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एकात्म मानवदर्शन केवल भारत नहीं, समस्त मानवता के लिए मार्गदर्शक : होसबाले

बोले- दीनदयाल ने भारत को भारत बनाने की जीवन दृष्टि दी, इसे सामाजिक जीवन में उतारने की जरूरत; तकनीक मानव के सुख के लिए हो

By डॉ. ईश्वर बैरागी September 25, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
एकात्म मानवदर्शन केवल भारत नहीं, समस्त मानवता के लिए मार्गदर्शक : होसबाले
जयपुर, 25 सितंबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को भारत बनाने की जीवन दृष्टि दी। उनका एकात्म मानवदर्शन केवल भारतीय जनसंघ, भाजपा कार्यकर्ताओं या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त मानवता के लिए मार्गदर्शन और मॉडल प्रस्तुत करता है। इस विचार को केवल पुस्तकों और शोध तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक जीवन में प्रयोग के रूप में उतारने की आवश्यकता है। होसबाले शुक्रवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से धानक्या में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धानक्या की पवित्र भूमि पर आकर दीनदयाल उपाध्याय के प्रेरणादायी स्मारक के दर्शन और उनके जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर मिला। यह स्मारक यहां आने वाले लोगों को राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।

भारतीय संस्कृति के सार को एकात्म मानवदर्शन के रूप में रखा

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय विलक्षण व्यक्तित्व और प्रेरणादायी पुरुष थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और जीवनदर्शन के विभिन्न विषयों को सार रूप में लेकर आधुनिक युग में जीवन जीने की आधारभूमि तैयार की और इसे एकात्म मानवदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के सार को गीता के रूप में मानवता के सामने रखा, उसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति के सार को एकात्म मानवदर्शन के रूप में इस युग के लिए प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दुनिया को केवल पूंजीवाद और साम्यवाद के दो विकल्पों में नहीं बांटा जा सकता। एक ओर स्वतंत्रता पर अत्यधिक आग्रह से असमानता और शोषण की प्रवृत्ति बढ़ी, वहीं दूसरी ओर समानता के आग्रह में स्वतंत्रता समाप्त हो गई। दोनों व्यवस्थाओं में बंधुता और मनुष्य के परस्पर संबंधों की उपेक्षा हुई। भारतीय चिंतन व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेश्वर के संबंधों को आधार मानकर समाज जीवन की व्यवस्था को देखता है।
भारतीय संस्कृति के सार को एकात्म मानवदर्शन के रूप में रखा

भारत को अमेरिका-जापान नहीं, भारत बनाना है

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का स्पष्ट विचार था कि भारत को अमेरिका, इंग्लैंड या जापान नहीं बनाना है, बल्कि भारत को भारत बनाना है। भारत के व्यक्तित्व, संस्कृति और जीवन मूल्यों के आधार पर खड़ा किया गया जीवन दर्शन केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि विश्व के लिए मार्गदर्शन और मॉडल बन सकता है। उन्होंने कहा कि विद्वान इस विषय पर अध्ययन और शोध करें, पुस्तकें लिखें, लेकिन इसके साथ इन विचारों का सामाजिक जीवन में प्रयोग भी होना चाहिए। समाज के सामने इसके व्यावहारिक परिणाम आएंगे, तभी दुनिया को इस विचार की सफलता पर भरोसा होगा।
भारत को अमेरिका-जापान नहीं, भारत बनाना है

गांवों में पढ़ाई, कमाई और दवाई उपलब्ध हो

ग्रामीण विकास की चर्चा करते हुए होसबाले ने कहा कि गांव में पढ़ाई, कमाई और दवाई उपलब्ध हो तो लोगों को शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा और गांव गांव बने रहेंगे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के प्रयोग आवश्यक हैं। उन्होंने नानाजी देशमुख द्वारा चित्रकूट और गोंडा क्षेत्र में किए गए ग्राम विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि एकात्म मानवदर्शन के प्रयोग सामाजिक जीवन में किए जाने चाहिए। सरकार की योजनाएं और नीतियां आवश्यक हैं, लेकिन केवल सरकारी तंत्र के माध्यम से यह कार्य पूरा नहीं हो सकता। समाज को जागृत होकर सामूहिक प्रयास करने होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के अनुभव और विवेक को आधार बनाकर आगे बढ़ना होगा।
गांवों में पढ़ाई, कमाई और दवाई उपलब्ध हो

तकनीक मानव को गुलाम नहीं, सुख देने वाली हो

तकनीक के संदर्भ में होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय तकनीक के विरोधी नहीं थे। उनका आग्रह था कि तकनीक मनुष्य के जीवन में सुख देने वाली, पर्यावरण के अनुकूल और आर्थिक रूप से कमजोर न करने वाली हो। इससे रोजगार समाप्त नहीं होना चाहिए और जीवन मूल्यों का ह्रास भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि तकनीक मनुष्य को गुलाम बनाने वाली नहीं, बल्कि मानव के सुख के लिए काम करने वाली होनी चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय ने स्वदेशी को युगानुकूल बनाने की बात कही थी। विदेश से आने वाले ज्ञान को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन उसे स्वदेशानुकूल बनाना आवश्यक है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित तकनीक के विभिन्न रूपों पर चर्चा हो रही है, ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि तकनीक मानव के लिए उपयोगी कैसे बने।

जीवन के आचरण में दिखते थे विचार

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय स्वयंसेवक, प्रचारक, राजनेता, विद्वान, अर्थशास्त्री, साहित्यकार और लेखक थे। सामाजिक समरसता, पर्यावरण, परिवार, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों को उन्होंने अपने जीवन में भी उतारा। उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के नागरिक कर्तव्य से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि यात्रा के दौरान रेडियो का लाइसेंस समाप्त होने के बाद उन्होंने उसका उपयोग नहीं किया।
जीवन के आचरण में दिखते थे विचार

जयंती पर स्मरण के साथ जीवन में उतारने का प्रयास हो

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का स्मरण केवल जयंती पर अभिवादन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके विचारों पर मंथन करने के साथ उनके जीवन से कुछ सीखकर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के परम वैभव के लिए अपने जीवन का कण-कण समर्पित कर दिया। हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर इस लक्ष्य के लिए अपने जीवन को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए।

शोधार्थियों और लोक कलाकारों का सम्मान

कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्यमी मनीष गुप्ता ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ओपी अग्रवाल मौजूद रहे। समारोह समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहनलाल छीपा ने समिति की गतिविधियों एवं उद्देश्यों की जानकारी दी। सचिव प्रताप भानु शेखावत ने समिति की भावी योजनाओं के बारे में बताया। समारोह में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों एवं कृतित्व पर शोध के लिए विभिन्न शोधार्थियों और विद्वानों को सम्मानित किया गया। इनमें रांची विश्वविद्यालय के शोधार्थी डॉ. सोहन सिंह, हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. जगदीश सिंह चंदेल, मथुरा के डॉ. अंशुमान कौशिक तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. नागेश चौबे शामिल रहे। लोक कला एवं संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए आलोकवादक पद्मश्री तगाराम भील तथा भपंग वादक पद्मश्री गफरुद्दीन मेवाती का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम में आभार समिति के उपाध्यक्ष नीरज कुमावत ने व्यक्त किया, जबकि संचालन गजेंद्र ज्ञानपुरिया ने किया।
शोधार्थियों और लोक कलाकारों का सम्मान

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