भील बालिका कालीबाई का बलिदान : गुरु-भक्ति का अद्वितीय उदाहरण
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डॉ. शुचि चौहान
June 20, 2026
लेख
राजस्थान की धरती ने अनेक ऐसे वीर-वीरांगनाओं को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और बलिदान से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। इनमें एक नाम भील समाज की साहसी बालिका कालीबाई का भी है, जिसने मात्र तेरह वर्ष की आयु में अपने गुरु की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर शिक्षा, गुरु-भक्ति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कालीबाई का नाम उन वीर बाल बलिदानियों में लिया जाता है, जो अपने आदर्शों के लिए सर्वोच्च बलिदान देने में भी नहीं हिचके और भारतीय समाज की प्रेरणा व गौरव के प्रतीक बन गए।
कालीबाई का जन्म डूंगरपुर रियासत के रास्तापाल गांव में भील समुदाय के एक साधारण परिवार में हुआ था। उस समय राजस्थान की अधिकांश रियासतों में शिक्षा का प्रसार बहुत सीमित था, विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में। डूंगरपुर रियासत में भी शिक्षा के प्रति शासक वर्ग का दृष्टिकोण उत्साहजनक नहीं था। इसके विपरीत कुछ समाजसेवी और शिक्षा-प्रेमी इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रयासरत थे। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत रास्तापाल गांव में एक विद्यालय संचालित किया जा रहा था। इस विद्यालय के संचालन में नानाभाई खांट और शिक्षक सेंगाभाई का महत्वपूर्ण योगदान था।
1940 के दशक में देश स्वतंत्रता आंदोलन की लहर से प्रभावित था। शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और जागरूकता का माध्यम माना जाने लगा था। तब देशी रियासतें ब्रिटिश “पैरामाउंटसी” (Paramountcy) के अंतर्गत आती थीं। अंग्रेजों की नीति यह थी कि रियासतों में ऐसी राजनीतिक गतिविधियों को सीमित रखा जाए जो जनता को संगठित कर सकती थीं। राजस्थान की कई रियासतों में उस समय प्रजामंडल आंदोलन चल रहे थे। समाज जागरण बढ़ रहा था। शिक्षा के माध्यम से राजनीतिक चेतना फैल रही थी। राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों तक पहुंच रहा था। ब्रिटिश प्रशासन और कई रियासती शासक इन गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। इसी के चलते अनेक स्थानों पर चल रहे विद्यालय बंद कराए जा रहे थे। रास्तापाल का विद्यालय भी इनमें से एक था।
19 जून 1947 का दिन राजस्थान के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। उस दिन रियासत के अधिकारी, पुलिस और सशस्त्र बल विद्यालय को बंद कराने के लिए रास्तापाल पहुंचे। उन्होंने विद्यालय के संचालकों को तत्काल विद्यालय बंद करने का आदेश दिया। नानाभाई खांट और शिक्षक सेंगाभाई ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि शिक्षा प्राप्त करना बच्चों का अधिकार है और विद्यालय बंद नहीं किया जाना चाहिए।
स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस ने बल प्रयोग शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार अधिकारियों के आदेश पर नानाभाई खांट को गोली मार दी गई। वे वहीं बलिदान हो गए। इसके बाद शिक्षक सेंगाभाई को बुरी तरह पीटा गया। उन्हें रस्सियों से बांधकर एक जीप के पीछे घसीटते हुए ले जाया जाने लगा। यह दृश्य अत्यंत भयावह था। ग्रामीण भयभीत थे लेकिन पुलिस के आतंक के कारण कोई आगे आने का साहस नहीं कर पा रहा था।
उस समय तेरह वर्षीय कालीबाई पास ही के अपने एक खेत में घास काट रही थी। जब उसे पता चला कि उसके गुरु सेंगाभाई को पुलिस द्वारा घसीटा जा रहा है, तो वह तुरंत हाथ में घास काटने की हंसिया लेकर दौड़ी। गुरु के प्रति उसके मन में गहरा सम्मान और प्रेम था। उससे अपने शिक्षक को इस तरह घसीटे जाना सहन नहीं हुआ। वह बिना किसी भय के जीप के पास पहुंची और हंसिए से रस्सी काटने लगी। पुलिस ने उसे रोकने का प्रयास किया और धमकाया, लेकिन वह नहीं रुकी। अंततः उसने रस्सी काट दी और अपने गुरु को मुक्त कर दिया। यह साहसिक कार्य उस समय किया गया जब सामने बंदूकधारी पुलिस बल मौजूद था। यह एक असाधारण घटना थी।
रस्सी कटते ही पुलिसकर्मी क्रोधित हो उठे। पुलिस ने कालीबाई पर गोली चला दी। गोली लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गई। बाद में उसने अपने प्राण त्याग दिए। इस प्रकार गुरु की रक्षा करते हुए वह बलिदान हो गई। यह बलिदान उस समय हुआ, जब देश की स्वाधीनता में केवल दो महीने शेष थे।
भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। कबीरदास लिखते हैं— “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।” कालीबाई ने इस आदर्श को अपने जीवन से चरितार्थ कर दिखाया।
आज डूंगरपुर जिले में कालीबाई की स्मृति में स्मारक स्थापित हैं। रास्तापाल गांव और आसपास के क्षेत्रों में उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। डूंगरपुर में स्थापित कालीबाई स्मारक जनजाति समाज की चेतना और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। कालीबाई की स्मृति में विद्यालयों, छात्रावासों और विभिन्न संस्थानों का नामकरण भी किया गया है।
कालीबाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि साहस आयु का मोहताज नहीं होता। मात्र तेरह वर्ष की वय में इस बालिका ने जो किया, वह किसी अनुभवी योद्धा के लिए भी कठिन हो सकता था।
आज कालीबाई का नाम राजस्थान के इतिहास में गुरु-भक्ति, साहस और बलिदान के स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित है। वे केवल डूंगरपुर या राजस्थान की नहीं, बल्कि पूरे भारत की ऐसी वीर बालिका हैं, जिनका नाम सम्मान और श्रद्धा के साथ सदैव स्मरण किया जाएगा।