Breaking News
VSK Foundation Jaipur Logo - विश्व संवाद केंद्र जयपुर
विश्व संवाद केंद्र, जयपुर ( VSK Foundation Jaipur )

डॉक्टर भागवत के अमेरिका में संबोधन से विरोधी नि:शब्द

By अवधेश कुमार September 02, 2026
लेख › वैश्विक राजनीति
डॉक्टर भागवत के अमेरिका में संबोधन से विरोधी नि:शब्द
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन कार्यक्रम की सफलता से अमेरिका से लेकर भारत तक के विरोधियों को बिना कोई प्रतिक्रिया दिए सटीक उत्तर मिल गया है। भारत में नेताओं ने कार्यक्रम के पूर्व अपने वक्तव्यों से इसके विरोध में वातावरण बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर अमेरिका में कुछ संगठन, जैसे हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल, इंटरफेथ सेंटर ऑफ न्यूयॉर्क आदि ने जितना संभव हुआ, कार्यक्रम को ही रोकने की कोशिश की। न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने खुलकर विरोध किया। ममदानी ने कहा कि एक ऐसे आंदोलन का उभार देखना बेहद चिंताजनक है, जो एक बहिष्कारवादी सोच पर आधारित है। यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने अमेरिकी सरकार से संघ के सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने और भारत में कथित धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघनों को लेकर मोहन भागवत का वीजा रद्द करने तक पर विचार करने का आग्रह कर दिया। भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत आयोग की टिप्पणियों को खारिज करते हुए इसे पक्षपाती और विश्वसनीयता से रहित संस्था बताया था। वॉशिंगटन स्थित इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने ऐसा वाहन निकाला, जिसमें वीडियो स्क्रीन लगी थी और जो मैनहटन की सड़कों पर घूमकर कार्यक्रम के विरुद्ध प्रचार कर रहा था। हालांकि, इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी समाचार माध्यमों में इस कार्यक्रम को बिना कोशिश के लगातार कवरेज प्राप्त हो गया। ऐसा नहीं था कि सब कुछ एकपक्षीय था। उदाहरण के लिए, अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर ममदानी और विरोधियों की आलोचना की। ऐसी प्रतिक्रिया देने वाले और भी कई अमेरिकी प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे। वास्तव में इस कार्यक्रम का आयोजन अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग फोरम ने किया था। संगठन ने वक्तव्य जारी किया, जिसमें बताया गया कि यह कार्यक्रम 200 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है और इसका आधार वसुधैव कुटुम्बकम् है। यह कार्यक्रम हिंदू पर्व रक्षाबंधन के संदेश पर भी आधारित है, जो भाई-बहन के संबंध को दर्शाता है। विरोध अभियानों के विपरीत आयोजक की एक प्रवक्ता ने समाचार माध्यमों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि इसका अर्थ है कि हमारे बीच मतभेद, यहां तक कि गहरे मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन फिर भी हम संवाद, सम्मान और अपनी साझा मानवता को चुन सकते हैं। यह एक वक्तव्य ही दोनों पक्षों के चरित्र में गुणात्मक अंतर को दर्शाने वाला था। अब जरा कार्यक्रम की ओर आएं। संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष है और इसके तहत देश और विदेश दोनों जगह कार्यक्रम हो रहे हैं। मोहन भागवत के अमेरिका के साथ कनाडा और ब्रिटेन में भी कार्यक्रम हैं। इसका विषय क्या था? यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन यानी ‘एक विश्व–एक मानवता उत्सव’। आप सोचिए, आज विश्व के संदर्भ में संपूर्ण विश्व की विविधताओं के बीच एकता के उत्सव से बड़ा विश्व कल्याण की दृष्टि से प्रासंगिक कार्यक्रम क्या हो सकता था? संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने अधिकृत वक्तव्य में स्पष्ट किया कि कार्यक्रम का आयोजन खुले संवाद की भावना से किया गया है। सरसंघचालक अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों से जुड़े लोगों के सामने अपनी बात रखेंगे। यह कार्यक्रम खुले संवाद और एक-दूसरे के सम्मान की भावना से आयोजित किया गया है, जो भारतीय विचार को दर्शाता है। कार्यक्रम कैसा रहा? मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर की क्षमता 5,570 है। लाइव प्रसारण में सभागार खचाखच भरा था। काफी संख्या में लोग बाहर भी खड़े थे। ध्यान रखिए, कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के साथ-साथ 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि तथा 180 से अधिक आध्यात्मिक एवं धार्मिक क्षेत्र के प्रमुख लोग भी थे। वास्तव में भागवत ने अपने संबोधन में उसी भाव को सामने रखा, जो कार्यक्रम का उद्देश्य बताया गया। यहां उनके विचारों पर विस्तार से नहीं जा सकते, किंतु कुछ पंक्तियों का उल्लेख आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं हैं, वे एक दायित्व का निर्वाह करते हैं। भारत का दायित्व है कि