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NEET : हिजाब तो चलेगा कलावा नहीं, यह भेदभाव क्यों?

By वीएसके डेस्क June 22, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
NEET : हिजाब तो चलेगा कलावा नहीं, यह भेदभाव क्यों?
अजमेर, 22 जून। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के आयोजन के दौरान एक बार फिर हिजाब, बुर्का और परीक्षा ड्रेस कोड को लेकर बहस छिड़ गई है। देशभर में आयोजित इस परीक्षा में 22 लाख से अधिक अभ्यर्थी शामिल हुए, जबकि मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या लगभग एक लाख है। ऐसे में परीक्षा की निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर बनाए गए नियमों के अनुपालन पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। अजमेर सहित देश के कुछ परीक्षा केंद्रों पर मुस्लिम छात्राओं के हिजाब और बुर्का पहनकर परीक्षा केंद्र पहुंचने को लेकर विवाद सामने आया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अजमेर के एक केंद्र पर एक मुस्लिम छात्रा ने कहा कि वह हिजाब हटाने के बजाय परीक्षा छोड़ना पसंद करेगी। बाद में सुरक्षा जांच और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया के बाद उसे परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी गई। छात्रा और उसके परिजनों का कहना था कि हिजाब उनकी मजहबी मान्यताओं का हिस्सा है। इसके बिना घर से बाहर निकलना उनके लिए संभव नहीं है। वहीं जयपुर के इस्लामिक सेंटर के संयोजक मोहम्मद नाजिम ने मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा- ऐसी घटनाओं से स्पष्ट है कि मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। उन्हें टारगेट किया जा रहा है। ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। इस घटना के बाद ड्रेस कोड के समान अनुपालन और उलेमा के बयान को लेकर प्रश्न उठने लगे। अनेक अभ्यर्थियों और अभिभावकों ने दावा किया कि परीक्षा केंद्रों पर हिंदू समुदाय की छात्राओं को मंगलसूत्र, नाक की लोंग, कानों की बालियां और हाथ में बंधा कलावा तक हटाने के निर्देश दिए गए। कुछ स्थानों पर पूरी बांह के कपड़ों और सिर पर दुपट्टा रखने को लेकर भी सख्ती बरती गई। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और तस्वीरें भी सामने आईं, जिनमें छात्राएं परीक्षा केंद्र के बाहर आभूषण उतारती दिखाई दीं। अभिभावकों का कहना है कि यदि परीक्षा की सुरक्षा और निष्पक्षता के लिए सख्त ड्रेस कोड लागू किया जाता है, तो उसका पालन सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से होना चाहिए। मजहबी आधार पर हिजाब या बुर्के को अनुमति देने और दूसरी ओर अन्य अभ्यर्थियों के पारंपरिक रिलीजियस प्रतीकों पर रोक लगाने से समानता को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं और उलेमा का बयान तो बेहद शर्मनाक है। वे इस अवसर पर भी समानता की बात न करके विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। इस पूरे विवाद के बीच चिकित्सा शिक्षा को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। मेडिकल शिक्षा में विद्यार्थियों को मानव शरीर की विस्तृत संरचना, शल्य चिकित्सा और अस्पतालों के व्यावहारिक प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में अंततः संस्थान द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड, स्वच्छता मानकों और व्यावसायिक नियमों का पालन सभी विद्यार्थियों को करना पड़ता है, चाहे वे किसी भी रिलिजन या समुदाय से हों। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का कहना रहा है कि ड्रेस कोड और सुरक्षा संबंधी नियम परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए बनाए जाते हैं। हालांकि इस वर्ष भी हिजाब, बुर्का, धार्मिक प्रतीकों और पारंपरिक आभूषणों को लेकर उत्पन्न विवाद ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या वर्तमान दिशा-निर्देश पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं अथवा इनमें और अधिक पारदर्शिता तथा एकरूपता की आवश्यकता है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और अभिभावकों का मानना है कि भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट, लिखित और समान रूप से लागू होने वाले दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि नियम ऐसे हों जिनसे परीक्षा की सुरक्षा और निष्पक्षता भी बनी रहे तथा किसी भी अभ्यर्थी को भेदभाव या असमान व्यवहार का अनुभव भी न हो।

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