हिंसा पर न्याय, न कि पक्षपात
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सुरक्षित है, किंतु हिंसा, षड्यंत्र और कानून हाथ में लेने वालों की निष्पक्ष जांच तथा कठोर जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक
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अवधेश कुमार
August 02, 2026
लेख
उच्चतम न्यायालय का यह मत सर्वथा उचित है कि हिंसा चाहे किसी भी पक्ष की हो, उसकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जिस प्रकार इस मामले पर विचार किया है, उससे स्पष्ट है कि न्यायालय पूरे घटनाक्रम की समग्र और निष्पक्ष पड़ताल चाहता है। प्रचार के प्रभाव से ऐसा वातावरण बना है, मानो हिंसा केवल एकपक्षीय हुई हो और केवल पुलिस की कार्रवाई ही जांच का विषय हो। यदि पुलिस ने कहीं ज्यादती की है तो उसकी निष्पक्ष जांच अवश्य होनी चाहिए, किंतु जिस प्रकार विभिन्न स्थानों पर पुलिस के वाहन तोड़े गए, पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर हमले हुए, पत्रकारों को घेरकर रखा गया, अनेक पत्रकारों के लिए अपना कार्य करना कठिन हो गया तथा महिला पत्रकारों तक के साथ हिंसा की घटनाएं सामने आईं, उनकी अनदेखी भविष्य में पूरे देश के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकती है।
वास्तव में कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर धरने और संसद मार्च के दौरान जो कुछ भी अवांछित घटनाएं हुईं, उनसे देश का सामान्य, विवेकशील और संतुलित समाज विचलित एवं भयभीत है। इसलिए उच्चतम न्यायालय का यह मानना पूरी तरह उचित है कि लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया ऐसे हैं, जिनकी विस्तृत, निष्पक्ष और तटस्थ जांच किसी उच्चस्तरीय पैनल द्वारा कराई जानी चाहिए। न्यायालय ने केंद्र सरकार के साथ-साथ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, केरल और मध्य प्रदेश सहित अन्य संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों से उत्तर मांगा है। न्यायपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ताओं के आरोप स्वतंत्र जांच का प्रारंभिक आधार बनाते हैं। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि जांच के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंताओं तथा केंद्र सरकार की दलीलों की भी समान रूप से समीक्षा की जानी चाहिए।
न्यायालय ने बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाले हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों और छात्रों को तत्काल रिहा करने तथा फिलहाल उनके विरुद्ध किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने का भी निर्देश दिया है। इसमें तत्काल कोई समस्या नहीं है। कई बार जब कोई समूह हिंसक हो जाता है तो कुछ निर्दोष और वास्तविक छात्र भी भीड़ की मानसिकता के प्रभाव में आ जाते हैं। हिंसा निस्संदेह अपराध है, किंतु ऐसे छात्रों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। इसी कारण न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह संरक्षण असामाजिक तत्वों अथवा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा।
यह घटनाक्रम केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। इसके प्रभाव अथवा परोक्ष प्रयासों के कारण देश के विभिन्न राज्यों में भी प्रदर्शन हुए और लगभग हर स्थान पर उग्रता, हिंसा तथा अव्यवस्था देखने को मिली। परिस्थितियों को देखते हुए यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि न्यायालय केंद्र और राज्य सरकारों का पक्ष सुनने के बाद किसी उच्चस्तरीय विशेष जांच दल के गठन पर विचार करे। ऐसा होना भी उचित होगा। यदि धरना-प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा और अन्य अपराध करने वालों को दंड नहीं मिला, तो इससे ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ेगा और भविष्य में उन्हें नियंत्रित करना और कठिन हो जाएगा।
इसी दृष्टि से न्यायालय ने हिंसा से जुड़े सभी संभावित साक्ष्यों—सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन कैमरों की रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार रिकॉर्ड, पीसीआर कॉल तथा अन्य डिजिटल साक्ष्यों—को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान न्यायपीठ ने स्पष्ट कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को संविधान के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। साथ ही यह भी दोहराया कि दोनों पक्षों की ओर से हुई हिंसा की समान रूप से जांच होना आवश्यक है। संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, किंतु यदि ऐसे प्रदर्शनों में अन्य तत्व घुसकर अपराध करते हैं तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इस मामले में पुलिस कार्रवाई से लेकर केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अनेक वरिष्ठ अधिवक्ता उपस्थित थे, जबकि सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। सभी पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जो लोग कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उनसे कानून के अनुसार ही निपटा जाना चाहिए।
