मोन्नति और पारिवारिक दायित्व की भावना का प्रतीक भी है।
आज का समाज वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों के आधार पर किसी भी अवधारणा को समझना चाहता है। यह स्वाभाविक भी है। ऐसे में श्राद्ध को लेकर मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जो पूर्वज इस संसार से विदा हो चुके हैं, उनके लिए किए जाने वाले कर्मों का फल उन तक किस प्रकार पहुंचता होगा? साथ ही, इन कर्मों से हमें क्या लाभ मिलता है?
भारतीय संस्कृति में मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर ईश्वर से एकाकार होना अर्थात मोक्ष प्राप्त करना माना गया है। मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह स्वभावतः पशुवत होता है। हमारी संस्कृति और परंपराओं में समाहित संस्कारों का उद्देश्य उसे पशुत्व से मानवत्व और मानवत्व से देवत्व की ओर ले जाना है, ताकि वह मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सके।
जब मनुष्य जीवित रहता है, तब वह अपने आत्मकल्याण के लिए स्वयं प्रयास करता है। किंतु शरीर छोड़ने के बाद आत्मा जिस अवस्था में होती है, वहां से उच्चतर लोकों की ओर उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए वह शरीर के अभाव में किस प्रकार प्रयास करे? इसी विचार के आधार पर हमारी संस्कृति में दिवंगत आत्मा की उन्नति के लिए श्राद्ध की व्यवस्था की गई है।
शरीर और आत्मा का संबंध
मनुष्य को शरीर और आत्मा का समुच्चय माना गया है। आधुनिक विज्ञान शरीर को पदार्थ और आत्मा को ऊर्जा के रूप में समझने का प्रयास करता है। शरीर पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित माना गया है। वहीं ऊर्जा के स्तर पर विज्ञान विद्युत और रासायनिक प्रक्रियाओं की चर्चा करता है, जो शरीर में स्पंदन, संकेत और विभिन्न जैव-रासायनिक क्रियाओं के रूप में दिखाई देती हैं।
जब यह ऊर्जा अर्थात आत्मा शरीर को छोड़ देती है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। परंपरा के अनुसार पार्थिव शरीर को पंचतत्वों में विलीन करने के लिए अंतिम संस्कार किया जाता है। यहां प्रश्न उठता है कि शरीर तो अपने मूल तत्वों में विलीन हो गया, लेकिन उस आत्मा अथवा ऊर्जा का क्या होता है?
विज्ञान का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; उसका केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन होता है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आत्मा को भी अजर-अमर माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥”
अर्थात आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न वायु सुखा सकती है। भारतीय दर्शन में यह विचार हजारों वर्षों से विद्यमान है कि आत्मा नष्ट नहीं होती, बल्कि शरीर परिवर्तनशील है।
आधुनिक विज्ञान में पदार्थ और ऊर्जा के संबंध को समझाने वाला प्रसिद्ध सूत्र E=mc² भी पदार्थ और ऊर्जा के परस्पर संबंध को स्पष्ट करता है। भारतीय चिंतन में भी शरीर को परिवर्तनशील और आत्मा को शाश्वत माना गया है।
भगवान श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय में कहते हैं—
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥”
अर्थात जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को धारण करती है।
कर्मफल का सिद्धांत
अब प्रश्न उठता है कि आत्मा नया शरीर किस आधार पर प्राप्त करती है? भारतीय दर्शन इसके लिए कर्मफल सिद्धांत को आधार मानता है। जिस प्रकार सूर्य का उदय-अस्त, ग्रहों की गति और ऋतुचक्र निश्चित नियमों के अनुसार संचालित होते हैं, उसी प्रकार जन्म और मृत्यु के बाद आत्मा की गति भी एक व्यवस्था के अधीन मानी गई है।
हमारी संस्कृति में वर्णित सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति अपने पूर्वजों को हो, उनकी दिवंगत आत्मा को सद्गति मिले और यदि कर्मफल के आधार पर उनका पुनर्जन्म होना है तो उन्हें आगे की यात्रा में सहायता मिले—इन भावनाओं के साथ श्राद्ध किया जाता है।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि धरती पर किए गए श्राद्धकर्म का प्रतिफल संबंधित आत्मा तक कैसे पहुंचता है?
