इतिहास बोध के बिना स्वरा भास्कर की 'जौहर' संबंधी सतही आधुनिकता, जो स्त्री के स्वाभिमान को कायरता मानती है!
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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
September 02, 2026
लेख › समसामयिक
अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में फिल्म 'पद्मावत' (2018) के 'जौहर' दृश्य पर अपनी पुरानी टिप्पणी का पुनः बचाव करते हुए कहा, “आत्मसमर्पण या जान देना कोई बहादुरी नहीं है और निर्भया लड़ी थी, जान देना बहादुरी नहीं।” यद्यपि उन्होंने बाद में स्पष्टीकरण दिया कि उन्होंने रानी पद्मावती को 'कायर' नहीं कहा था, किंतु उनका संपूर्ण विमर्श इतिहास की बेहद सतही, एकांगी समझ को उजागर करता है।
वस्तुत: जब हम मध्यकालीन क्रूर युद्धों, आक्रांताओं के बर्बर व्यवहार और तत्कालीन परिस्थितियों का मूल्यांकन 21वीं सदी के मानवाधिकारों, आधुनिक कानूनी व्यवस्था और समकालीन नारीवादी शब्दावली के तराजू पर करते हैं, तब हमें बेहद सावधानी रखने की आवश्यकता होती है, किंतु स्वरा भास्कर एक ऐसे दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर रही हैं, जो न तो मध्यकालीन परिस्थितियों से मेल खाता है और न ही 'जौहर' के उस भाव को भी छू पाया है, जिसमें एक स्त्री अपनी देह अग्नि को समर्पित कर पूरी तरह से मुक्त हो जाना चाहती है। यह कायरता नहीं है, विदेशी आक्रांताओं की बर्बरता के विरुद्ध अस्मिता की रक्षा का एक सर्वोच्च और अंतिम साहसी मोर्चा है।
कहना होगा कि स्वरा भास्कर और उनके जैसे आधुनिक विचारकों की मूल वैचारिक त्रुटि 'काल-दोष' में निहित है। काल-दोष का अर्थ है किसी ऐतिहासिक घटना का मूल्यांकन उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भों को काटकर आज के मूल्यों के आधार पर करना। 21वीं सदी में हमारे पास एक संप्रभु राज्य है, अंतरराष्ट्रीय कानून हैं, जेनेवा कन्वेंशन जैसी संधियां हैं जो युद्धबंदियों के अधिकारों की रक्षा करती हैं और एक स्थापित न्यायपालिका है।
इसके विपरीत, अलाउद्दीन खलजी, बाबर या बाद के मुगल, इस्लाम के जिहादी अभियानों के दौरान ऐसा कोई तंत्र अस्तित्व में नहीं था। पराजय का सीधा और एकमात्र अर्थ था, पुरुषों का कत्लेआम और महिलाओं का पूर्ण अमानवीयकरण। अतः, निर्भया की आधुनिक कानूनी और सामाजिक लड़ाई की तुलना उन महिलाओं से करना, जिनके सामने कोई राज्य या कानून सहायता के लिए उपलब्ध नहीं था, बौद्धिक रूप से बेमानी है। यह पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण तो है ही, साथ में भारत में एक ऐसे नैरेटिव को खड़ा करना है, जिसमें आतंकियों, जिहादियों और गैर मुसलमानों के प्रति हिंसा करनेवालों को अप्रत्यक्ष रूप में महिमा मंडित किया जा रहा है।
मध्यकालीन युद्ध नियम और दासता (गुलामी) का क्रूर यथार्थ
मध्यकाल में विदेशी आक्रांताओं की सैन्य नीति का एक अनिवार्य हिस्सा 'गनीमत' (युद्ध की लूट) था। इस लूट में धन-दौलत, भूमि के साथ पराजित पक्ष की स्त्रियाँ और बच्चे भी शामिल थे। उन्हें युद्ध की संपत्ति मानकर दासों के रूप में मंडियों में बेचा जाना एक स्थापित व्यवस्था थी।
