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हिंदू साम्राज्य दिवस: स्वराज्य, स्वाभिमान और राज्याभिषेक की ऐतिहासिक गाथा

By डॉ. शुचि चौहान June 27, 2026
लेख
हिंदू साम्राज्य दिवस: स्वराज्य, स्वाभिमान और राज्याभिषेक की ऐतिहासिक गाथा
भारतीय इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल किसी महान व्यक्ति की स्मृति तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राजनीतिक स्वाधीनता के स्थायी प्रतीक बन जाती हैं। हिंदू साम्राज्य दिवस ऐसी ही एक ऐतिहासिक स्मृति है। यह दिवस छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की स्मृति में मनाया जाता है—एक ऐसी घटना जिसने भारतीय इतिहास में स्वराज्य, स्वाभिमान और वैधानिक स्वतंत्र सत्ता की स्थापना का नया अध्याय आरंभ किया। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, संवत् 1731 (6 जून 1674) को रायगढ़ दुर्ग पर शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। यह केवल एक राजा के सिंहासनारोहण का समारोह नहीं था, बल्कि कई शताब्दियों के राजनीतिक संघर्षों के बीच भारतीय परंपरा पर आधारित एक स्वतंत्र राज्य व्यवस्था की औपचारिक घोषणा थी। इस ऐतिहासिक क्षण ने यह संदेश दिया कि स्वराज्य केवल एक स्वप्न नहीं, बल्कि संगठित संकल्प, नेतृत्व और जनशक्ति के बल पर प्राप्त की जा सकने वाली वास्तविकता है।

स्वराज्य का संकल्प

सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता और निरंतर संघर्ष के दौर से गुजर रहा था। उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य अपने विस्तार के चरम पर था, जबकि दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा जैसी सल्तनतें प्रभावशाली थीं। अनेक स्थानीय हिंदू शासकों को या तो इन शक्तियों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ती थी अथवा निरंतर संघर्ष करना पड़ता था। ऐसी परिस्थितियों में महाराष्ट्र की धरती पर जन्मे शिवाजी महाराज ने स्वराज्य का स्वप्न देखा। उनकी माता राजमाता जीजाबाई ने रामायण, महाभारत तथा भारतीय इतिहास के वीर चरित्रों की कथाओं के माध्यम से उनमें धर्म, कर्तव्य, राष्ट्र और स्वाभिमान के संस्कार विकसित किए। दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने प्रशासन, संगठन और युद्धकला का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। किशोरावस्था में ही शिवाजी महाराज ने यह अनुभव कर लिया था कि प्रजा की सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि का आधार स्वशासन है। लगभग 1645 ईस्वी में उन्होंने स्वराज्य स्थापना का संकल्प लिया और तोरणा दुर्ग पर अधिकार प्राप्त कर अपने अभियान का आरंभ किया। इसके पश्चात उन्होंने एक-एक कर अनेक दुर्गों और प्रदेशों को अपने अधिकार में लिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली—'गनिमी कावा'—इतनी प्रभावी सिद्ध हुई कि विशाल सेनाएँ भी बार-बार पराजित हुईं। उन्होंने सिद्ध किया कि युद्ध केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, संगठन, नेतृत्व और जनसमर्थन से जीते जाते हैं।

संघर्ष और विजय

शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभाव से बीजापुर और मुगल दोनों ही चिंतित हो उठे। बीजापुर ने अपने सेनापति अफजल खान को उनके विरुद्ध भेजा। मार्ग में अफजल खान द्वारा अनेक मंदिरों को क्षति पहुँचाने और भय का वातावरण बनाने का प्रयास किया गया। 1659 में प्रतापगढ़ के समीप हुई ऐतिहासिक भेंट के दौरान उसने छलपूर्वक शिवाजी महाराज की हत्या का प्रयास किया, किंतु उनकी सतर्कता, साहस और पूर्व तैयारी के कारण वही मारा गया। यह घटना शिवाजी महाराज की रणनीतिक सूझबूझ और अदम्य धैर्य का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। इसके पश्चात मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने भी शिवाजी महाराज को दबाने के लिए अनेक अभियान चलाए। 1663 में शिवाजी महाराज ने पुणे में शाइस्ता खान के निवास पर साहसिक आक्रमण कर उसे गंभीर क्षति पहुँचाई। अगले वर्ष सूरत पर किए गए अभियान ने मुगल साम्राज्य की आर्थिक प्रतिष्ठा को भी चुनौती दी। इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि शिवाजी महाराज केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक संगठित राजनीतिक चुनौती बन चुके थे। 1665 में आमेर के राजा जयसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना के दबाव के परिणामस्वरूप पुरंदर की संधि हुई। इसके बाद शिवाजी महाराज आगरा दरबार पहुँचे, जहाँ उन्हें अपेक्षित सम्मान न देकर नजरबंद कर दिया गया। किंतु उन्होंने अद्भुत चातुर्य और साहस का परिचय देते हुए वहाँ से सफलतापूर्वक निकलने में सफलता प्राप्त की। आगरा से लौटने के बाद उन्होंने पुनः अपने राज्य का संगठन किया और खोए हुए अनेक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया।

राज्याभिषेक : वैधानिक स्वराज्य की घोषणा

यद्यपि शिवाजी महाराज व्यवहारिक रूप से स्वतंत्र शासक बन चुके थे, फिर भी भारतीय परंपरा में राज्याभिषेक शासक की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक वैधता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता था। इसी उद्देश्य से उनके औपचारिक राज्याभिषेक का निर्णय लिया गया। वाराणसी के विख्यात विद्वान गागा भट्ट को इस समारोह का नेतृत्व करने हेतु आमंत्रित किया गया। उपलब्ध वंशावली और तत्कालीन परंपराओं के आधार पर उन्होंने शिवाजी महाराज के क्षत्रिय होने का समर्थन किया, जिससे वैदिक विधि से राज्याभिषेक संपन्न कराया जा सका। 6 जून 1674 को रायगढ़ दुर्ग पर भव्य समारोह आयोजित हुआ। देश के विभिन्न भागों से विद्वान, संत, राजपुरुष और प्रतिनिधि इस अवसर पर उपस्थित हुए। पवित्र नदियों का जल मंगवाया गया और वैदिक मंत्रोच्चार के मध्य शिवाजी महाराज का अभिषेक हुआ। उन्हें "छत्रपति" की उपाधि प्रदान की गई, उनके नाम से स्वर्ण मुद्राएँ जारी की गईं तथा प्रशासन में संस्कृत और मराठी को विशेष स्थान दिया गया। यह समारोह स्वतंत्र और सार्वभौम राज्य की औपचारिक उद्घोषणा था।

सुशासन का आदर्श

राज्याभिषेक के पश्चात शिवाजी महाराज ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। अष्टप्रधान परिषद के माध्यम से शासन के विभिन्न विभागों का सुव्यवस्थित संचालन सुनिश्चित किया गया। राजस्व व्यवस्था में सुधार किए गए, किसानों के हितों की रक्षा की गई तथा प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनाया गया। महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को उन्होंने विशेष महत्व दिया। युद्ध के दौरान महिलाओं तथा धार्मिक स्थलों को क्षति न पहुँचाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए। साथ ही समुद्री सुरक्षा की आवश्यकता को समझते हुए उन्होंने एक संगठित और सशक्त नौसेना का निर्माण किया, जो उस समय भारतीय शासकों में अत्यंत विरल पहल थी।

ऐतिहासिक प्रभाव

शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का महत्व केवल मराठा राज्य की स्थापना तक सीमित नहीं रहा। इसने भारतीय समाज में आत्मविश्वास का नया संचार किया और यह संदेश दिया कि भारतीय परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों तथा जनशक्ति के आधार पर भी एक सुदृढ़ और सुशासित राज्य की स्थापना संभव है। आगे चलकर मराठा शक्ति निरंतर विकसित हुई और अठारहवीं शताब्दी में भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में से एक बन गई। दिल्ली तक मराठा प्रभाव का विस्तार इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था, जिसकी औपचारिक आधारशिला रायगढ़ के राज्याभिषेक में रखी गई थी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी शिवाजी महाराज का जीवन भारतीय राष्ट्रवाद और स्वाभिमान की प्रेरणा बना। अनेक क्रांतिकारियों, समाज सुधारकों और राष्ट्रनायकों ने उनके साहस, संगठन क्षमता और राष्ट्रनिष्ठा को आदर्श माना।

आज की प्रासंगिकता

आज हिंदू साम्राज्य दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि स्वराज्य, सुशासन, सांस्कृतिक आत्मगौरव और राष्ट्रीय एकता के उन आदर्शों का पुनर्स्मरण है जिन्हें शिवाजी महाराज ने अपने जीवन से साकार किया। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य या आर्थिक सामर्थ्य में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता के प्रति अटूट समर्पण में निहित होती है। रायगढ़ के सिंहासन पर संपन्न वह राज्याभिषेक केवल एक राजकीय समारोह नहीं था, बल्कि भारतीय आत्मविश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा का उद्घोष था। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यह सिद्ध किया कि स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण शासन, सांस्कृतिक गौरव, जनकल्याण और उत्तरदायी नेतृत्व का समन्वित आदर्श है। यही कारण है कि हिंदू साम्राज्य दिवस आज भी हमें इतिहास से प्रेरणा लेकर वर्तमान को सुदृढ़ बनाने और भविष्य का निर्माण आत्मविश्वास एवं राष्ट्रनिष्ठा के साथ करने का संदेश देता है।

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