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भारतीय ज्ञान परंपरा दुनिया की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम: डॉ. मोहन भागवत

By वीएसके डेस्क October 03, 2026
समाचार › संघ व विविध संगठन
भारतीय ज्ञान परंपरा दुनिया की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम: डॉ. मोहन भागवत
मुंबई, 2 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में दुनिया के सामने मौजूद अनेक चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि आज विश्व विरोधाभासों, संघर्षों और चरम विचारधाराओं से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहा है, ऐसे समय में भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा मानवता को मार्गदर्शन दे सकती है। डॉ. मोहन भागवत मुंबई के बोरीवली में आयोजित ‘अखिल भारतीय विहार सेवा ग्रुप’ के 14वें सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पद्म भूषण से सम्मानित परम पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरीजी महाराज, आचार्य महाबोधि सूरीश्वरजी सहित अन्य आचार्य और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। डॉ. भागवत ने कहा कि भारत में राष्ट्र और धर्म को अलग-अलग नहीं देखा जाता। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है और धर्म राष्ट्र की अवधारणा को बनाए रखने का कार्य करता है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। उनके अनुसार राष्ट्र कमजोर होने पर धर्म संकट में पड़ सकता है और धर्म का पालन कमजोर होने पर राष्ट्र के पतन का खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसलिए दोनों को संतुलित रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी अन्य देशों पर आक्रमण या जबरन धार्मिक धर्मांतरण के माध्यम से अपने ज्ञान का प्रसार नहीं किया। भारत ने मानवता के कल्याण के प्रति निःस्वार्थ प्रतिबद्धता के कारण दुनिया के साथ अपनी ज्ञान परंपरा साझा की। उन्होंने इसे भारतीय ज्ञान विरासत की विशिष्ट विशेषता बताया। डॉ. भागवत ने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के साथ-साथ जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे ग्रंथों में व्यापक ज्ञान समाहित है, जो मानव जीवन को दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने संतों की शिक्षाओं को भी मानव कल्याण, सामाजिक सद्भाव और सेवा की भावना से जोड़ते हुए कहा कि आज दुनिया को इस समृद्ध ज्ञान विरासत की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की रक्षा करना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता के प्रति दायित्व है। संत परंपरा और निःस्वार्थ सेवा की भावना को संरक्षित करना समाज के सुरक्षित और कल्याणकारी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

संस्कृति की रक्षा के लिए मूल्यों और संस्कारों पर जोर

कार्यक्रम में विहार सेवकों और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए पद्म भूषण से सम्मानित परम पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरीजी महाराज ने कहा कि किसी देश की संस्कृति उसकी पहचान और अस्तित्व से जुड़ी होती है। उन्होंने संस्कृति की रक्षा और संरक्षण के लिए मूल्यों एवं संस्कारों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। आचार्य विजय रत्नसुंदरसूरीजी महाराज ने राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र की संस्कृति की रक्षा के विषयों में संघ के साथ खड़े होने की बात भी कही।

जैन साधुओं की सुरक्षित यात्राओं के लिए कार्य करता है विहार सेवा ग्रुप

अखिल भारतीय विहार सेवा ग्रुप’ देशभर में पैदल यात्रा करने वाले जैन साधुओं की सुरक्षित और दुर्घटना-मुक्त यात्राओं को सुनिश्चित करने के लिए कार्य करता है। कार्यक्रम के दौरान आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरीजी महाराज की 536वीं पुस्तक ‘आनंद यात्रा – अठारह कर्तव्य’ का विमोचन डॉ. मोहन भागवत द्वारा किया गया। आचार्य श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरीजी महाराज अब तक 500 से अधिक पुस्तकों की रचना कर चुके हैं।

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