हिंदी : भारत के बढ़ते सामर्थ्य की भाषा
अग्नि से आकाश तक, तेजस से अरिहंत और मेघदूत से सिंदूर तक— आधुनिक भारत की उपलब्धियों में दीप्त होती अपनी भाषा
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कमलेश कमल
September 15, 2026
लेख › समसामयिक
किसी भाषा की प्रतिष्ठा तब अपने उत्कर्ष पर पहुँचती है, जब उसके शब्दों को संसार तक पहुँचाने के लिए अनुवाद के बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती। राष्ट्र अपनी उपलब्धियों को अपने शब्द देता है और संसार उन्हीं शब्दों में उन्हें पहचानने लगता है। उदाहरण के लिए― भारत ने चंद्रमा की सतह को छुआ तो दुनिया ने उस चंद्र-अन्वेषण मिशन(अभियान) को भारत के दिए नाम से जाना— ‘चंद्रयान’। यह छोटी-सी भाषिक-परिघटना अपने भीतर बड़ा संकेत रखती है। विज्ञान भारत का था, उपलब्धि भारत की थी और उसकी वैश्विक-पहचान का शब्द भी हमारी हिंदीभाषा का था।
आज भारत की रक्षा और वैज्ञानिक शब्दावली पर दृष्टि डालें तो हिंदी का समृद्ध शब्द-संसार दिखाई देता है— अग्नि, पृथ्वी, आकाश, अस्त्र, तेजस, ध्रुव, नेत्र, रुद्रम, प्रहार, प्रलय, शौर्य, वरुणास्त्र, अरिहंत, विक्रम, प्रज्ञान…इत्यादि। इसी तरह, सैन्य अभियानों में विजय, पवन, रक्षक, मेघदूत और सिंदूर जैसे भारतीय संस्कृति से जुड़े नाम हैं। ये शब्द बताते हैं कि हिंदी की शब्द-शक्ति साहित्य सर्जना के साथ-साथ आधुनिक भारत की शक्ति, विज्ञान, संकल्प और स्वाभिमान को भी अभिव्यक्ति देती है।
‘चंद्रयान’ की रचना अत्यंत सहज है—चंद्र + यान। ‘यान’ संस्कृत की ‘या’ धातु से निष्पन्न (या भावे ल्युट्) है, जिसका मूल भाव है— जाना, गति करना। इस प्रकार नाम स्वयं अपना अर्थ खोल देता है— चंद्र की ओर जाने वाला यान। चंद्रयान-3 के अवतरण-यान (लैंडर) ‘विक्रम’ और विचरण-यान (रोवर) ‘प्रज्ञान’ के नाम भी उतने ही अर्थवान् हैं। ‘विक्रम’ के मूल में ‘क्रम्’ है, जिसका अर्थ है– पग बढ़ाना, आगे जाना। इस प्रकार विक्रम का अर्थ है– विशेष रूप से कदम बढ़ाना, शौर्य, पराक्रम, इत्यादि। ‘प्रज्ञान’ में विशेष ज्ञान अर्थात् विशेष रूप से जानने का भाव है। वैज्ञानिक अभियान के तीन चरण मानो तीन शब्दों में सिमट गए—यात्रा, अग्रगमन और ज्ञान। यही हमारी शब्द-परंपरा का सामर्थ्य है— कम अक्षरों में व्यापक आशय।
अग्नि, पृथ्वी, आकाश : शब्दों का नया अर्थाकाश।
अग्नि, पृथ्वी और आकाश भारतीय भाषिक-चेतना के अत्यंत प्राचीन शब्द हैं। वैदिक ऋचाओं की ‘अग्नि’ आज आधुनिक प्रक्षेपास्त्र-शृंखला की पहचान है। ‘पृथ्’ धातु में फैलाव या विस्तार है। देश की सामरिक प्रक्षेपास्त्र-शृंखला का जब ‘पृथ्वी’ रखा जाता है; तब इसका आधार इसमें निहित ‘पृथ्’ धातु को बनाया जाता है, जिसका अर्थ– ‘विस्तार’ अथवा फैलाव होता है।
