विविधता विभाजन नहीं, एकता का विस्तार है
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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
August 31, 2026
लेख › वैश्विक राजनीति
न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय रिलीजियस फ्रीडम कमीशन के अध्यक्ष आसिफ महमूद जिस यात्रा और कार्यक्रम को लेकर मुखर विरोध में खड़े थे, उसी न्यूयार्क से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत ने ऐसा संदेश दिया, जो किसी एक रिलीजन, संप्रदाय या समुदाय की सीमाओं तक सीमित नहीं है।
ममदानी न्यूयार्क के निर्वाचित मेयर हैं, जबकि आसिफ महमूद यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) के अध्यक्ष हैं। भागवत की अमेरिका यात्रा के विरोध में इन दोनों के साथ कुछ संगठनों और समूहों की ओर से भी आवाज उठाई जा रही थी। कई व्यर्थ आरोप लगाए गए, आरएसएस की विचारधारा पर सवाल खड़े किए गए और कार्यक्रम को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई, किंतु मैडिसन स्क्वायर गार्डन में जब भागवत बोले तो उनके शब्द “मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की भारतीय दृष्टि का उद्घोष थे।”
वस्तुत: अब प्रश्न यह है कि जो लोग ‘हिन्दुत्व’ को विभाजन के चश्मे से देखते हैं, क्या वे न्यूयार्क से निकले इस ‘हिन्दुत्व’ के वास्तविक संदेश को समझेंगे? क्योंकि हिन्दू तत्व का सत्व ही आत्मचेतना को जानने में है। जोकि सर्वव्यापक है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में लगभग 30 देशों के 180 धार्मिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी एवं हजारों अमेरिकन भारतीय रहे। जिस मंच को लेकर विरोध हो रहा था, वहीं से भागवत ने ‘वननेस’ यानी अस्तित्व की एकता को अपने संबोधन का केंद्र बनाया। संदेश साफ था कि दुनिया में भले ही मनुष्य अलग हों, उनकी भाषाएं अलग हों, राष्ट्रीयताएं अलग हों, रिलीजन अलग हों और जीवन जीने की पद्धतियां अलग हों, किंतु इन विविधताओं को मिटाना भारतीय दृष्टि नहीं है। इन विविधताओं के कारण मनुष्यता के मूल संबंध को नकार देना भी भारतीय दृष्टि नहीं है। वास्तव में विविधता वास्तविक है और एकता भी वास्तविक है, इसलिए दोनों को साथ लेकर चलना ही भारत का संदेश और भारत की दृष्टि है।
भागवत ने अपने संबोधन में सबसे पहले उस बुनियादी भ्रम को चुनौती दी जिसमें भारतीय ‘धर्म’ को पश्चिमी अर्थ के ‘रिलीजन’ के बराबर रख दिया जाता है। उन्होंने कहा, धर्म कोई रिलीजन या पूजा-पाठ नहीं है। यह उससे कहीं व्यापक है। यह वह सिद्धांत है जिसके आधार पर ब्रह्मांड और जीवन की व्यवस्था कायम रहती है तथा मनुष्य अपने जीवन के विरोधाभासों के बीच संतुलन स्थापित करता है।
वस्तुत: रिलीजन किसी व्यक्ति की आस्था, पूजा-पद्धति और धार्मिक पहचान हो सकता है, मगर भारतीय चिंतन में धर्म का क्षेत्र कहीं व्यापक है। धर्म व्यक्ति के आचरण से लेकर समाज की व्यवस्था और प्रकृति के साथ संबंध तक फैला हुआ है, इसलिए भागवत का धर्म (हिन्दुत्व) किसी दूसरे रिलीजन को पराजित करने की बात नहीं करता। वह व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन की बात करता है।
व्यक्ति को दबाकर समाज और समाज को कुचलकर व्यक्ति नहीं
भागवत ने विकास के उस मॉडल पर भी प्रश्न खड़ा किया जिसमें किसी एक पक्ष की प्रगति दूसरे के दमन पर टिकी होती है। उनका कहना रहा, समाज की तरक्की के लिए व्यक्तियों को दबाना जरूरी नहीं और व्यक्ति की सफलता के लिए समाज को कमजोर करना भी उचित नहीं। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण यह तीनों को साथ आगे बढ़ना है। एक ओर व्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सामाजिक उत्तरदायित्व कमजोर होता दिखाई देता है, दूसरी ओर सामूहिक पहचान के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने के प्रयास दिखाई देते हैं। भागवत ने इन दोनों अतियों के बीच भारतीय ‘धर्म’ को संतुलन के सिद्धांत के रूप में सामने रखा।
