6 सितंबर 1889 : सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शरत चंद्र बोस का जन्म
नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इन्ही ने प्रेरित किया था
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रमेश शर्मा
September 07, 2026
लेख › समसामयिक
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ विलक्षण व्यक्तित्व ऐसे भी थे, जिन्होंने अपने संघर्ष के साथ अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए नया इतिहास रचने वाली पीढ़ी तैयार की। ऐसे ही महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे शरत चन्द्र बोस। वे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के बड़े भाई थे। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को आजाद हिन्द फौज के गठन के लिए प्रेरित करने में भी शरत चन्द्र बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व और विचारक शरत चन्द्र बोस का जन्म 6 सितम्बर 1889 को उड़ीसा प्रांत के अंतर्गत कटक में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस कटक, उड़ीसा क्षेत्र के सुविख्यात अधिवक्ता थे। उन्हें अंग्रेजों ने ‘राय बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया था। माता प्रभावती एक संस्कारवान महिला थीं, जो भारतीय परंपराओं के अनुरूप जीवन जीने की समर्थक थीं।
शरत बाबू, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के बड़े भाई थे। दोनों भाइयों की आयु में लगभग आठ वर्ष का अंतर था। सुभाष बाबू बचपन से ही शरत जी का अनुसरण करते थे और उनका मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़ते थे। समय के साथ शरत चन्द्र बोस का विवाह विभावती देवी से हुआ और परिवार कलकत्ता आ गया।
शरत बाबू की आरंभिक शिक्षा कटक में हुई और आगे की पढ़ाई कलकत्ता में हुई। जब वे कलकत्ता आए, तब पूरे बंगाल का वातावरण उथल-पुथल से भरा हुआ था। अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी थी, जिसका भारी विरोध होने लगा था। यह विरोध अहिंसक और क्रांतिकारी, दोनों प्रकार के आंदोलनों के रूप में सामने आया। शरत बाबू उस समय छात्र जीवन में थे और बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन से जुड़ गए। इसी दौरान वे कांग्रेस से भी जुड़े।
1909 में उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से एम.ए. किया और इसी वर्ष कांग्रेस की विधिवत सदस्यता भी ले ली। लगभग दो वर्ष कलकत्ता में रहने के बाद 1911 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए। वर्ष 1914 में बैरिस्टर बनकर भारत लौट आए।
कलकत्ता लौटकर उन्होंने वकालत के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे कई बार कलकत्ता नगर निगम के एल्डरमैन बने और बंगाल विधान परिषद के सदस्य भी रहे। वे अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के अपमान के विरुद्ध थे और प्रयास करते थे कि भारतीयों को भी वही नागरिक सम्मान मिले, जो अंग्रेजों को प्राप्त था।
वे गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की सहायता करने लगे और उनकी ओर से अदालत में पैरवी भी करते थे। इसके साथ ही वे भारतीय परिवारों के आंतरिक जीवन में अपनी परंपराओं के समर्थक थे। हालांकि, वे खुलकर स्वतंत्रता आंदोलन में वर्ष 1930 में सामने आए। तब देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ हुआ था। शरत जी ने अपनी प्रैक्टिस और अन्य सभी दायित्व त्यागकर आंदोलन में स्वयं को समर्पित कर दिया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने के कारण उन्हें 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और तीन वर्ष का कारावास मिला।
जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयारी आरंभ की। शरत जी फॉरवर्ड ब्लॉक से जुड़े और अनेक विदेश यात्राएं कीं। वे भारत के बाहर अंग्रेजों के विरुद्ध विश्व जनमत तैयार करना चाहते थे। जापान और जर्मनी की राजशक्ति से भारतीय क्रांतिकारियों को जोड़ने में भी शरत जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उन्होंने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व संभालने के लिए न केवल प्रेरित किया, बल्कि गुप्त रूप से सैन्य भर्ती अभियान भी चलाया। 11 दिसंबर 1941 को उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया। यह नजरबंदी उनकी अकेले की नहीं थी। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को भी उनके साथ नजरबंद किया गया था।
शरत बाबू ने सुभाष बाबू को वेश बदलकर और शरीर पर भूरा लेप लगाकर नजरबंदी से बाहर निकालने में सहायता की। यह शरत बाबू की ही युक्ति थी, जिससे सुभाषचन्द्र बोस सुरक्षित निकल सके और आजाद हिन्द फौज का कार्य आगे बढ़ा सके। वे कई वर्षों तक अपने ही घर में नजरबंद रहे। नजरबंदी हटने के बाद वे पुनः कांग्रेस में सक्रिय हो गए।
1945 के बाद भारत से अंग्रेजों की विदाई और भारत के विभाजन की भूमिका बनने लगी। शरत चन्द्र बोस संविधान सभा के सदस्य बने, लेकिन उन्हें शीघ्र ही संविधान निर्माण सभा छोड़नी पड़ी। शरत जी चाहते थे कि भारत का संविधान अंग्रेजी मानसिकता से मुक्त रहे और पूर्णतया भारतीय दृष्टि एवं विचार पर आधारित हो। इसी मुद्दे पर कांग्रेस और अन्य सदस्यों से उनके मतभेद हुए और उन्होंने संविधान सभा से त्यागपत्र दे दिया।
कांग्रेस और तत्कालीन राजनेताओं से उनके मतभेद केवल संविधान के प्रारूप को लेकर ही नहीं थे। वे भारत के विभाजन के भी प्रबल विरोधी थे। उन्होंने भारत विभाजन का खुलकर विरोध किया और इसके विरुद्ध बंगाल में जनमत तैयार करने के लिए सभाएं भी कीं।
लेकिन उस समय बंगाल का वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण और हिंसक हो चुका था। हर व्यक्ति को अपनी जान-माल की चिंता थी। शरत जी चाहते थे कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की मिलीभगत में साथ न दे और भारत विभाजन का विरोध करे। लेकिन पाकिस्तान की मांग को लेकर मुस्लिम लीग द्वारा अगस्त 1946 में शुरू किए गए डायरेक्ट एक्शन के बाद भारी हिंसा हुई और भारत विभाजन के लिए कांग्रेस ने सहमति दे दी।
इससे असंतुष्ट होकर शरत जी ने जनवरी 1947 में कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और फरवरी 1947 से माउंटबेटन की भारत विभाजन योजना के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। वे चाहते थे कि बंगाल संयुक्त रहे। इसके लिए उन्होंने समाचार पत्र निकालकर जनजागरण करने का भी प्रयास किया।
लेकिन बंगाल में मुस्लिम लीग की हिंसक राजनीति के कारण परिस्थितियां लगातार बिगड़ती गईं। हजारों लोगों के प्राण गए और लाखों लोग बेघर हुए। अंततः शरत जी का अखंड बंगाल का सपना टूट गया। हिंसा और विभाजन की त्रासदी ने बंगाल ही नहीं, पूरे भारत को गहरे आघात से भर दिया और भारत का विभाजन हो गया।
इस विभाजन से आहत शरत जी ने स्वयं को सार्वजनिक जीवन से समेट लिया और पूरी तरह लेखन को समर्पित हो गए। लेखन वे पहले भी करते थे, लेकिन अब उन्होंने अपना अधिकांश समय लेखन में लगा दिया। 20 फरवरी 1950 को उन्होंने देह त्याग दी।
बाद में उनके भाषणों और लेखन का संग्रह प्रकाशित हुआ, जिनमें ‘बंधन की महिमा’ संग्रह विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ।