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परिवार में संवाद और मानसिक संतुलन समय की आवश्यकता : डॉ. मोहन भागवत

By वीएसके डेस्क July 06, 2026
समाचार › देश-विशेष
परिवार में संवाद और मानसिक संतुलन समय की आवश्यकता : डॉ. मोहन भागवत
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि नई पीढ़ी में बढ़ते अकेलेपन, मानसिक अस्थिरता और आत्मघाती प्रवृत्तियों को रोकने के लिए परिवार में आत्मीय संवाद का वातावरण बनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज बच्चों और युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शारीरिक स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और भावनात्मक सुदृढ़ता की भी है। नागपुर में सन्मार्ग वेलनेस सेंटर के लोकार्पण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत ने मानसिक स्वास्थ्य, भारतीय मनोविज्ञान और परिवार की भूमिका पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज की जीवनशैली में बच्चों के साथ संवाद की परंपरा कमजोर होती जा रही है। बच्चा रोता है तो उसे समझने और उससे बात करने के बजाय उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया जाता है, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि उसके मन को समझा जाए, उससे आत्मीय संवाद किया जाए और उसके भीतर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित की जाए। उन्होंने कहा कि पहले परिवारों में ग्रंथ पढ़ने, कथा-संवाद करने और दादी-नानी द्वारा कहानियाँ सुनाने की समृद्ध परंपरा थी। इन माध्यमों से बच्चों के भीतर संस्कार, धैर्य, संवेदनशीलता और मानसिक दृढ़ता का विकास होता था। आज संयुक्त परिवारों के विघटन और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के कारण यह परंपरा क्षीण हुई है। माता-पिता भी कई बार बच्चों को समय देने के बजाय टीवी, मोबाइल या इंटरनेट के भरोसे छोड़ देते हैं, जिसका प्रभाव उनके मानसिक विकास पर पड़ता है। डॉ. भागवत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज बारहवीं कक्षा में असफल होने, घर में डाँट पड़ने या जीवन की अन्य छोटी-छोटी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कुछ युवा आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठा लेते हैं। यह स्थिति बताती है कि समाज को बच्चों और युवाओं के भीतर ऐसा मन विकसित करने की आवश्यकता है, जो संघर्षों और असफलताओं का धैर्यपूर्वक सामना कर सके। इसके लिए परिवार और समाज, दोनों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों और युवाओं को अकेलेपन से बचाना तथा उनके साथ सतत संवाद बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सरसंघचालक ने कहा कि स्वास्थ्य का अर्थ केवल शरीर का स्वस्थ होना नहीं है; मन का स्वस्थ होना भी उतना ही आवश्यक है। शरीर की अस्वस्थता मन को प्रभावित करती है और मन की दुर्बलता व्यक्ति के स्वभाव, व्यवहार और निर्णय क्षमता पर असर डालती है। उन्होंने कहा कि मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। मनुष्य के जन्म के साथ ही मन का निर्माण प्रारंभ हो जाता है और वह अनुभवों से आकार ग्रहण करता है। यदि जीवन में अच्छे अनुभव, सकारात्मक विचार और स्वस्थ वातावरण मिले तो मन सुदृढ़ बनता है, जबकि नकारात्मक अनुभव, तनाव और अवसाद मन को कमजोर करते हैं। इसलिए मनुष्य के समग्र विकास में प्रारंभ से अंत तक मन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। डॉ. भागवत ने यह भी कहा कि भारत में मन, उसकी चिकित्सा और उसके अध्ययन की अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है। भारतीय चिंतन में मन, बुद्धि, चित्त और आत्मा के संबंध में गहन मंथन हुआ है। इस परंपरा का गंभीर अध्ययन और आधुनिक संदर्भों में उसका पुनर्पाठ किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी शास्त्र का विकास और उसमें पूर्णता मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। जब ज्ञान समग्र और परिपूर्ण होता है, तभी समाज का व्यापक हित संभव होता है। उन्होंने आह्वान किया कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रश्न को केवल चिकित्सकीय दृष्टि से न देखकर सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी समझा जाए। परिवारों में संवाद, आत्मीयता, कथा-परंपरा और संस्कारपूर्ण वातावरण का पुनर्निर्माण ही आने वाली पीढ़ी को मानसिक रूप से सक्षम, संतुलित और जीवनमूल्यनिष्ठ बना सकता है।

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