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राजस्थान के प्रथम परमवीर चक्र विजेता कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत की अमर गाथा।

जब एक अकेला सैनिक पूरी सेना बन गया।

By चंद्रशेखर July 18, 2026
लेख
राजस्थान के प्रथम परमवीर चक्र विजेता कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत की अमर गाथा।
"इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता। इतिहास उन व्यक्तित्वों की अमर स्मृति भी होता है, जो अपने साहस, त्याग और बलिदान से आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाते हैं। कुछ वीर समय के साथ भुला दिए जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जिनकी वीरता स्वयं कालजयी बन जाती है। कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत ऐसे ही अमर योद्धा हैं।" भारतीय संस्कृति में मातृभूमि को केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं माना गया, बल्कि उसे 'जननी' और 'भारत माता' के रूप में पूजनीय स्थान दिया गया है। यही कारण है कि इस देश की सभ्यता में राष्ट्ररक्षा को केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि धर्म माना गया है। जब-जब इस भूमि पर संकट आया, तब-तब ऐसे वीरों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र की अस्मिता को अक्षुण्ण रखा। महाराणा प्रताप के हल्दीघाटी के रण से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य संघर्ष तक, गुरु गोविंद सिंह के खालसा से लेकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज तक, भारतीय इतिहास वीरता के असंख्य स्वर्णिम अध्यायों से आलोकित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह परंपरा रुकी नहीं। 1947-48 के प्रथम भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना ने जिस अद्वितीय साहस का परिचय दिया, उसने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्र भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किसी भी बलिदान से पीछे नहीं हटेगा। इसी युद्ध में एक ऐसा योद्धा उभरा, जिसने अकेले शत्रु के अनेक बंकरों पर धावा बोलकर युद्ध की दिशा बदल दी। वह वीर थे—कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत, राजस्थान के प्रथम परमवीर चक्र विजेता।

वीरों की भूमि राजस्थान का सपूत।

राजस्थान का नाम लेते ही मन में शौर्य, स्वाभिमान और बलिदान की अनगिनत गाथाएँ जीवंत हो उठती हैं। इस भूमि की धूल में इतिहास के असंख्य युद्धों की स्मृतियाँ समाई हैं। राजस्थान का शेखावाटी अंचल तो विशेष रूप से सैनिकों की जन्मभूमि माना जाता है। देश की सेनाओं में सेवा देने वाले हजारों सैनिक इसी क्षेत्र से निकले हैं। गाँवों में आज भी फौजी वर्दी केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का प्रतीक मानी जाती है। इसी वीरभूमि के बेरी गाँव (वर्तमान झुंझुनूं जिला) में 20 मई 1918 को लाल सिंह शेखावत और श्रीमती तारावती देवी के घर एक बालक ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया—पीरु सिंह। किसान परिवार में जन्मे इस बालक के पास भौतिक संसाधन भले ही सीमित थे, लेकिन साहस और आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं थी। बचपन से ही उनका शरीर गठीला, स्वभाव निर्भीक था। खेतों में काम करना, पशुओं की देखभाल करना, कुश्ती लड़ना और कठिन परिस्थितियों में स्वयं को ढालना उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था। औपचारिक शिक्षा में उनका मन अधिक नहीं लगा। वे चौथी-पाँचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सके, किंतु जीवन ने उन्हें जो शिक्षा दी, वही आगे चलकर उन्हें असाधारण सैनिक बनाने वाली थी—अनुशासन, धैर्य, कठिन परिश्रम और कभी हार न मानने का स्वभाव। उनके गाँव में जब भी कोई सैनिक छुट्टी पर घर आता, उसकी वर्दी, उसका आत्मविश्वास और उसके प्रति समाज का सम्मान बालक पीरु सिंह को गहराई से प्रभावित करता। धीरे-धीरे उनके मन में भी सैनिक बनने की तीव्र इच्छा जागी। अंततः 20 मई 1936 को, अपने अठारहवें जन्मदिन पर, वे ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हो गए। यह केवल एक नियुक्ति नहीं थी; यही वह क्षण था जिसने भारतीय सैन्य इतिहास के एक अमर अध्याय की भूमिका लिखनी शुरू कर दी। प्रारम्भिक सैन्य प्रशिक्षण के दौरान ही अधिकारियों ने उनके भीतर छिपे असाधारण साहस और नेतृत्व क्षमता को पहचान लिया। कठोर अनुशासन, लंबी पदयात्राएँ, कठिन युद्धाभ्यास और विपरीत परिस्थितियों में भी उत्साह बनाए रखने की उनकी क्षमता उन्हें अपने साथियों से अलग पहचान दिलाने लगी।