प्रो. के. एस. लाल ने तत्कालीन सुल्तानों के अभियानों का विवरण देते हुए लिखा है कि जब भी किसी हिंदू राज्य या दुर्ग का पतन होता था, तो सल्तनत की सेनाओं द्वारा बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया जाता था। खिलजी के सेनापतियों (जैसे उलुग खान और नुसरत खान) ने गुजरात और राजपूताना अभियानों के दौरान हजारों महिलाओं को बंदी बनाकर दिल्ली के बाजारों में दास के रूप में बेचा।
प्रो. लाल स्पष्ट करते हैं कि इन महिलाओं के सामने दो ही रास्ते होते थे या तो वे सुल्तान के हरम या दिल्ली के बाजारों में अत्यंत अपमानजनक जीवन जिएं या फिर जौहर की अग्नि में अपने प्राण दे दें। ऐसे में जौहर कोई प्रथागत आत्महत्या न होकर गरिमा की रक्षा का अंतिम विकल्प था।(Prof K. S. Lal, History of the Khaljis: A.D. 1290–1320)।
जियाउद्दीन बरनी ने अपनी पुस्तक तारिख-ए-फिरोजशाही में तत्कालीन दिल्ली के बाजारों का विस्तृत वर्णन किया है, जहाँ युद्धों में बंदी बनाई गई गैर-मुस्लिम महिलाओं को बहुत कम दामों पर दासों के रूप में बेचा जाता था। वह लिखता है कि अलाउद्दीन के शासनकाल में दासों और दासियों की कीमतें इतनी गिर गई थीं कि एक साधारण दासी की कीमत एक दुधारू गाय या घोड़े से भी कम हो गई थी। ऐसी क्रूर और अमानवीय मंडियों (मीना बाजार और दास बाजार) का हिस्सा बनने से बचने के लिए जब कोई महिला अग्नि को चुनती है, तो उसे 'बहादुरी की कमी' कहना इतिहास के उस वीभत्स यथार्थ का उपहास उड़ाना है।
आक्रांताओं की बर्बरता के प्रामाणिक साक्ष्यों में ये दो उद्धरण ही काफी हैं !
स्वरा भास्कर के बयानों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे उन आक्रांताओं की वास्तविक मानसिकता और क्रूरता के इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती हैं, जिनसे बचने के लिए महिलाओं ने जौहर का चुनाव किया। तत्कालीन इतिहासकारों के दस्तावेजी साक्ष्य इस बर्बरता को स्पष्ट करते हैं। अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरता के साक्ष्य देते हुए तारीख-ए-फिरोजशाही में जियाउद्दीन बरनी लिखता है कि अलाउद्दीन खलजी सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि वह पराजित समाज की रीढ़ तोड़ने के लिए क्रूरतम नीतियां अपनाता था। जब उसने मंगोलों के विद्रोह और दिल्ली के पास विद्रोहों को कुचला, तो उसने एक नया अमानवीय नियम लागू किया।
बरनी के शब्दों में- "सुल्तान ने आदेश दिया कि विद्रोहियों की पत्नियों और बच्चों को बंदी बना लिया जाए और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाए। दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी पुरुष के अपराध के लिए उसकी बेगुनाह पत्नी और मासूम बच्चों को पकड़कर दासों के बाजार में डाल दिया गया।
इसी तरह से "चित्तौड़ के पतन (1303 ई.) पर दरबारी इतिहासकार अमीर खुसरो ('तारीख-ए-आलाई') खुद स्वीकार करता है कि सुल्तान ने एक ही दिन में दुर्ग के भीतर 30,000 आम निर्दोष हिंदुओं को गाजर-मूली की तरह काटने का आदेश दिया था। ऐसी क्रूर मानसिकता वाले आक्रांता के सैनिकों के हाथ आने का क्या परिणाम होता, यह सोचकर ही रानी पद्मिनी और अन्य वीरांगनाओं ने अग्नि को गले लगाया था। जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर की क्रूरता के साक्ष्य उसी के लिखे ग्रंथ बाबरनामा (Tuzuk-i-Baburi,अनुवादक- एनेट बेवरिज) में देखे जा सकते हैं।