वस्तुतः, भारतीय रक्षा-परिरक्षा परिदृश्य को ध्यान से देखें, तो भाषायी अस्मिताबोध से संपृक्त एक अनवरत शृंखला दिखाई देती है। हम देखते हैं कि अनंत नभ का ‘आकाश’ आधुनिक ‘सतह-से-वायु प्रक्षेपास्त्र प्रणाली’ से जुड़ चुका है, जिसमें ‘काश्’ का मूल अर्थ ‘चमकना’ भी शामिल है। यहाँ भाषा की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया दिखाई देती है—अर्थ-विस्तार। इसके अंतर्गत कोई शब्द अपनी मूल स्मृति खोए बिना नए युग का अर्थ ग्रहण करता है। रेखांकित करने योग्य तथ्य है कि यही सामर्थ्य भाषा को नए युग के अनुरूप अर्थ ग्रहण करने में सक्षम बनाता है।
ध्यातव्य है कि सहस्राब्दियों पुराने शब्दों का अत्याधुनिक विज्ञान में सहज प्रतिष्ठित होना हिंदी की शब्द-संपदा की कालजयी क्षमता का प्रमाण है। भारतीय परंपरा में अस्त्र और शस्त्र के प्रयोग में सूक्ष्म अंतर मिलता है। ‘शस्त्र’ हाथ में धारण कर प्रयुक्त किए जाने वाले आयुध के लिए अधिक रूढ हुआ, जबकि ‘अस्त्र’ में छोड़ने अथवा प्रक्षेपित करने का भाव प्रमुख रहा। इस प्रकार, आधुनिक वायु-से-वायु प्रक्षेपास्त्र का नाम अस्त्र होना भाषिक-दृष्टि से भी सार्थक है।
इसी कड़ी में प्रहार, प्रलय, शौर्य और रुद्रम इत्यादि शब्द हैं; जिन्हें सुनते ही क्रमशः आघात, व्यापक विनाश, वीरता और प्रचंडता के अर्थ जाग्रत होते हैं। नाम यहाँ किसी शब्द का परिचय-पट्ट नहीं; वरन् उसके स्वभाव का भाषिक-संकेत बन जाता है।
तेजस, ध्रुव और नेत्र : शब्द स्वयं बोलते हैं।
भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान के नाम में ही उसकी प्रकृति का बिंब उपस्थित है। तेजस संस्कृत ‘तेजस्’ से है— दीप्ति, ऊर्जा, ओज, प्रभाव और सामर्थ्य।
ध्रुव के मूल में ‘ध्रु’ है, जो स्थिर होने, दृढ़ होने का अर्थ देता है। भारतीय स्मृति में ध्रुवतारा अटलता और दिशा का प्रतीक है; आकाश से जुड़ा वही प्राचीन शब्द आधुनिक हेलीकॉप्टर को पहचान देता है। ‘नेत्र’– हवाई जगत् में पूर्व-चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली के लिए ऐसा नाम, जिसे सुनते ही उसका पूरा कार्य-व्यापार समझ में आ जाए।
विचारणीय है कि आधुनिकता के लिए दुरूह शब्दावली अनिवार्य नहीं। समर्थ भाषा जटिलतम प्रौद्योगिकी को भी सहज और अर्थवान् नाम दे सकती है। उदाहरण के लिए― रोहिणी, अश्लेषा और भरणी भारतीय नक्षत्र-परंपरा के नाम हैं। आधुनिक भारत में यही नाम रडार प्रणालियों से भी जुड़े हैं। इसमें एक विलक्षण सांस्कृतिक-नैरंतर्य दिखता है। कभी मनुष्य ने जिन नामों से आकाश को पहचाना था, आज उन्हीं नामों से आकाश पर दृष्टि रखने वाली तकनीक पहचानी जाती है। सभ्यता की स्मृति और आधुनिक विज्ञान का यह साहचर्य भाषा को कालखंडों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति बना देता है।
वरुणास्त्र और अरिहंत : शब्दों में समुद्र की शक्ति।
पनडुब्बी-रोधी भारी टॉरपीडो ‘वरुणास्त्र’ में ‘वरुण’ और ‘अस्त्र’ का संयोग अपने अर्थ का उद्घाटन स्वयं करता है। भारतीय परंपरा में वरुण का संबंध जल से है; अतः समुद्री आयुध के लिए यह नाम भाषिक-दृष्टि से सहज अर्थवान् है।
स्वदेशी परमाणु-चालित सामरिक पनडुब्बी ‘अरिहंत’ की संरचना और भी अर्थगर्भित है—‘अरि’ अर्थात् शत्रु और ‘हन्’ अर्थात् नष्ट करना। भारतीय दार्शनिक परंपरा में यह शब्द अंतःशत्रुओं पर विजय के आध्यात्मिक अर्थ से भी युक्त है। यह सुखद है कि आज सामरिक क्षेत्र में वही शब्द एक नया अर्थ-क्षितिज प्राप्त करता है। इस संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि किसी समर्थ शब्द की आयु एक युग से निर्धारित नहीं होती।
