भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक- डॉ. कृष्ण गोपाल
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वीएसके डेस्क
June 15, 2026
समाचार › देश-विशेष
वाराणसी, 15 जून।विज्ञान भारती के 7वें राष्ट्रीय अधिवेशन के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने “भारत की विज्ञान परंपरा: पौराणिक से आधुनिक तक” विषय पर उद्बोधन दिया। कार्यक्रम का आयोजन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में किया गया, जिसमें देशभर से आए वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों ने सहभागिता की।
उन्होंने कहा कि भारत का वैज्ञानिक इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना उसका सांस्कृतिक इतिहास। भारतीय ज्ञान परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म परस्पर पूरक रहे हैं। उन्होंने काशी को विश्व की प्राचीनतम जीवित नगरी बताते हुए कहा कि यहाँ आज भी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक एवं ज्ञान परंपराएँ जीवंत रूप में विद्यमान हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, व्याकरण, आयुर्वेद, गणित और दर्शन सहित समस्त ज्ञान-विधाएँ विज्ञान के व्यापक स्वरूप का हिस्सा हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य लोकमंगल, प्रकृति संरक्षण और मानवता का कल्याण रहा है। महेंद्र लाल सरकार द्वारा 1876 में स्थापित भारतीय विज्ञान परिषद के 150 वर्ष पूरे होने वाले हैं और ये यात्रा का नया स्वरूप है जो धैर्य, लगन और कर्मठता का विषय है। भारतीय ज्ञान सार्वभौम है, इसका उद्देश्य केवल धनोपार्जन नहीं है।
डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने महेंद्रलाल सरकार, जगदीश चंद्र बोस, सी. वी. रमन, शांति स्वरूप भटनागर, विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जी. एन. रामचंद्रन, अन्ना मणि, आत्माराम तथा येल्लाप्रगडा सुब्बाराव, जानकी अम्मा जैसे वैज्ञानिकों के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने सीमित संसाधनों में भी विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। इन वैज्ञानिकों का जीवन केवल शोध और आविष्कारों तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण, नैतिकता, टीम भावना और समाज सेवा के आदर्शों से भी प्रेरित था।
उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता के कल्याण का साधन बने, इसके लिए उसे भारतीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और लोकहित की भावना से जोड़ना आवश्यक है। विज्ञान हमें ऊँचाई देता है और अध्यात्म हमें गहराई, इस सूत्र वाक्य से उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से भारतीय वैज्ञानिक विरासत का अध्ययन कर उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का आह्वान किया। अध्यात्म और विज्ञान में भी समन्वय का कार्य वैज्ञानिकों को करना चाहिए।