वस्तुत: बाबर को आधुनिक विमर्शों में कई बार उदार दिखाने का प्रयास किया जाता है, परंतु उसकी स्वयं की आत्मकथा उसकी भयानक सैन्य क्रूरता और धार्मिक कट्टरता को उजागर करती है। 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा के विरुद्ध विजय के बाद बाबर ने स्वयं लिखा है, "काफिरों के संहार के बाद, मैंने उनके कटे हुए सिरों का एक विशाल पहाड़ (मीनार) बनाने का आदेश दिया, ताकि यह इस्लाम की फतह और काफिरों की शिकस्त का गवाह बने।
इस फतह के बाद मैंने 'गाजी' (काफिरों का वध करने वाला) की उपाधि धारण की।" इसके ठीक एक वर्ष बाद, 1528 ई. में जब उसने चंदेरी पर आक्रमण किया, तो मेदिनी राय के आत्मसमर्पण न करने पर उसने चंदेरी के भीतर भी हिंदुओं के कटे सिरों के स्तंभ खड़े करवाए। बाबरनामा में वह लिखता है कि शत्रुओं की महिलाओं को बंदी बनाना और उनके पुरुषों के सिरों की मीनारें बनाना उसकी युद्ध नीति का हिस्सा था। ऐसे क्रूर विजेता के सामने घुटने टेकने का अर्थ था अपनी संपूर्ण चेतना और देह दोनों को हमेशा के लिए गुलाम बना देना।
'जौहर' और 'शाका': एक संयुक्त योजनात्मक सैन्य मोर्चा
वास्तव में जौहर को अकेले महिलाओं की व्यक्तिगत विवशता के रूप में देखना अधूरी समझ है। राजपूत युद्ध कला में 'जौहर' और 'शाका' (केसरिया) एक ही सिक्के के दो पहलू थे, जो एक-दूसरे पर योजनात्मक रूप से निर्भर थे। कर्नल टॉड ने चित्तौड़ के इतिहास का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि राजपूत योद्धाओं के लिए उनकी महिलाओं की मर्यादा और सुरक्षा सबसे संवेदनशील बिंदु था। यदि युद्ध के दौरान योद्धाओं के मन में यह भय रहता कि उनकी पराजय के बाद उनकी पत्नियों और बेटियों के साथ बर्बरता होगी, तो वे मानसिक रूप से कमजोर हो सकते थे या शत्रु के साथ किसी अपमानजनक समझौते के लिए विवश हो सकते थे।
टॉड लिखते हैं: "एक बार जब दुर्ग के भीतर जौहर की अग्नि ठंडी हो जाती थी, तो योद्धा इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो जाते थे कि उनकी महिलाओं की मर्यादा अब शत्रु की पहुँच से परे सुरक्षित हो चुकी है। वे अपनी पत्नियों या बच्चों को खोने के भय और किसी भी प्रकार के राजनीतिक समझौते या आत्मसमर्पण के दबाव से पूरी तरह मुक्त हो जाते थे। इसके बाद वे अपने सिर पर केसरिया साफा बांधकर, केवल शत्रु का विनाश करने के एकमात्र आत्मघाती लक्ष्य के साथ दुर्ग के द्वार खोल देते थे।"अतः, जौहर पुरुषों को मजबूरन समझौतों से बचाने और उन्हें अंतिम सांस तक स्वतंत्रता के लिए लड़ने की मानसिक शक्ति देने का एक रणनीतिक मोर्चा था। वस्तुत: यहां बात 'शाका' (केसरिया) की हो रही है। (Annals and Antiquities of Rajasthan, Vol. 1, Colonel James Tod)
देश भर के प्रमुख जौहरों का ऐतिहासिक लेखा-जोखा
स्वरा भास्कर का यह तर्क कि यह सिर्फ एक विशिष्ट 'दृश्य' या एकल घटना थी, भारत के व्यापक इतिहास के सामने टिक नहीं पाता। देश के विभिन्न हिस्सों (विशेषकर राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश और मध्य प्रदेश) में हुए जौहरों की एक लंबी श्रृंखला है, जो इसके पीछे की भयानक विवशता और अदम्य साहस को प्रमाणित करती है।
रणथंभौर का प्रथम जौहर (1301 ई.), चित्तौड़गढ़ का प्रथम जौहर (1303 ई.), चित्तौड़गढ़ का द्वितीय जौहर (1535 ई.), चित्तौड़गढ़ का तृतीय जौहर (1568 ई.), जैसलमेर के जौहर, चंदेरी का जौहर (1528 ई.), ग्वालियर का जौहर (1232 ई.), मांडू (मांडवगढ़) का जौहर (1561 ई.) जैसे छोटे-बड़े कई जोहर घटनाओं से इतिहास भरा पड़ा है, जोकि यह बताता है कि तत्कालीन परिस्थितियों में यदि ये महिलाएं जौहर नहीं करतीं तो जब तक जीवित रहती, अमानवीय यातनाएं सहतीं या बार-बार बेची जातीं, दास बनकर जीवन यापन करतीं।
बेशक, सिनेमाई प्रस्तुति पर सवाल उठाना रचनात्मक स्वतंत्रता के दायरे में आ सकता है, किंतु स्वरा भास्कर जैसी अभिनेत्रियाँ जब सिनेमाई दृश्य की आलोचना करते-करते सीधे वास्तविक ऐतिहासिक चरित्रों (जैसे रानी पद्मावती) के निर्णयों पर टिप्पणी करने लगती हैं और उसे 'आत्मसमर्पण' या 'बहादुरी की कमी' का नाम दे देती हैं, तो वे सिनेमा की आलोचना से दूर जाकर इतिहास के साथ खिलवाड़ करती हैं।
स्वरा भास्कर के तर्क की वैचारिक विसंगतियां
स्वरा भास्कर का यह कहना कि "निर्भया लड़ी थी, जान देना बहादुरी नहीं," एक गंभीर वैचारिक विरोधाभास पैदा करता है। क्योंकि निर्भया की लड़ाई अमानवीय क्रूरता के बाद जीवित रहने और न्याय पाने की एक आधुनिक लड़ाई थी, जो अत्यंत वंदनीय है। परंतु मध्यकाल में, यदि कोई महिला बंदी बना ली जाती थी, तो उसके पास 'लड़ने' या 'न्याय मांगने' का कोई मंच नहीं था। उसके पास केवल सुल्तान के अंतःपुर (हरम) की दासी बनने या धर्म परिवर्तन के लिए यानी हिन्दू से (इस्लाम) मुसलमान हो जाने के लिए विवश होने का विकल्प था।
यदि हम मध्यकालीन संदर्भों एवं परिस्थिति को गहराई से देखें और समझें तो शत्रु को अपनी देह और अपनी आत्मा पर अधिकार न करने देना ही प्रतिरोध का उच्चतम रूप था। जब रानी पद्मिनी, रानी कर्मावती या चंदेरी की वीरांगनाओं ने जौहर किया, तो उन्होंने आक्रांता की सबसे बड़ी विजय, उनकी देह और उनके गौरव को बंधक बनाए जाने को पूरी तरह विफल कर दिया। स्वरा भास्कर जो स्वयं एक महिला हैं, उन्हें यह समझना होगा कि मध्यकाल की स्त्रियों का ये कोई आत्मसमर्पण नहीं है, यह तो शत्रु की कामुक और हिंसक आकांक्षाओं पर एक करारा तमाचा था, इसलिए इतिहास को किसी एक निश्चित आधुनिक विचारधारा या समकालीन राजनीतिक एजेंडे के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
स्वरा भास्कर का दृष्टिकोण इतिहास के उस क्रूर यथार्थ को झुठलाने का प्रयास करता है, जिससे हमारी पिछली पीढ़ियों की महिलाओं ने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया। यहां समझें कि 'जौहर' को आज के समाज के लिए एक आदर्श या कुरीति के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आज की परिस्थितियाँ और कानून पूरी तरह भिन्न हैं परंतु, अतीत की उन वीरांगनाओं के चरम बलिदान को 'कायरता' या 'कम बहादुरी' के रूप में विश्लेषित करना उनके प्रति घोर बौद्धिक अन्याय है।
ऐतिहासिक साक्ष्य यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं कि मध्यकालीन भारत में जब तक संभव हुआ, इन अमानवीय ताकतों का हिन्दू स्त्री शक्ति ने वीरता से सामना किया गया और जब लगा कि पराजय निश्चित है, तब पुरुषों ने 'शाका' के माध्यम से और महिलाओं ने देश भर में 'जौहर' के माध्यम से स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह भारतीय इतिहास का एक अत्यंत गौरवशाली, यद्यपि दुखद, अध्याय है जिसे सतही आधुनिक विमर्शों के माध्यम से छोटा नहीं किया जा सकता है। भारत की इन तमाम हुतात्माओं को बारंबार नमन है!