इस प्रकार न्यायालय का मत पूरी तरह स्पष्ट है कि कोई निर्दोष व्यक्ति फंसना नहीं चाहिए, किंतु दोषी, अपराधी और षड्यंत्रकारी भी कानून की पकड़ से बचने नहीं चाहिए। नीट का प्रश्नपत्र लीक हो अथवा किसी अन्य परीक्षा का, यह पूरे देश के लिए राष्ट्रीय शर्म का विषय है। छात्रों, अभिभावकों और समाज के भीतर आक्रोश स्वाभाविक है। इसके लिए जिम्मेदार और संलिप्त लोगों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जो भविष्य के लिए उदाहरण बने। साथ ही परीक्षा प्रणाली को लीक-प्रूफ, स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। इससे किसी को भी असहमति नहीं हो सकती।
पिछले कुछ वर्षों में धरना-प्रदर्शनों और आंदोलनों का जो स्वरूप उभरकर सामने आया है, उसने भारत के प्रत्येक विवेकशील नागरिक को चिंतित किया है। वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में शाहीन बाग से आरंभ हुआ आंदोलन स्मरण कीजिए। लंबे समय तक सड़कें अवरुद्ध रहीं और उस दौरान हिंसा भी हुई। अंततः दिल्ली में दंगे हुए, जिनमें 50 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद कृषि कानूनों के विरोध में चले आंदोलन को देश ने देखा। गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर दिल्ली की सड़कों पर इस प्रकार दौड़े मानो वे हथियारबंद वाहन हों। ट्रैक्टर पलटने से लोगों की मृत्यु हुई। लाल किले पर जिस प्रकार का हुड़दंग हुआ, वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला। पुलिसकर्मियों को धक्के देकर गिराया गया और अनेक घायल होकर अस्पताल पहुंचे।
इसी प्रकार अग्निवीर योजना के विरोध में हुए प्रदर्शनों में भी व्यापक हिंसा देखने को मिली। नेताओं के घरों पर हमले हुए, ट्रेनें, रेलवे स्टेशन और थाने जलाए गए। भारत विरोधी, विभाजनकारी तथा राष्ट्रीय एकता-अखंडता को चुनौती देने वाले नारे लगाए गए। कई स्थानों पर सांप्रदायिक और अतिवादी वक्तव्य भी सामने आए। इनमें से अधिकांश मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर आगे बढ़ने का प्रयास किया तो अनेक मामलों में उन्हें वापस ले लिया गया। परिणामस्वरूप ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ा। भारत को तोड़ने जैसी बातें करने वाले शर्जिल इमाम के समर्थन में जिस प्रकार बड़ी संख्या में लोग सामने आते हैं और न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता उनका पक्ष रखते हैं, वह भी इस व्यापक परिदृश्य का हिस्सा है।
धरना, प्रदर्शन और आंदोलन लोकतंत्र के स्वाभाविक अंग हैं। किंतु यदि हिंसा, अवांछित वक्तव्य और आपराधिक घटनाएं इन आंदोलनों की स्थायी प्रवृत्ति बनती जा रही हैं, तो उसका समाधान हर हाल में खोजा जाना चाहिए। यह केवल न्यायपालिका का ही नहीं, बल्कि विधायिका, राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं, एक्टिविस्टों और समाज के विवेकशील वर्ग का भी साझा दायित्व है। ऐसे वातावरण का लाभ अंततः देश विरोधी शक्तियां ही उठाती हैं।
सरकारी तंत्र में यदि कभी कोई अपराध या भ्रष्टाचार हुआ है, तो यह कोई गारंटी नहीं दी जा सकती कि भविष्य में ऐसा कभी नहीं होगा। इसलिए कोई भी व्यवस्था समय से परे नहीं हो सकती। समय की आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें परिवर्तन और सुधार होते रहना चाहिए। अवांछित तत्व ऐसी घटनाओं का दुरुपयोग कर लोगों को भड़काने और व्यापक अव्यवस्था उत्पन्न करने का प्रयास कर सकते हैं। इसी संदर्भ में उच्चतम न्यायालय का यह कथन दूरदर्शितापूर्ण प्रतीत होता है कि बड़े पैमाने पर होने वाले विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक ऐसी स्थायी व्यवस्था की आवश्यकता हो सकती है, जिसे किसी भी आपात स्थिति में तत्काल सक्रिय किया जा सके। किसी भी शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन को हिंसक दिशा दिए जाने का खतरा सदैव बना रहता है।
अच्छा होगा कि केंद्र और राज्य सरकारों के प्रत्युत्तर प्राप्त होने के बाद उच्चतम न्यायालय अपनी व्यक्त मंशा के अनुरूप एक उच्चस्तरीय विशेष जांच दल का गठन करे, जो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न केवल दोषियों की पहचान कर उन्हें कानून के अनुसार दंडित कराने की दिशा में कार्य करे, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने, त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने और स्थिति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए एक स्थायी व्यवस्था की भी अनुशंसा करे।