हिन्दुत्व का अर्थ क्या है, न्यूयार्क से दुनिया ने सुना
हिन्दुत्व को लेकर पश्चिमी राजनीतिक विमर्श में लंबे समय से अनेक प्रकार की धारणाएं प्रचलित रही हैं। उसे अक्सर राजनीतिक बहुसंख्यकवाद, धार्मिक वर्चस्व या पहचान-आधारित संघर्ष के फ्रेम में देखा जाता है, किंतु मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भागवत का भाषण इस धारणा के सामने एक अलग वैचारिक पाठ रखता है। यहां हिन्दुत्व की बात किसी को बाहर करने की नहीं, सबको जोड़ने की थी। यहां विविधता से भय की बात नहीं, विविधता के सम्मान की बात थी। यहां अपनी आस्था छोड़ने की बात नहीं, दूसरे की आस्था के प्रति सम्मान की बात थी और यहां एकरूपता थोपने की बात नहीं, विविधता के भीतर मौजूद एकता को पहचानने की बात थी। भागवत ने स्पष्ट किया कि एकता का अर्थ एक जैसा हो जाना नहीं है। वस्तुत: यही अंतर समझना आवश्यक है।
भारत को देखें जरूर, मगर सभ्यतागत भूमिका में
डॉ. भागवत यहां न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी और अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के अध्यक्ष आसिफ महमूद जैसे भारत विरोधी और हिन्दुत्व विरोधियों को यही संदेश देते नजर आए कि भारत को सिर्फ एक भौगोलिक राष्ट्र के रूप में देखने से आगे जाकर उसकी सभ्यतागत भूमिका में उसे देखें। जैसे प्रत्येक राष्ट्र की एक भूमिका, एक संदेश, एक मिशन और एक नियति होती है। उस में भारत की भूमिका दुनिया की विविधताओं के बीच मौजूद एकता को पहचानना और मानवता को समय-समय पर उसकी याद दिलाना है।
उन्होंने सभागार में मौजूद सभी भारतीयों से आग्रह भी किया कि वे अपने आचरण से दिखाएं कि कैसे भारत अपनी सदियों से सभ्यतागत भूमिका निभाता आ रहा है। यानी हिन्दुत्व का दावा शब्दों से नहीं, व्यवहार से प्रमाणित होना चाहिए।
पैसा, पद और सुविधा से आगे है जीवन
यहां भागवत ने भौतिक सुख और समृद्धि को खारिज नहीं किया, किंतु उसके महत्व पर पकाश डालते हुए भारतीय दर्शन में अर्थ और काम को चार पुरुषार्थों में स्थान देने के महत्व को अवश्य ही प्रतिपादित किया। उनका संकेत यह था कि भौतिक उपलब्धियां जीवन की अंतिम मंजिल नहीं हैं। व्यक्ति कितना कमाता है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि वह अपनी कमाई और सामर्थ्य में से कितना दूसरों के लिए उपयोग करता है। यानी सफलता की भारतीय कसौटी संग्रह से अधिक साझेदारी से व्यय एवं परहित करना भी है। यही दृष्टि व्यक्ति को उपभोक्ता से उत्तरदायी नागरिक में बदलती है।
प्रवासी भारतीयों को भी दिया साफ संदेश
अमेरिका में बसे भारतीयों से भागवत ने कहा कि अमेरिका उनकी कर्मभूमि है और उसके प्रति उनकी जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति अमेरिका में रहता है, वहीं काम करता है और वहीं अपना जीवन बनाता है, उसे अमेरिका के प्रति ईमानदार रहना चाहिए। भारत के प्रति उनका संबंध जन्मभूमि और उससे मिले संस्कारों का है। भारत के लिए कुछ करना चाहें तो करें, मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत से मिले मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। यह संदेश भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें राष्ट्रों के बीच संघर्ष नहीं, जिम्मेदारियों के संतुलन की बात है।
अब सवाल ममदानी और आसिफ महमूद से
वस्तुत: यहीं से अब सवाल पैदा होते हैं, क्योंकि ये दोनों एवं इनके साथ कुछ अन्य लोग एवं संगठन मिलकर संघ सर संघचालक की यूएस यात्रा का विरोध कर रहे थे, इसलिए इन सभी से अवश्य पूछा जाना चाहिए कि यदि किसी मंच पर हिन्दू धर्म के नाम पर दूसरे रिलीजन को मिटाने, किसी समुदाय को खत्म करने या किसी दूसरे मनुष्य को नीचा दिखाने का आह्वान होता, तो विरोध करने की बात समझ आती, किंतु यहां तो वह हुआ जोकि मानवता की आवश्यकता है, तब फिर से इससे क्या सीखेंगे?
मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भागवत ने क्या कहा? उन्होंने कहा- विविधता का सम्मान करो।
उन्होंने कहा- एकता को पहचानो।
उन्होंने कहा- व्यक्ति, समाज और पर्यावरण को साथ लेकर चलो।
उन्होंने कहा- दूसरे के भीतर भी उसी अस्तित्व को पहचानो।
उन्होंने कहा- मानव जीवन का उद्देश्य केवल अपने लिए जीना नहीं, दूसरों की सेवा भी है।
उन्होंने कहा- भारत का संदेश उपदेश से नहीं, अपने आचरण से दुनिया तक पहुंचना चाहिए।
तो फिर प्रश्न यह है कि क्या विरोध करने वालों ने वास्तव में भागवत का संदेश आत्मसात किया ?
अब क्या वे इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं कि “हिन्दुत्व” को समझने के लिए उसे सिर्फ राजनीतिक, स्वार्थी, अपने तक सीमित चश्मे से देखना उचति नहीं है? उसकी सार्वभौमिकता एवं उसके सर्वकल्याण के दर्शन को स्वीकार करना चाहिए!
न्यूयार्क में चुनौतियों के बीच आत्म विजय का निकला संदेश
आज दुनिया धार्मिक (रिलीजियस) पहचान के नाम पर बढ़ते संघर्षों से जूझ रही है। युद्ध हैं, विस्थापन है, पूर्वाग्रह है, धार्मिक कट्टरता है, सामाजिक ध्रुवीकरण है और डिजिटल माध्यमों से नफरत का प्रसार है। निश्चित ही ऐसे समय में भागवत का संदेश इन तमाम संकटों के लिए एक चुनौती बनकर सामने आता है। यह चुनौती किसी रिलीजन को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की नहीं है। यह चुनौती उस सोच को है जो मनुष्य को उसकी पांथिक या मजहबी पहचान में सीमित कर देती है।
भारत कहता है- पहचान अलग हो सकती है, अस्तित्व अलग नहीं। पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, मानवता अलग नहीं। भाषा अलग हो सकती है, संवेदना अलग नहीं। जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, मनुष्य होने का मूल सत्य अलग नहीं और यही ‘वननेस’ है। वस्तुत: मैडिसन स्क्वायर गार्डन से भागवत ने इसी भारतीय दृष्टि को दुनिया के सामने रखा है। विरोध के नारों के बीच उन्होंने टकराव का उत्तर विभाजन के सामने एकता की बात रखकर दिया है।
कहना होगा कि यह संदेश न्यूयार्क से निकल चुका है। अब इसे सुनना या न सुनना ममदानी और आसिफ महमूद की पसंद हो सकती है, किंतु याद रखें वे सभी जो इन दोनों से सहमत हैं या दिखे कि सनातन हिन्दू धर्म को को समझे बिना “हिन्दुत्व” पर फैसला सुनाना संभव नहीं है।क्योंकि भागवत ने न्यूयार्क में हिन्दुत्व को लेकर एक बार फिर बताया है कि कैसे “हिन्दुत्व” मानवता को जोड़ने वाली भारतीय दृष्टि है और यही वह संदेश है, जिसे आज न्यूयार्क (यूएस) से लेकर दुनिया की हर राजधानी और हर घर, हर मनुष्य के ह्दय तक समझने की आवश्यकता है। निश्चित ही इसी सोच एवं दर्शन में ही विश्व कल्याण है।