धर्म बदलने से नहीं मिलेगा पुरानी जाति के आधार पर आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को दिया झटका
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वीएसके डेस्क
October 16, 2026
समाचार › देश-विशेष
नई दिल्ली। धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण की पात्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपनी पुरानी जाति के आधार पर मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का प्रमाणपत्र पाने का हकदार नहीं हो जाता। शीर्ष अदालत ने इस मामले में तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज कर मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की। विवाद इस बात को लेकर था कि क्या धर्म परिवर्तन करने के बाद कोई व्यक्ति अपने पूर्ववर्ती सामाजिक वर्ग के आधार पर मुस्लिम पिछड़ा वर्ग की आरक्षण संबंधी सुविधाओं का दावा कर सकता है।
परमशिवम से समीर अहमद बनने के बाद शुरू हुआ विवाद
यह मामला तमिलनाडु के समीर अहमद से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था। धर्म परिवर्तन से पहले उनका नाम परमशिवम था। बाद में उन्होंने मुस्लिम लब्बाई समुदाय के पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया, लेकिन तहसीलदार ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद मामला अदालत पहुंचा।
तमिलनाडु सरकार के आदेश को हाई कोर्ट ने किया था रद्द
तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक आदेश जारी किया था। इसके तहत पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग का प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई थी।
मद्रास हाई कोर्ट ने जून 2026 में इस आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
प्रमाणपत्र के लिए संबंधित वर्ग की पात्रता जरूरी
अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह है कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी दूसरे धर्म के अधिसूचित पिछड़े वर्ग में सदस्यता अपने आप हासिल नहीं हो जाती। संबंधित वर्ग में शामिल होने के लिए निर्धारित कानूनी शर्तों और पात्रता को पूरा करना जरूरी है। केवल पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।
अनुसूचित जाति के दर्जे पर भी नियम लागू
अनुसूचित जाति के दर्जे के संबंध में संविधान के मौजूदा प्रावधान हिंदू, सिख और बौद्ध धर्मों के पात्र समुदायों को शामिल करते हैं। इस सूची से बाहर के धर्म को अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा बनाए रखने का दावा सामान्यतः स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि मुस्लिम समुदायों को पहले से उपलब्ध पिछड़ा वर्ग आरक्षण समाप्त कर दिया गया है। निर्णय का संबंध धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति की पात्रता और पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर नए वर्ग का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के दावे से है।