द्वितीय विश्वयुद्ध ने गढ़ा एक योद्धा।

सेना में भर्ती होने के कुछ वर्षों बाद विश्व, द्वितीय महायुद्ध की विभीषिका में उतर गया। पीरु सिंह ने भी सीमांत क्षेत्रों और विदेशों में सेवा करते हुए युद्ध की वास्तविक परिस्थितियों को निकट से देखा। उन्होंने उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के कठिन इलाकों में तैनाती निभाई, जहाँ पहाड़ी युद्ध, गुरिल्ला रणनीति और सीमित संसाधनों में लड़ने की कला का व्यावहारिक अनुभव मिला। बाद में वे प्रशिक्षण संबंधी दायित्वों से भी जुड़े और जापान में मित्र राष्ट्रों की सेना के साथ सेवा का अवसर मिला। इन अनुभवों ने उन्हें केवल एक कुशल निशानेबाज़ या बहादुर सैनिक ही नहीं बनाया, बल्कि एक ऐसा योद्धा बनाया जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन बनाए रख सकता था। युद्ध ने उन्हें सिखाया कि विजय केवल हथियारों से नहीं मिलती; विजय के लिए मनोबल, नेतृत्व, धैर्य और सही समय पर निर्णायक पहल आवश्यक होती है। यही गुण आगे चलकर टिथवाल की पहाड़ियों में उनकी सबसे बड़ी शक्ति बने।

स्वतंत्रता मिली, लेकिन संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। पूरे देश में उत्सव था, लेकिन इस उत्सव की छाया में एक गहरी पीड़ा भी थी—देश का विभाजन। विभाजन के साथ ही लाखों लोगों का विस्थापन हुआ, सांप्रदायिक हिंसा भड़की और पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा करने की योजना बना ली। कबायली हमलावरों और पाकिस्तानी सैनिकों को मिलाकर एक ऐसा आक्रमण किया गया जिसका उद्देश्य श्रीनगर तक पहुँचकर पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग कर देना था। यह स्वतंत्र भारत की पहली सैन्य परीक्षा थी। नवगठित भारतीय सेना के सामने संसाधनों की कमी थी, लेकिन सैनिकों के मनोबल में कोई कमी नहीं थी। वे जानते थे कि यह केवल सीमा की रक्षा का युद्ध नहीं, बल्कि भारत की एकता और अखंडता की रक्षा का युद्ध है। ऐसे ही निर्णायक समय में कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत और उनकी 6 राजपूताना राइफल्स को कश्मीर के सबसे कठिन मोर्चों में से एक—टिथवाल सेक्टर—की जिम्मेदारी सौंपी गई। यहीं से आरम्भ होती है वह अमर गाथा जिसने पीरु सिंह को अमरत्व प्रदान किया।

