‘हम भारत के लोग’ पुस्तक का विमोचन, भारतीयता और जड़ों से जुड़ाव पर जोर
इंद्रेश कुमार बोले—भारतीयता केवल भारत के लिए नहीं, विश्व के लिए है; ताहिर ने कहा—पूर्वजों और देश से जुड़ाव जरूरी
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चंद्रशेखर
September 16, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
जयपुर। मालवीय नगर स्थित पाथेय भवन में बुधवार को लेखक याजवेन्द्र यादव की पुस्तक ‘हम भारत के लोग’ का विमोचन हुआ। पुस्तक की प्रस्तावना इंदुशेखर तत्पुरुष ने रखी। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय टोली सदस्य इंद्रेश कुमार, मुख्य अतिथि, धर्म जागरण समन्वय के अखिल भारतीय विधि प्रमुख राम प्रसाद, ‘आओ जड़ों से जुड़ो’ अभियान के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. ताहिर, सरदार जसबीर सिंह सहित कई विद्वान और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
भारतीयता को विश्व के लिए प्रतिमान बनाने की चुनौती
इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि भारतीयता केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के लिए भी एक प्रतिमान है। उन्होंने कहा कि भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने से भिन्न और विपरीत विचार रखने वालों को किस प्रकार समझता और समाहित करता है। पुस्तक में इसी भारतीय मॉडल को सामने रखने का प्रयास किया गया है।
उन्होंने बताया कि पुस्तक में 14 अध्याय हैं, जिनमें भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार, वेद-सनातन भाषा एवं संस्कृति चेतना, अखंड भारत में इस्लामिक कन्वर्जन, धर्मांतरण के बाद मूल से जुड़ाव, मेवात, शुद्धिकरण और घर-वापसी जैसे विषयों पर चर्चा की गई है। उन्होंने पुस्तक को तथ्य और प्रमाण आधारित बताते हुए इसे ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ की अवधारणा से जोड़ा।
‘पूर्वज और संस्कृति नहीं बदलते’
‘आओ जड़ों से जुड़ो’ अभियान के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. ताहिर ने कहा कि भारत में धर्मांतरण के इतिहास पर काफी सामग्री उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है, इस पर भी समाज को विचार करना चाहिए। उन्होंने मेवात का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मांतरण के बावजूद अनेक लोग आज भी अपनी गोत्र, पाल और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़े हुए हैं।
ताहिर ने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि मुसलमान होते हुए भी उनके दादा का नाम शमशेर सिंह और पिता के बड़े भाइयों के नाम चांद सिंह व धन सिंह थे। उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य किसी की धार्मिक पहचान बदलना नहीं, बल्कि लोगों को अपनी जड़ों और पूर्वजों से जोड़ना है। उन्होंने कहा, “आप मुसलमान रहिए, इससे फर्क नहीं पड़ता; लेकिन यह न भूलें कि हम भारतीय हैं और देश के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।”
उन्होंने राष्ट्र को सर्वोपरि बताते हुए लोगों से देश के लिए जीने और देश के लिए योगदान देने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
राम प्रसाद बोले—वंशावली से सामने आए पूर्वजों का इतिहास
मुख्य अतिथि राम प्रसाद ने पुस्तक को भारत की संवेदनशील समस्या के विश्लेषण और समाधान की दिशा में प्रयास बताया। उन्होंने विभाजन, धर्मांतरण और भारतीय मुसलमानों की वंशावली से जुड़े विषयों पर विचार रखे।
मेवात का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वंशावली लेखकों के माध्यम से लोगों को अपने पूर्वजों, जाति और गोत्र की जानकारी मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को विदेशी आक्रांताओं के बजाय अपने भारतीय पूर्वजों और स्थानीय इतिहास से अपने संबंध को समझना चाहिए।