संकल्प और स्पंदनों की अवधारणा
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में संकल्प को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि प्रकृति में ऊर्जा विभिन्न रूपों में विद्यमान है और प्रत्येक क्रिया का अपना प्रभाव होता है। इसी दृष्टि से देखें तो श्रद्धा और निष्ठा के साथ किया गया संकल्प भी एक विशेष मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न करता है।
जब हम किसी सत्कर्म का आरंभ संकल्प के साथ करते हैं और उस संकल्प में किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा आत्मा का स्मरण करते हैं, तो भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार उस संकल्प से उत्पन्न सूक्ष्म स्पंदन एक निश्चित दिशा में कार्य करते हैं।
इसे आधुनिक तकनीक के उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे किसी लक्ष्य को निर्धारित कर टार्गेट-गाइडेड मिसाइल अपने लक्ष्य की ओर निर्देशित की जाती है, उसी प्रकार संकल्प को भी एक लक्ष्य-निर्दिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। जिस आत्मा के लिए श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है, उसके प्रति समर्पित भावना और कर्म का फल उसी आत्मा तक पहुंचने की आध्यात्मिक मान्यता है।
लोकों की अवधारणा
भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में ब्रह्मांड और विभिन्न लोकों की विस्तृत अवधारणा मिलती है। भगवान दत्तात्रेय के प्रथम अवतार माने जाने वाले भगवान श्रीपाद श्रीवल्लभ के चरित्रामृत में भी विभिन्न लोकों का वर्णन मिलता है। भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा अपने कर्मों के आधार पर विभिन्न अवस्थाओं और लोकों में गति करती है।
यदि कोई आत्मा अपने कर्मों के आधार पर किसी लोक में स्थित है और उच्चतर अवस्था की ओर उन्नति की दिशा में अग्रसर है, तो श्राद्ध और तर्पण जैसे कर्मों से किए गए संकल्पों को उसके लिए सहायक माना गया है। इसी प्रकार यदि आत्मा पुनर्जन्म लेकर धरती पर आती है तो उसके जीवन में सकारात्मक दिशा और सद्कर्मों के लिए पूर्वजों के आशीर्वाद की अवधारणा भी भारतीय समाज में प्रचलित है।
श्राद्ध में ‘क्षुत्पिपासा’ का अर्थ
श्राद्ध के समय लिया जाने वाला संकल्प भी अपने आप में गहरा आध्यात्मिक अर्थ रखता है। इसमें पूर्वजों की “क्षुत्पिपासा निवृत्ति” और “अक्षय तृप्ति” की कामना की जाती है।
यहां एक प्रश्न उठ सकता है कि जब आत्मा शरीर और उसके अवयवों से रहित है तो उसे भूख-प्यास कैसे लग सकती है?
शास्त्रीय दृष्टि से यहां भूख-प्यास का अर्थ केवल शारीरिक भूख-प्यास नहीं है। सद्गति की आकांक्षा, आत्मोन्नति की अभिलाषा और ईश्वर से एकाकार होने की इच्छा को आत्मा की वास्तविक ‘भूख-प्यास’ माना गया है। इसलिए “अक्षय तृप्ति” का आशय केवल भौतिक तृप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की उच्चतम अवस्था और मोक्ष की कामना से है।
सामग्री, स्थान और समय का महत्व
पितृतर्पण और श्राद्ध के समय कुशा, जौ, काला तिल, अक्षत और जल आदि का उपयोग किया जाता है। भारतीय परंपरा में इन सामग्रियों को विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व दिया गया है। इनके साथ संकल्प, स्थान, समय और विधि का संयोजन श्राद्धकर्म को पूर्णता प्रदान करता है।
इसे आधुनिक विज्ञान के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जिस प्रकार मोबाइल फोन एक निश्चित आवृत्ति के संकेतों को ग्रहण और प्रसारित करता है, उसी प्रकार भारतीय परंपरा में श्राद्ध की सामग्री और विधियों को संकल्प की सूक्ष्म प्रक्रिया को प्रभावी बनाने वाला माध्यम माना गया है।
समय और स्थान का भी इसमें विशेष महत्व है। जिस प्रकार आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान में रॉकेट प्रक्षेपण के लिए उपयुक्त समय और स्थान का चयन किया जाता है, उसी प्रकार भारतीय परंपरा में गया, नासिक, उज्जैन, जलाशयों के तट और अपने निवास आदि स्थानों को श्राद्धकर्म के लिए उपयुक्त माना गया है।
इन स्थानों को आध्यात्मिक दृष्टि से ऐसे माध्यम के रूप में देखा जा सकता है, जहां संकल्प और तर्पण की प्रक्रिया विशेष रूप से प्रभावी मानी गई है।
श्राद्ध : कृतज्ञता का संस्कार
हमारे पूर्वजों ने श्राद्ध की विधि, समय, स्थान और सामग्री का निर्धारण लंबे अनुभव और परंपरागत ज्ञान के आधार पर किया। इसका मूल उद्देश्य केवल किसी कर्मकांड की पूर्ति नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनकी आत्मोन्नति की कामना करना है।
भारतीय परंपरा में यह विश्वास है कि जब हम श्रद्धा और संकल्प के साथ अपने पूर्वजों के लिए शुभकामना करते हैं, तो वह सकारात्मक भाव उनके लिए सहायक बनता है। वहीं पूर्वजों के आशीर्वाद को भी हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संकल्पों की पूर्ति में सहायक माना गया है।
इस प्रकार श्राद्ध केवल अतीत का स्मरण करने की परंपरा नहीं है। यह वर्तमान को संस्कारित करने और भविष्य को शुभ बनाने का भी माध्यम है। इसमें पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है, आत्मा की उन्नति की कामना है, परिवार और परंपरा से जुड़ाव है तथा अपने जीवन को भी उच्चतर मूल्यों की ओर ले जाने का संकल्प है।
श्राद्ध इसलिए केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मोन्नति और संकल्पपूर्ति का पर्व है।
— गिरीश जोशी
संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार