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परिवार बचाने हैं तो वोकिज्म को समझना होगा

By डॉ. शुचि चौहान September 10, 2026
लेख
परिवार बचाने हैं तो वोकिज्म को समझना होगा
वोकिज्म ने भारत में अभी पांव ही रखे हैं, लेकिन यूरोप लंबे समय से इसके प्रभाव से जूझ रहा है और अमेरिका में इसके सामाजिक परिणामों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। वोकिज्म शब्द ‘वोक’ से बना है, जिसका अर्थ है- जागा हुआ। लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर यह कैसी जागृति है जो समाज और परिवार के विखण्डन का कारण बन गई है? मार्क्सवाद से तो हम सभी परिचित हैं। यह वर्ग संघर्ष और घृणा पर आधारित है। इसमें रिलिजन, परिवार और देश प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं। मार्क्सवाद ने समाज को वर्गों में बांटकर शोषित और शोषक की अवधारणा विकसित की। मजदूर बनाम मालिक, किसान बनाम जमींदार के विभाजन खड़े किए और वर्ग संघर्ष को परिवर्तन का आधार बनाया। लेकिन जब बंदूक और क्रांति के माध्यम से व्यवस्था बदलने का प्रयोग अपेक्षित सफलता नहीं दे सका और स्वयं सोवियत संघ विघटित हो गया, तब मार्क्सवादियों ने रणनीति और रूप बदल लिया। इस बार ये सोशल जस्टिस, एनवायरमेंटल जस्टिस और महिला अधिकारों के पैरोकारों के अवतार में हैं। अब इनका निशाना संस्कृति, परम्पराएं, सामाजिक संस्थाएं और युवा हैं। इसे कल्चरल मार्क्सिज्म कहा जा रहा है। वोकिज्म इसी का नया रूप है। इस के मुख्य रूप से चार स्तम्भ हैं। पहला है अति-व्यक्तिवाद। इसका जोर इस बात पर है कि व्यक्ति की पहचान उसके परिवार, समाज, धर्म या परंपरा से नहीं, बल्कि उसकी अपनी इच्छा से निर्धारित होनी चाहिए। चूंकि जाति, रिलिजन, नस्ल और सांस्कृतिक पहचान जैसी चीजें परिवार और समाज से मिलती हैं, इसलिए व्यक्ति को इनसे दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। यहां तक कि माता-पिता और परिवार को भी व्यक्ति की स्वतंत्रता के अवरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विचार यह कि शरीर आपका है, इच्छाएं आपकी हैं, इसलिए जीवन के निर्णय भी केवल आपकी इच्छा से होने चाहिए। इसी सोच का अगला विस्तार फ्री सेक्स और संबंधों की पारंपरिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास में दिखाई देता है। विवाह क्यों आवश्यक है? एक ही व्यक्ति के साथ जीवनभर क्यों रहना? बच्चे पालने की जिम्मेदारी क्यों उठानी? यदि दो लोग साथ रहना चाहते हैं तो विवाह के बिना भी रह सकते हैं। इस सोच में लिव-इन रिलेशनशिप को स्वाभाविक और विवाह जैसी संस्थाओं को अनावश्यक बंधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ती है। परिवार, परंपरा और सामाजिक मर्यादाएं यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने वाली व्यवस्थाओं के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। वोकिज्म का तीसरा महत्वपूर्ण स्तम्भ है विकृत स्त्रीवाद। वोकिस्टों की दृष्टि में एक स्त्री परिवार में कभी खुश रह ही नहीं सकती। संयुक्त परिवार में तो बिल्कुल नहीं। इनके अनुसार सारी जिम्मेदारियां स्त्री पर ही लाद दी जाती हैं। वह अपना करियर नहीं बना पाती। पूरी उम्र बच्चे पालती है, घर के काम करती है। वह एकल परिवार में है तो कहते हैं पति शोषक है यानि परिवार संयुक्त हो या एकल, इस विचार में हर जगह स्त्री को शोषित और पुरुष को शोषक के रूप में देखने का आग्रह दिखाई देता है। यहां तक कि “marriage is a license for prostitution” जैसे अतिवादी विचार भी इसी विमर्श का हिस्सा हैं। चौथा पक्ष है जेंडर और ट्रांसजेंडरवाद का। इस विचारधारा में लड़का लड़की बायोलॉजीकली अलग नहीं हैं। बच्चे को जेंडर उसके माता पिता व डॉक्टर पैदा होने के समय देते हैं। इनके अनुसार जेंडर एक कल्चरल कंस्ट्रक्ट है। बच्चा जब 4-5 वर्ष का हो जाता है तब उसे पता चलता है कि वह लड़का है या लड़की। अमेरिका में छोटे छोटे बच्चों को स्कूल में यह सब बताया / सिखाया जाता है। फिर यदि 10-12 वर्ष की कोई बच्ची यह कहे कि मैं लड़का हूं, तो बिना माता पिता को बताए या बिना उनकी अनुमति के वह हॉर्मोनल ट्रीटमेंट ले सकती है, सर्जरी करवा सकती है। माता पिता कुछ कहें तो उन पर मुकदमे चलाए जाते हैं। पुस्तक टर्माइट के लेखक अभिजीत जोग एक इंटरव्यू में कहते हैं कि “भारतीय समाज में जिस प्रकार जातिवाद का जहर घोला जाता है, वैसे ही अमेरिका में नस्लवाद है, गोरा बनाम काला। वहां के गोरे बच्चों पर अपराध भावना और काले बच्चों पर विक्टिमहुड थोपी जाती है। बच्चे भारतीय हैं तो उनसे उनकी जाति पूछी जाती है। स्कूल में छोटे छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है, तुम गोरे हो तुम्हारे पूर्वजों ने कालों पर बहुत अत्याचार किए हैं। बच्चे असहज हो जाते हैं। अपराध भावना बढ़ने पर वे भी शोषित बनना चाहते हैं।” जोग कहते हैं, “वे अपना रंग तो बदल नहीं सकते, उन्हें जेंडर बदलने का खयाल आता है। लड़की कहती है, मुझे लगता है मैं लड़का हूं। वह स्वयं को ट्रांसजेंडर घोषित कर देती है। शोषित बनते ही अपराध भावना समाप्त हो जाती है। फिर स्कूलों में ट्रांसजेंडर को हीरो की तरह प्रस्तुत किया जाता है, इससे भी बच्चे इस ओर आकर्षित होते हैं। वे LGBTQ में Q यानि Queer के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वहॉं यदि किसी बच्चे को लगे कि वह कैट है तो आपको मानना पड़ेगा कि वह कैट है, आप कुछ नहीं कर सकते। वहॉं के किसी स्कूल में कोई बच्ची दोनों हाथों और पांवों पर चलने लगी, म्याऊं म्याऊं आवाज निकालने लगी, बोली मुझे लगता है मैं बिल्ली हूं, तो स्कूल प्रशासन कुछ नहीं कर सका। ऐसे ही वह ऑस्ट्रेलिया का एक उदाहरण देते हैं कि वहां 25 लड़के इकट्ठे हो गए और भौं भौं की आवाज निकालने लगे, बोले हमें लगता है हम कुत्ते हैं। अमेरिका में हालात यहॉं तक पहुंच गए हैं कि किसी लड़के ने यह घोषित कर दिया कि उसे लगता है वह लड़की है, तो वह लेडीज ट्वायलेट में जा सकता है। किसी आदमी को रेप के मामले में जेल हुई, उस आदमी ने कहा मुझे लगता है मैं स्त्री हूं, तो उसे जेल में महिला सेल में रखा जाएगा। यानि महिला सुरक्षा से अधिक मायने किसी ट्रांसजेंडर के अधिकार रखते हैं। मजे की बात यह है कि उसे बस लगना चाहिए, इसके लिए कोई बॉयोलॉजिकल प्रमाण देने की भी आवश्यकता नहीं है। आज भारत में भी कॉमन ट्वायलेट्स की मांग जोर पकड़ने लगी है। मेट्रो सिटीज में लिव इन रिलेशनशिप सामान्य बात है। समलैंगिक विवाह भी अजूबे नहीं रह गए। पिछले वर्ष एक लड़की ने स्वयं से शादी (sologamy) कर ली। ब्रेक अप और तलाक उत्सव की तरह मनाए जा रहे हैं। हिन्दू त्यौहारों ही नहीं विवाह परम्पराओं, रीति-रिवाजों पर भी उंगलियां उठायी जा रही हैं। आलिया भट्ट ने एक विज्ञापन में कन्यादान पर प्रश्न खड़े किए हैं। आमिर खान की सीरीज सत्यमेव जयते में कमला भसीन के एक वीडियो में पति को पालक तो पत्नी को दासी बताया गया है। जेएनयू में कुछ जागे हुए छात्र (वोक) स्वयं को शिखंडी बताकर प्रसन्न हो रहे हैं। ये छात्र मूंछें रखते हैं और साड़ी पहनते हैं, बिंदी और लिपस्टिक भी लगाते हैं। चिंता की बात यह है कि कई बार हमारी न्यायपालिका भी उनके साथ खड़ी दिखती है। भारत को वोकिज्म के प्रकोप से बचाना है तो समय रहते हमें इसकी जड़ों को पहचानना होगा। यहॉं परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं है। यह वह पहली संस्था है जहां व्यक्ति संबंधों की जिम्मेदारी, त्याग, सहनशीलता, कर्तव्य और सहयोग की भावना सीखता है। परिवार व्यक्ति को उसकी जड़ों से जोड़ता है और पीढ़ियों के बीच अनुभव और संस्कार का सेतु बनता है। इस अदृश्य दुश्मन से बचने के लिए आवश्यक है हम किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार न करें कि उसके साथ ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ या ‘न्याय’ जैसे आकर्षक शब्द जुड़े हैं। हमें यह देखना होगा कि उसके पीछे की विचारधारा क्या है, वह समाज को किस दिशा में ले जा रही है और उसका परिवार, बच्चों तथा आने वाली पीढ़ियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

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