उन्होंने इतिहास लेखन और पाठ्यक्रम में विभिन्न ऐतिहासिक पात्रों एवं घटनाओं को नए सिरे से देखने की आवश्यकता की बात कही। उन्होंने बताया कि ‘वंशावली संरक्षण संवर्धन संस्थान’ इसी दिशा में काम कर रहा है।
इंद्रेश कुमार बोले—भारतीयता केवल धार्मिक पहचान नहीं
मुख्य वक्ता इंद्रेश कुमार ने कहा कि ‘हम भारत के लोग’ की भावना को केवल 1947 के संविधान और उसकी प्रस्तावना से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत की सभ्यता और संस्कृति में समाज को जोड़ने वाली यह भावना बहुत पुरानी है।
उन्होंने कहा कि भारत ने मानवता को भाई-बहन के रिश्ते की अवधारणा दी। यदि घर से लेकर समाज, देश और दुनिया तक इसी भावना को विकसित किया जाए तो अनेक विवाद समाप्त हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसकी सभ्यता, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से भी जुड़ी है।
राम-रावण, कृष्ण-कंस और हुसैन-यजीद के उदाहरण देते हुए इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारतीय चिंतन में शक्ति से अधिक सत्य, न्याय और जीवन-मूल्यों को महत्व दिया गया है। उन्होंने शिक्षा में संस्कार को आवश्यक बताते हुए कहा कि केवल तकनीकी शिक्षा व्यक्ति को पूर्ण मनुष्य नहीं बनाती। बच्चों और युवाओं में मानवीय मूल्यों तथा सामाजिक जिम्मेदारी का भाव विकसित करना भी आवश्यक है।
उन्होंने भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रभाव और विभिन्न देशों में भारतीय परंपराओं की मौजूदगी का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने धार्मिक पहचान के साथ राष्ट्रीय पहचान को भी महत्व देने की बात कही।
इंद्रेश कुमार ने कहा कि व्यक्ति की पूजा-पद्धति या धार्मिक परंपरा अलग हो सकती है, लेकिन देश के प्रति जिम्मेदारी और भारतीय होने की भावना सभी को जोड़ सकती है। उन्होंने कहा, “हम भारत के भारतीय हैं, हिंदुस्तान के हिंदुस्तानी हैं।”
उन्होंने भारतीयता को व्यापक मानवीय दृष्टि से जोड़ते हुए कहा कि भारत की संस्कृति का मूल भाव विविधताओं के बीच साथ रहने और समाज को जोड़ने का है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता ऐसी भारतीयता को समझने की है जो अपनी जड़ों से जुड़ी होने के साथ-साथ विश्व के प्रति भी जिम्मेदारी का भाव रखती हो।
सरदार जसबीर ने गिनाई भारत की ज्ञान और सांस्कृतिक परंपरा
सरदार जसबीर जी ने अपने वक्तव्य में भारत की प्राचीन सभ्यता, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को विस्तार से सामने रखा। जसबीर जी ने भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे शिक्षा केंद्रों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी इन केंद्रों पर ज्ञान प्राप्त करने आते थे।
उन्होंने दुनिया की प्रमुख धार्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन, जैन, बौद्ध और सिख परंपराओं की जन्मभूमि भारत रही है, भारत की सांस्कृतिक परंपरा ने विभिन्न विचारों और मतों को अपने भीतर स्थान दिया।
उन्होंने चार्वाक और संत कबीर के उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय समाज में वैचारिक असहमति और आलोचना के लिए भी स्थान रहा है। उनके अनुसार चार्वाक के भिन्न विचारों के बावजूद उन्हें भारतीय दार्शनिक परंपरा में स्थान मिला और कबीर ने सामाजिक कुरीतियों तथा धार्मिक पाखंड पर कठोर प्रश्न उठाए, फिर भी उनके दोहे आज सम्मान के साथ पढ़े और सुनाए जाते हैं।
जसबीर जी ने कहा कि देश में अलग-अलग धार्मिक और उपासना परंपराएं हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय पहचान सभी को जोड़ने वाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि “हम भारत के लोग” केवल संविधान की प्रस्तावना के शब्द नहीं, बल्कि भारत की दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा और सामूहिक चेतना से जुड़े विचार हैं।