‘सेवा में सबका साथ, श्रेय की नहीं कोई बात’ : डॉ. मोहन भागवत
कारंजा में स्मृति भवन एवं माधव नेत्रालय का लोकार्पण, सेवा और सामूहिक सहभागिता पर दिया जोर
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वीएसके डेस्क
October 07, 2026
समाचार › देश-विशेष
कारंजा, लांजी (बालाघाट)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक स्वर्गीय बालासाहेब देवरस एवं ज्येष्ठ प्रचारक स्वर्गीय भाऊराव देवरस के पैतृक ग्राम कारंजा में स्मृति भवन एवं माधव नेत्रालय का लोकार्पण आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने किया। इस अवसर पर मानकर ट्रस्ट के अध्यक्ष अतुल शिरोडकर, मध्य क्षेत्र संघचालक पूर्णेंदु सक्सेना, विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार तथा न्यास के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. पवन सहित बड़ी संख्या में नागरिक और गणमान्यजन उपस्थित रहे।
लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि जहां प्रत्यक्ष रूप से सेवा और समाजहित का कार्य हो रहा हो, वहां भाषण से अधिक महत्व कार्य का होता है। भाषण समय के साथ भुलाए जा सकते हैं, लेकिन समाज के लिए किया गया कार्य लंबे समय तक याद रहता है।
उन्होंने कहा कि बालासाहेब देवरस और भाऊराव देवरस का जीवन देश और समाज की सेवा के लिए समर्पित रहा। उनकी स्मृति को जीवंत बनाए रखने का सबसे सार्थक माध्यम उनके विचारों और कार्यों को आगे बढ़ाना है। स्मृति भवन और महापुरुषों के जीवन पर आधारित प्रदर्शनी नई पीढ़ी को उनके जीवन एवं विचारों से प्रेरणा देने का माध्यम बनेगी।
डॉ. भागवत ने कहा कि किसी महापुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल उनके जीवन-चरित्र को पढ़ने या स्मरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके जीवन से मिलने वाले संदेश को अपने आचरण में उतारना चाहिए। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब समाज के सामने संकट आया, तब पुस्तक प्रकाशन के लिए एकत्रित धन को पीड़ितों की सहायता में लगा दिया गया। इससे मानव सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का संदेश मिलता है।
सेवा कार्यों में सामूहिक सहभागिता के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, “सेवा में सबका साथ, श्रेय की नहीं कोई बात; प्रकल्प में सबका हाथ होना चाहिए।” उन्होंने कहा कि समाजसेवा किसी एक व्यक्ति के श्रेय का विषय नहीं है, बल्कि सभी के सहयोग और सहभागिता से आगे बढ़ने वाला कार्य है।
वीर सावरकर की कविता का संदर्भ देते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि व्यक्ति को प्राप्त ज्ञान, विद्वत्ता और प्रतिभा का उपयोग मातृभूमि एवं समाज के हित में होना चाहिए। शिक्षा और क्षमता का लाभ यदि समाज एवं राष्ट्र को नहीं मिलता, तो वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि बनकर रह जाती है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र के उत्थान के लिए विभिन्न महापुरुषों ने अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान दिया। किसी ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, किसी ने सामाजिक सुधार का कार्य किया, तो किसी ने राजनीतिक जागरण, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान दिया। इन सभी प्रयासों का अंतिम उद्देश्य राष्ट्र का उत्थान रहा।
भारतीय जीवन-दृष्टि में सेवा, त्याग और करुणा की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों के दुःख को देखकर स्वयं व्यथित होना और उसे दूर करने का प्रयास करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। उन्होंने आह्वान किया कि महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रहित, मानव सेवा, त्याग, समर्पण और सामूहिक सहभागिता की भावना को जीवन में उतारना आज की आवश्यकता है। स्मृति भवन एवं माधव नेत्रालय का लोकार्पण इसी सेवा, संस्कार, सामूहिक सहभागिता और समाजहित की भावना को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।