वह विविधता में एकता के इस सत्य का साक्षात्कार करे और समय-समय पर संसार को भी इस सत्य का साक्षात्कार कराए। वननेस क्या है? इसका उत्तर देते हुए भागवत ने कहा कि भौतिक सुख स्थायी सुख या समाधान नहीं हैं। सच है कि केवल भौतिक सुख और उपलब्धियों के कारण ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्रों के बीच समस्याएं बढ़ी हैं। इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन के बोधवाक्य ‘आत्मनो मोक्षार्थम् जगद्धिताय च’ की बात की। यानी अपनी आत्मा का मोक्ष विश्व कल्याण में ही निहित है। मैं आप में हूं और आप मुझ में हैं। हम सब एक-दूसरे में समाए हैं, यही वननेस है। भारतीय होने के नाते हमें संपूर्ण विश्व के कल्याणार्थ इस विचार को अपने आचरण से फैलाना है। आप सोचिए, इस तरह के संबोधन में किस पहलू का विरोध हो सकता है? अमेरिका की धरती पर उन्होंने यह भी कहा कि विश्व में दो प्रकार के लोग हैं। एक कहते हैं, ‘जियो और जीने दो।’ दूसरे कहते हैं कि ‘मात्र उन्हीं को जीने का अधिकार है, जो हमारी बात मानते हैं। हम उन्हीं की रक्षा करेंगे, जो हमारे मत को मानेगा।’ यह दूसरे प्रकार के लोग असुर श्रेणी में आते हैं और पहले प्रकार के लोग देव कहलाते हैं। क्या यह सच नहीं है कि अमेरिका सहित अनेक देशों ने अपना चरित्र यही दिखाया है और इसी कारण विश्व तनाव, संघर्ष सहित अनेक जटिलताओं और समस्याओं में उलझा हुआ है? यही नहीं, इसी सोच से निर्मित संगठन और व्यक्ति भी हमारे सामने हैं। भले भागवत ने ऐसा नहीं कहा, क्योंकि हिंदुत्व या हिंदू विचार अथवा भारतीय विचार किसी को भी तीखा बोलकर विरोधी बनाने या चोट पहुंचाने की बात नहीं करता, बल्कि सकारात्मक बातों से उसकी सोच बदलने का मार्ग दिखाता है। यही उन्होंने अमेरिका की भूमि से संदेश दिया। सभी धर्मों के प्रति सम्मान के साथ कोई यह सोचे या चाहे कि दूसरे पंथ के लोग उसके देश में रहें, पर हिंदू न हों, तो वह हिंदू नहीं हो सकता। कोई भारत में पैदा हुआ या मूल रूप से भारतीय है और वह अमेरिका में रहता है तो वह कैसा व्यवहार करे? उन्होंने कहा कि जो लोग भारत से बाहर दूसरे देशों में बसे हैं, वह देश उनकी कर्मभूमि हैं। अगर हम अमेरिका में हैं तो अमेरिका का ही हिस्सा हुए। हमें अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी तरह प्रामाणिक रहना चाहिए। किंतु क्योंकि आप भारतवंशी हैं, वह आपके पुरखों की जन्मभूमि है। इसलिए भारत के लिए कुछ करना संभव है तो अवश्य करें, किंतु आपकी जन्मभूमि आपसे अपेक्षा करती है कि जिन मूल्यों को लेकर आपका और आपके पुरखों का जीवन बना है, उन मूल्यों के साथ आप अपनी कर्मभूमि में कार्य करें। सच कहें तो संघ, हिंदुत्व, हिंदू और भारत के वास्तविक व्यापक दृष्टिकोण को रखकर भागवत ने भावगत रूप से विरोधियों को नि:शब्द कर दिया। किंतु जिन्हें कुछ मानना ही नहीं है और जिनके अंदर रोग के स्तर पर संघ का विरोध है, वे न पहले माने हैं और न आगे मानेंगे। वे जो कुछ बोलते हैं, प्रचारित करते हैं, लिखते हैं, वह सब झूठ पर आधारित होता है। साफ है कि उनके भाषण के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदुत्व, भारत आदि में रुचि रखने वाले हर समूह के लोगों की जिज्ञासाओं का समाधान हुआ होगा। निश्चय ही उनके मन में विचार आएगा कि ये बड़े-बड़े संगठन और विरोधी जिस तरह का दुष्प्रचार कर रहे थे, पूरी बात ठीक उसके विपरीत जगत कल्याण और व्यक्ति, राष्ट्र, पर्यावरण सबकी रक्षा के संदर्भ में थी। सीमाओं के बाहर कोई भी व्यक्ति, भले किसी संगठन और विचार का हो, अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। इस रूप में भागवत का उद्बोधन संघ संगठन की सीमाओं तक सीमित न होकर भारतीय विचार और भारत के पक्ष को सही संदर्भ में रखने वाला माना जाएगा। तो हम इसे ही संघ का चरित्र और ध्येय क्यों नहीं मानें? वस्तुतः कोई माने या न माने, संघ के शीर्ष पदाधिकारी हमेशा इसी विचार को आगे बढ़ाने का वक्तव्य देते और आचरण करते दिखते हैं। इसीलिए आप देखेंगे कि इतने विरोध और निंदा के बावजूद सामान्यतः वे इनका उत्तर देने या खंडन करने का व्यवहार नहीं अपनाते। भारत में संघ का अभी तक यही चरित्र रहा है और विश्व के कार्यक्रमों के संदर्भ में भी किसी विरोध के प्रतिउत्तर की कोई कोशिश तक नहीं हुई। यह ऐसा व्यवहार है, जिससे देश और विदेश के विरोधियों को सीखना चाहिए। इसी से संघ का समर्थन लगातार बढ़ता है। अमेरिका में उस तरह का कार्यक्रम स्वयं उन संगठनों के वश की बात नहीं है, जो विरोध का ध्वज उठाए हुए थे।

Related Articles

मूलनिवासी दिवस के बहाने भारत को बांटने का आख्यान

जनजातीय समाज के अधिकार और सम्मान की चिंता आवश्यक, लेकिन भारत की सभ्यता को ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ के पश्चिमी चश्मे से देखना ऐतिहासिक भूल

Aug 09, 2026

पाकिस्तान के इस्लामी चरित्र की सच्चाई

जब नफरत सामान्य हो जाए, तो हिंसा असामान्य नहीं रह जाती।

Feb 12, 2026