Breaking News
VSK Foundation Jaipur Logo - विश्व संवाद केंद्र जयपुर
विश्व संवाद केंद्र, जयपुर ( VSK Foundation Jaipur )

विभाजन की विभीषिका में सेवा, साहस और संगठन की गाथा

By वीएसके डेस्क August 14, 2026
लेख
विभाजन की विभीषिका में सेवा, साहस और संगठन की गाथा
14 अगस्त भारत के इतिहास का वह दिन है, जो स्वतंत्रता की पूर्व संध्या के साथ-साथ उस गहरी पीड़ा की भी स्मृति दिलाता है, जिसे देश ने विभाजन के रूप में झेला। 1947 का विभाजन केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था। यह करोड़ों लोगों के जीवन, परिवार, घर और स्मृतियों के उजड़ने की त्रासदी थी। पंजाब, सिंध, बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में हिंसा, भय और विस्थापन का ऐसा दौर आया, जिसने समाज के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया। इस कठिन समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य केवल वैचारिक या संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। विभाजन से पहले जिन क्षेत्रों में संघ ने वर्षों तक संगठन खड़ा किया था, वही संगठनात्मक ढांचा संकट के समय समाज की सहायता और सुरक्षा के लिए सक्रिय हुआ।

विभाजन से पहले ही संकट को पहचानने का प्रयास

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। अगले एक दशक के भीतर संघ का कार्य सिंध और पंजाब जैसे क्षेत्रों तक पहुँच चुका था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने परिस्थितियों की गंभीरता को समझते हुए इन क्षेत्रों में संगठन खड़ा करने पर विशेष ध्यान दिया। मई 1932 में डॉ. हेडगेवार कराची पहुँचे। वहाँ आयोजित अखिल भारतीय हिन्दू युवा सम्मेलन में उन्होंने भाग लिया और लगभग छह दिनों तक स्थानीय कार्यकर्ताओं से संवाद किया। इसी प्रवास के दौरान कराची में संघ की पहली शाखा प्रारंभ हुई। आगे चलकर बापुराव भिशिकर, बाबासाहब आप्टे, राजपाल पुरी सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने सिंध में संघ-कार्य को विस्तार दिया। पंजाब में भी संघ का विस्तार तेजी से हुआ। 1937 में कार्यकर्ताओं को लाहौर, सियालकोट और रावलपिंडी भेजा गया। अगस्त 1938 में डॉ. हेडगेवार का लाहौर प्रवास हुआ। बाद में गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी पंजाब और सिंध में व्यापक प्रवास किए। इस संगठनात्मक विस्तार का उद्देश्य केवल शाखाओं की संख्या बढ़ाना नहीं था। इसके पीछे समाज को संगठित, आत्मविश्वासी और संकट का सामना करने में सक्षम बनाने की दृष्टि थी।

गुरुजी के प्रवास और सीमावर्ती समाज से संवाद

1941 में सरसंघचालक के रूप में गुरुजी का पहला लाहौर प्रवास हुआ। उनके मार्गदर्शन में पंजाब में संगठन विस्तार को नई गति मिली। 1942 में पंजाब से 40 प्रचारकों की टोली तैयार हुई, जिसने संघ-कार्य को तहसील स्तर तक पहुँचाने का प्रयास किया। 1943 में लाहौर में डॉ. हेडगेवार भवन के नाम से संघ का कार्यालय भी स्थापित हुआ। सिंध में गुरुजी के वार्षिक प्रवास भी प्रारंभ हुए। हैदराबाद, कराची, शुक्कर, शिकारपुर और मीरपुर खास जैसे क्षेत्रों में उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक वर्गों से संवाद किया। 1946 तक परिस्थितियाँ और अधिक तनावपूर्ण हो चुकी थीं। गुरुजी ने पंजाब और सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा कर हिन्दू समाज को आत्मविश्वास और संगठन का संदेश दिया। पेशावर प्रवास के दौरान उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर संपर्क और पारस्परिक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

जब विभाजन सामने खड़ा था

1947 आते-आते पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों की परिस्थितियाँ तेजी से बिगड़ने लगीं। संघ ने अपने संगठनात्मक ढांचे के माध्यम से स्वयंसेवकों को परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करना शुरू किया। फगवाड़ा और संगरूर के निकट आयोजित शिक्षावर्गों में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने भाग लिया। संगरूर में लगभग 1400 और फगवाड़ा में करीब 2300 स्वयंसेवकों की उपस्थिति बताई गई है। इन वर्गों का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में समाज के प्रति अपने दायित्व का बोध कराना भी था। विभाजन की घोषणा के बाद स्थिति और भयावह हो गई। अनेक स्थानों पर लोगों को अपने घर-बार छोड़ने पड़े। परिवार बिछड़ गए। हिंसा और असुरक्षा के बीच लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत की ओर बढ़ने लगे। ऐसे समय में स्वयंसेवकों ने कई स्थानों पर राहत और सुरक्षा के प्रयास किए। फगवाड़ा के प्रशिक्षण शिविर को निर्धारित समय से पहले समाप्त कर प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को संकटग्रस्त क्षेत्रों में भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। कई स्थानों पर सुरक्षित क्षेत्रों की व्यवस्था कर असहाय परिवारों को आश्रय देने का प्रयास किया गया।