टिथवाल: जहाँ हिमालय की चोटियों पर लिखा गया अमर शौर्य का इतिहास।

सन् 1948 का ग्रीष्मकाल। भारतीय सेना एक ऐसे संघर्ष में थी, जो केवल भूभाग पर अधिकार का प्रश्न नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा का अभियान था। कुपवाड़ा जिले के उत्तर-पश्चिम में स्थित टिथवाल (Tithwal) उस समय युद्ध का सबसे संवेदनशील क्षेत्र बन चुका था। किशनगंगा (वर्तमान नीलम) नदी के किनारे स्थित यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। जो सेना इन ऊँचाइयों पर नियंत्रण स्थापित करती, वह आसपास की घाटियों, मार्गों और सैनिक गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रख सकती थी। यही कारण था कि पाकिस्तान समर्थित सैनिकों ने इस क्षेत्र की पर्वत चोटियों पर मजबूत बंकर, मशीनगन पोस्ट और गहरी खाइयों का ऐसा जाल बिछा दिया था कि उन पर सीधा आक्रमण करना लगभग आत्मघाती माना जाता था। किन्तु भारतीय सेना के लिए उन ऊँचाइयों पर अधिकार स्थापित करना अनिवार्य था। यदि शत्रु वहीं बना रहता तो आगे की सैन्य कार्रवाई कठिन हो जाती और कश्मीर की सुरक्षा पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता था। इसी अभियान का उत्तरदायित्व 6 राजपूताना राइफल्स को सौंपा गया। 'डी' कम्पनी के अग्रिम दस्ते का नेतृत्व कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत कर रहे थे।

18 जुलाई 1948 : जब मृत्यु से भी आगे बढ़ गया एक सैनिक।

18 जुलाई 1948 की सुबह... पहाड़ों पर हल्का धुंधलका था। वातावरण में असामान्य शांति थी, किंतु प्रत्येक सैनिक जानता था कि कुछ ही क्षणों बाद यह शांति गोलियों और विस्फोटों के शोर में बदलने वाली है। आदेश मिला—आक्रमण। भारतीय सैनिक दुर्गम ढलानों पर आगे बढ़ने लगे। सामने खड़ी चट्टानें, संकरी पगडंडियाँ और ऊपर से शत्रु की चौकियाँ—हर कदम मृत्यु के साये में उठ रहा था। जैसे ही भारतीय सैनिक शत्रु की मारक सीमा में पहुँचे, मशीनगनों ने आग उगलनी शुरू कर दी। दोनों ओर से गोलियों की बौछार होने लगी। मोर्टार के गोले फटने लगे। कुछ ही क्षणों में कई सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और अनेक गंभीर रूप से घायल हो गए। परंतु पीरु सिंह के कदम नहीं रुके। वे अपनी टुकड़ी को लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। वे स्वयं सबसे आगे थे। उनके लिए नेतृत्व का अर्थ पीछे खड़े होकर आदेश देना नहीं, बल्कि सबसे आगे चलकर उदाहरण प्रस्तुत करना था।
18 जुलाई 1948 : जब मृत्यु से भी आगे बढ़ गया एक सैनिक।

पहला बंकर....

शत्रु की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मशीनगनें थीं। जब तक वे सक्रिय रहतीं, भारतीय सैनिक आगे नहीं बढ़ सकते थे। पीरु सिंह ने परिस्थिति का आकलन किया और बिना किसी हिचकिचाहट के अकेले ही पहले मशीनगन बंकर की ओर दौड़ पड़े। चारों ओर से गोलियाँ चल रही थीं। वे चट्टानों का सहारा लेते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़े। जैसे ही अवसर मिला, वे बिजली की गति से बंकर तक पहुँचे और ग्रेनेड फेंक दिया। एक भीषण विस्फोट हुआ। मशीनगन शांत हो गई। भारतीय सैनिकों के लिए आगे बढ़ने का मार्ग खुल गया।

घायल शरीर, अडिग संकल्प।

पहला बंकर नष्ट होते ही शत्रु का ध्यान पूरी तरह पीरु सिंह पर केंद्रित हो गया। उन पर लगातार गोलियाँ बरसने लगीं। इसी बीच एक ग्रेनेड उनके अत्यंत निकट आकर फटा। विस्फोट इतना भीषण था कि उनका चेहरा लहूलुहान हो गया। शरीर के अनेक भाग घायल हो चुके थे। उनके वस्त्र रक्त से भीग गए। आँखों में रक्त भर जाने के कारण उन्हें स्पष्ट दिखाई भी नहीं दे रहा था। सामान्य परिस्थितियों में कोई भी पीछे हट जाता। लेकिन पीरु सिंह के लिए अब पीछे लौटने का कोई प्रश्न ही नहीं था। उनके सामने केवल लक्ष्य था।

जब एक सैनिक पूरी टुकड़ी बन गया।

इस समय तक उनके अधिकांश साथी या तो बलिदान हो चुके थे अथवा गंभीर रूप से घायल होकर लड़ने की स्थिति में नहीं थे। अब वे वस्तुतः अकेले थे। लेकिन अकेले होने का बोध भी उनके साहस को डिगा नहीं सका। उन्होंने आगे बढ़ना जारी रखा। स्टेन गन से गोलियाँ चलाते हुए वे दूसरे बंकर तक पहुँचे। जब गोला-बारूद समाप्त हो गया तो उन्होंने संगीन संभाली और हाथापाई में शत्रु सैनिकों पर टूट पड़े। भारतीय सैनिक परंपरा में संगीन युद्ध को असाधारण साहस का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसमें सैनिक प्रत्यक्ष रूप से मृत्यु का सामना करता है। पीरु सिंह ने यही किया। उन्होंने निकट युद्ध में शत्रु सैनिकों का सफाया किया और दूसरा बंकर भी निष्क्रिय कर दिया।
जब एक सैनिक पूरी टुकड़ी बन गया।

अंतिम आक्रमण : जिसने उन्हें अमर बना दिया।

अब सामने अंतिम बंकर बचा था। यहीं से लगातार मशीनगन चल रही थी। शरीर से रक्त बह रहा था। चेहरा गंभीर रूप से घायल था। थकान असहनीय थी। किन्तु उनका मन अभी भी अजेय था। उन्होंने अंतिम बार स्वयं को संभाला और तीसरे बंकर की ओर दौड़ पड़े। जैसे ही वे खाई के निकट पहुँचे, शत्रु की गोली उनके सिर में लगी। लेकिन पीरु सिंह ने गिरते हुए भी अपने हाथ से ग्रेनेड नहीं छोड़ा। उन्होंने अंतिम शक्ति जुटाकर ग्रेनेड शत्रु के बंकर में फेंक दिया। विस्फोट हुआ। बंकर ध्वस्त हो गया। शत्रु की मशीनगन हमेशा के लिए शांत हो गई। उसी क्षण भारत माता का यह वीर सपूत भी रणभूमि पर अमर हो गया। उनका शरीर धरती पर गिरा, लेकिन उनका साहस भारतीय सेना की अमर परंपरा का हिस्सा बन गया। उनके इस अद्वितीय पराक्रम ने भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया और अभियान की सफलता में निर्णायक भूमिका निभाई।

परमवीर चक्र : वीरता की सर्वोच्च पहचान

भारत सरकार ने उनके इस अद्वितीय शौर्य के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। उनकी आधिकारिक प्रशस्ति (Citation) केवल एक सम्मान-पत्र नहीं, बल्कि उस अद्वितीय साहस का प्रमाण है, जिसमें उल्लेख किया गया कि गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने शत्रु के एक के बाद एक बंकरों पर आक्रमण जारी रखा और अपने प्राणों की अंतिम आहुति तक कर्तव्य का पालन किया। उनकी वीरता भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप थी। पीरु सिंह इस सम्मान के सर्वथा अधिकारी थे।

राजस्थान का गौरव, भारत का प्रेरणास्तंभ

राजस्थान के इतिहास में पीरु सिंह का स्थान केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वे राज्य के प्रथम परमवीर चक्र विजेता थे। आज झुंझुनूं की धरती उन्हें अपना गौरव मानती है। भारतीय सेना के प्रशिक्षण संस्थानों में उनका नाम श्रद्धा से लिया जाता है। उनकी स्मृति में स्थापित प्रतिमाएँ केवल पत्थर की मूर्तियाँ नहीं हैं; वे आने वाली पीढ़ियों को यह स्मरण कराती हैं कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और सुरक्षा निरंतर त्याग की अपेक्षा करती है। वर्ष 2023 में अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के एक द्वीप का नाम उनके सम्मान में रखा जाना भी इसी राष्ट्रीय कृतज्ञता का प्रतीक है। पीरु सिंह शेखावत का जीवन इस सत्य का अमर प्रमाण है कि शरीर नश्वर है, किंतु राष्ट्र के लिए किया गया बलिदान अमर होता है।

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