आज के युद्ध और शिवाजी महाराज की रणनीतियाँ
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गिरीश जोशी
June 06, 2026
लेख
कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर कैप्टन अता हसनैन लिखते है – “आज दुनिया में युद्ध का स्वरूप बदल गया है, विशेष रूप से अब पूर्ण विजय मिलना लगभग समाप्त हो गया है, ऐसे राष्ट्र जो शक्ति में अपने दुश्मनों से कमतर हैं वो भी बलशाली राष्ट्रों को निरंतर युद्ध में उलझाए रखने की रणनीति पर काम करते दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए रूस और यूक्रेन का युद्ध हो, अमेरिका और ईरान का युद्ध हो यही ध्यान में आ रहा है। “
शिवाजी महाराज की रणनीति
मुगल साम्राज्य उस समय का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य माना जाता था। उनके राज्य का विस्तार, संसाधन, सैन्य शक्ति सब कुछ छत्रपति शिवाजी महाराज के सामने दस गुना से अधिक थे, लेकिन फिर भी शिवाजी महाराज की बनाई व्यवस्था ने औरंगजेब को एक दो नहीं पूरे 27 वर्षों तक युद्ध में झोंक कर रखा। महाराज के जाने के बाद उनके उत्तराधिकारियों छत्रपति शंभूराजे, राजाराम महाराज और तारा रानी ने संघर्ष करते हुए औरंगजेब को महाराष्ट्र की धरती पर उलझाए रखा। औरंगज़ेब तो हिंदवी स्वराज्य को समाप्त नहीं कर सका उल्टा वही महाराष्ट्र की धरती पर बड़ी लाचार अवस्था में मर गया और उत्तर में उसका मुग़ल साम्राज्य तहस नहस हो गया । नेतृत्व के चले जाने के बाद भी दुश्मन को लंबी लड़ाई में उलझाने की रणनीति का उदाहरण आज से 350 वर्ष पहले शिवाजी महाराज ने खड़ा किया था। आज दुनिया के छोटे-छोटे देश युद्ध में इस रणनीति पर चलते दिखाई दे रहे हैं।
शिवाजी महाराज का नवाचार
मुगलों से लड़ने के लिए उनकी रणनीति, उनके हथियारों, क्षमता, कमजोरी का अध्ययन कर अपने नए हथियार विकसित किए, नई रणनीति बनाई। शिवाजी महाराज ने जंगलों में लड़ने के लिए, पहाड़ों पर लड़ने के लिए, मैदान में लड़ने के लिए अलग अलग हथियार तैयार करवाए थे।
शिवाजी महाराज के राज्य का बड़ा हिस्सा कोंकण समुद्र के किनारे पर था। वहां धातु कम मिलती थी इसलिए उन्होंने ऐसे हथियार विकसित किए जिसमें धातु का प्रयोग कम होता था। उदाहरण के लिए मराठों ने एक ऐसा भाला तैयार किया जिसका नुकीला हिस्सा धातु का होता था और बचा हुआ पीछे का हिस्सा लकड़ी का होता था। इस भाले का भी ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए इसके लकड़ी वाले हिस्से को एक रस्सी से बांधा जाता था और एक बार भाले से वार करने के बाद शत्रु को समाप्त करने के बाद रस्सी से उस भाले को वापस खींच लिया जाता था यानी एक ही भाले से अनेक शत्रुओं को मार गिराने का काम मराठा सेना किया करती थी ।
महाराज की युद्धनीति के आयाम
आज के युद्ध मैदान में कम लेकिन ज्यादातर रणनीति, मनोविज्ञान, कूटनीति और समाज में विमर्श के स्तर पर लड़े जा रहे हैं ।इन आयामों पर यदि हम शिवाजी महाराज की लड़ाइयों जैसे अफजल खान के साथ हुई लड़ाई को देखें तो समझ में आता है कि महाराज ने अपने से कई गुना बड़े दुश्मन को समाप्त करने के लिए सारी रणनीतियों का प्रयोग किया था। अपनी कूटनीति से उसे पहाड़ों में आने के लिए मजबूर किया क्योंकि यहां वह कमजोर था। अफजल खान ने शिवाजी महाराज के राज्य की जनता का मनोबल तोड़ने उसका महाराज से समर्थन समाप्त करने के लिए उनकी कुलदेवी तुलजा भवानी के मंदिर को तोड़ा, महाराष्ट्र के कुल देवता भगवान विठ्ठल के मंदिर को हानि पहुंचायी, महिलाओं, बुजुर्गों, किसानों, यहां तक की बच्चों पर भी अत्याचार किए लेकिन जनता का महाराज पर विश्वास कायम रहा।
अफ़जल तरह- तरह की चालें चलता रहा लेकिन महाराज ने अपना पूरा ध्यान लक्ष्य पर बनाए रखा। वास्तव में यह हरकतें अफजल खान केवल शिवाजी महाराज के मनोबल को तोड़ने के लिए नहीं कर रहा था बल्कि वह उस समय के समाज में यह विमर्श भी बनाने का की कोशिश कर रहा था कि जो शिवाजी अपने आराध्य देवता के मंदिरों की रक्षा नहीं कर सकता, अपनी जनता की सुरक्षा नहीं कर सकता वह किसी राज्य को कैसे चल सकता है, उसे कैसे सुरक्षित रख सकता है लेकिन उस समय का समाज अफजल खान के इस विमर्श के झांसे में नहीं आया।
युद्धकला की नई दिशा
छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारतीय युद्धकला को नई दिशा दी। उनकी अनेक सफलताएँ कम संसाधनों से, श्रेष्ठ रणनीति, गति, भूगोल ज्ञान और मनोवैज्ञानिक युद्ध पर आधारित थीं। आज हम देखते हैं छोटे-छोटे हथियारों जैसे ड्रोन से दुश्मन के बड़े ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा रहा है। शाइस्ता खान जैसे बड़े दुश्मन को खत्म करने के लिए शिवाजी महाराज बहुत ही छोटी सी टुकड़ी लेकर गए थे अनेक वर्ग किलोमीटर में फैली उसकी छावनी के भीतर पर घुसकर शाइस्ता खान तक पहुंचना, उस पर हमला करना और वापस सुरक्षित लौट आना, ये शिवाजी महाराज की तत्कालीन युद्ध रणनीति का सफल प्रयोग था।
दुश्मन को खत्म करने के अभिनव प्रयोग
छत्रपति शिवाजी महाराज की महानता इस बात में थी कि उन्होंने हर युद्ध एक ही तरीके से नहीं लड़ा। वे परिस्थिति अनुसार रणनीति बदलते थे जहाँ गति आवश्यक वहाँ छापामार तरीके से लड़ाई लड़ते ,जहाँ रक्षा आवश्यक होती वहाँ से नया किला बनाते या शत्रु का बना बनाया किला जीत लेते, जहाँ कूटनीति आवश्यक होती वहाँ संधि कर लेते, जहाँ संदेश देना जरूरी होता वहाँ प्रतीकात्मक विजय प्राप्त करते। शिवाजी महाराज की रणनीति की खास बाते यदि देखें तो वो दुश्मन की घेराबंदी से रणनीतिक रूप से निकालने मे माहिर थे । युद्ध में हार की स्थिति को रणनीतिक तौर पर सफलता में बदल देते थे । खास तौर पर तेज़ हमला और तत्काल वापसी उनकी युद्ध नीति का मुख्य आयाम था। वे अपनी सेना और राजी की जनता का मनोबल बड़ा ऊंचा रखते थे। लड़ाई के दौरान दुश्मन कि हर हरकत, अपनी सेना की रणनीति और रसद प्रबंधन पर वे बड़ी बारीकी से निगाह रखते थे ।
सफलता की दूरगामी योजना
आज के दौर में सफलता के लिए हसनैन लिखते हैं कि जो देश लंबे तनाव के दौरान सामाजिक एकता, आर्थिक स्थिरता और जनता का भरोसा बनाए रख सकेंगे, दीर्घकालिक रणनीतिक बढ़त उन्हें ही मिलेगी। कमजोर प्रतिद्वंद्वी अब पूरी जीत नहीं, बल्कि टिके रहने, बाधा डालने और बने रहने की क्षमता हासिल करना चाह रहे हैं। भले ही वे युद्ध जीतने में सक्षम न हों, लेकिन उनके पास मजबूत प्रतिद्वंद्वियों की निर्णायक जीत को रोके रखने की अभूतपूर्व क्षमता है। अपने समय में शिवाजी महाराज इसी रणनीति पर आगे बढ़ते रहे इसलिए उन्हें दीर्घकालिक सफलता भी मिली। जिस मुगल साम्राज्य को समाप्त करने के बारे में कोई सोचना तो दूर कल्पना भी नहीं करता था उसे शिवाजी महाराज ने अपनी कुशल रणनीति और कूटनीति से तबाह किया।
हर संसाधन को युद्ध का हथियार बनाया
जिस तरह शिवाजी महाराज ने अस्त्र –शस्त्र और किलों के अलावा भौगोलिक स्थिति को,पहाड़ों,जंगलों,नदियों, मौसम,सुदूर गांवों मे रहने वाली प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़कर यानि उस समय जो भी संसाधन मिला जिसे भी जरूरी समझा उसे अपने युद्ध तंत्र का माध्यम बनाया और हमारे सामने एक अप्रतिम नमूना प्रस्तुत किया। ठीक उसी तरह अब आज के दौर में युद्ध केवल सेना और सीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बुनियादी ढांचा, संचार प्रणाली, एनर्जी ग्रिड, वित्तीय नेटवर्क और आम धारणा या विमर्श ये सब युद्धक्षेत्र की जद में आ चुके हैं।
महाराज की रणनीति के सबक
शिवाजी महाराज की रणनीति के खास सबक ये है कि युद्ध संख्या से नहीं, निर्णय से जीता जाता है, भूगोल सबसे बड़ा हथियार हो सकता है, मनोबल तकनीक से ज्यादा महत्वपूर्ण है, आर्थिक केंद्र पर हमला जीत के लिए निर्णायक हो सकता है । आज भी शिवाजी महाराज और उनके तौर तरीके हमारे सुरक्षा बलों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं और कल भी बने रहेंगे। इसलिए भारत की नौसेना ने छत्रपति शिवाजी महाराज को आदरांजलि देने के लिए अपने ध्वज पर उनकी अष्टकोणी मुद्रा को अंकित किया हैं।