विभाजन की कीमत : बलिदान

विभाजन का दौर केवल विस्थापन का नहीं, बल्कि असंख्य लोगों के बलिदान का भी काल था। स्वयंसेवकों ने अनेक स्थानों पर लोगों की रक्षा और सहायता करते हुए अपने प्राण गंवाए। स्रोत में 87 स्वयंसेवकों के बलिदान का उल्लेख मिलता है। लाहौर के वैद्यराज अमरनाथ डोगरा जैसे कार्यकर्ताओं ने कठिन परिस्थितियों में साहस के साथ कार्य किया। अनेक स्वयंसेवकों को गिरफ्तारियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा। मुल्तान और मिंटगुमरी जैसे क्षेत्रों में भी स्वयंसेवकों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है। यह दौर इस बात की परीक्षा था कि संकट की घड़ी में संगठन अपने समाज के लिए कितना खड़ा रह सकता है। स्वयंसेवकों के सामने अपना घर और परिवार बचाने की चुनौती थी, लेकिन साथ ही हजारों असहाय परिवारों की सुरक्षा और सहायता का प्रश्न भी था।

संकट के बीच सेवा का विराट अभियान

विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था—विस्थापन। लाखों लोग अपना सब कुछ पीछे छोड़कर अनजान स्थानों की ओर निकल पड़े। ऐसे समय में भोजन, वस्त्र, चिकित्सा, आश्रय और पुनर्वास सबसे बड़ी आवश्यकताएँ बन गईं। इसी संदर्भ में वास्तुहारा सहायता समिति का गठन हुआ। 1950 में इस समिति के माध्यम से पूर्वी बंगाल से आए विस्थापितों की सहायता का व्यापक अभियान चलाया गया। समिति ने भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का कार्य किया। स्रोत के अनुसार, मार्च से जून 1950 के बीच लगभग 1568 परिवारों यानी करीब छह हजार लोगों को आश्रय दिया गया। सरकारी अधिकारियों द्वारा भेजे गए लगभग छह हजार अन्य विस्थापितों को भी भोजन उपलब्ध कराया गया। रुग्ण लोगों के लिए औषधि, दूध और फल की व्यवस्था की गई। छह महीने के व्यापक सेवा अभियान में आसाम-बंगाल के सहायता केंद्रों ने 80 हजार से अधिक लोगों को भोजन कराया। एक लाख से अधिक विस्थापितों को अल्पाहार उपलब्ध कराया गया और डेढ़ लाख से अधिक लोगों को वस्त्र दिए गए। इस सेवा अभियान में पांच हजार से अधिक स्वयंसेवकों के जुटने का भी उल्लेख मिलता है।

पंजाब में राहत और पुनर्वास

पंजाब में भी विस्थापितों की सहायता के लिए पंजाब रिलीफ कमेटी के माध्यम से व्यापक कार्य किया गया। राहत कार्य केवल भोजन और वस्त्र तक सीमित नहीं था। विस्थापितों को आर्थिक सहायता, रोजगार दिलाने के प्रयास, लापता लोगों की खोज, न्यायालयीन मामलों में मार्गदर्शन और चिकित्सा सहायता जैसी सेवाएँ भी दी गईं। राहत सामग्री के भंडारण और वितरण के लिए व्यवस्था बनाई गई। स्वयंसेवक दिन-रात राहत सामग्री को जरूरतमंदों तक पहुँचाने में जुटे रहे। दंगों में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी की गई। दिल्ली में भी शरणार्थियों की सहायता के लिए हिंदू सहायता समिति सक्रिय हुई। उस समय प्रतिदिन हजारों लोग दिल्ली पहुँच रहे थे। स्वयंसेवक रेलवे स्टेशन से लेकर राहत शिविरों तक भोजन, वस्त्र और औषधि की व्यवस्था में जुटे रहते थे। दिल्ली के अलावा देश के अनेक शहरों में भी शरणार्थियों के पुनर्वास के प्रयास किए गए।

इतिहास की उस पीड़ा को याद रखना क्यों जरूरी है?

विभाजन की स्मृति केवल अतीत को दोहराने के लिए नहीं है। यह स्मरण इसलिए आवश्यक है कि आने वाली पीढ़ियाँ विभाजन के उस दर्द को समझ सकें। विभाजन ने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया, असंख्य लोगों को अपनों से अलग कर दिया और एक ऐसी पीड़ा छोड़ी जिसकी स्मृतियाँ पीढ़ियों तक जीवित रहीं। लेकिन इसी अंधकार में सेवा, साहस और मानवीय संवेदना की अनेक कहानियाँ भी जन्मीं।

Related Articles