मेघदूत : कविता का शब्द, पराक्रम का अध्याय।
सैन्य अभियानों में विजय, पवन, रक्षक और मेघदूत जैसे नाम भारतीय भाषा की अलग छटा सामने रखते हैं। इनमें ‘मेघदूत’ विशेष है। कालिदास के काव्य में विरही यक्ष का संदेशवाहक बना मेघ जिस अमर कृति का नाम है, वही शब्द आधुनिक भारतीय सैन्य इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण अभियान की संज्ञा से अभिहित हुआ।
कालिदास से हिमशिखरों तक ‘मेघदूत’ की यात्रा बताती है कि महनीय भाषा के शब्द किसी एक अर्थ-कोष्ठ में बंद नहीं रहते। साहित्य उन्हें संवेदना देता है; समय नए संदर्भ देता चलता है।
सिंदूर : जहाँ शब्द के पीछे पूरा संस्कार खड़ा हो।
आधुनिक सैन्य नामकरण में सिंदूर की अर्थ-व्याप्ति सर्वथा अलग है। ‘सिन्दूर’ भारतीय जीवन में विवाह, सौभाग्य और सुहाग से जुड़ा शब्द है। पहलगाम के आतंकी हमले में परिवार उजड़े और महिलाओं के सुहाग छिने। उसके बाद आतंक के विरुद्ध भारतीय सैन्य कार्रवाई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम मिला तो एक परिचित शब्द में निजी वेदना, सामाजिक संवेदना और राष्ट्रीय प्रत्युत्तर एक साथ ध्वनित हुए। इस नाम का अर्थ देश को समझाना नहीं पड़ा। यही सांस्कृतिक शब्द की शक्ति है। कोश उसका अर्थ कुछ पंक्तियों में बता सकता है, किंतु समाज उसमें सदियों का अनुभव संचित करता है। ‘सिंदूर’ के साथ वही संचित भारतीय भावबोध विश्व के समाचार और सामरिक विमर्श तक पहुँचा।
विचारणीय है कि नामकरण भी सांस्कृतिक संप्रभुता है। मनुष्य जिसे खोजता, रचता या निर्मित करता है, उसे अपनी भाषा में पहचान भी देता है। राष्ट्रों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरा अर्थ ग्रहण करती है। अपनी अत्याधुनिक वैज्ञानिक और सामरिक उपलब्धियों के नाम अपनी भाषिक-सांस्कृतिक निधि से चुनना सभ्यतागत आत्मविश्वास का सूचक है। प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर राष्ट्र जब अपनी उपलब्धियों के नाम भी स्वयं गढ़ता है, तो वह केवल वस्तु का निर्माण नहीं करता; उसके बारे में संसार किस शब्द से बात करेगा, यह भी निर्धारित करता है।
हिंदी : शब्दकोश से शक्ति-कोश तक।
हिंदी की महिमा का आकलन केवल उसके बोलने वालों की संख्या, साहित्य की विशालता अथवा भौगोलिक विस्तार से पूरा नहीं होगा। एक आधुनिक भाषा की प्रतिष्ठा इस बात से भी बनती है कि वह अपने समय के ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और राष्ट्रीय आकांक्षाओं को कितनी समर्थ अभिव्यक्ति देती है।
हिंदी के पास संस्कृत से प्राप्त विशाल शब्द-संपदा है; लोकभाषाओं से अर्जित जीवंतता है; दूसरी भाषाओं को आत्मसात करने की उदारता और नए अर्थ गढ़ने की क्षमता भी है। पुराने शब्द आधुनिक संदर्भों में उतरते हैं तो भाषा का अर्थ-भूगोल विस्तृत होता है। इसलिए हिंदी के सामने चुनौती शब्दों के दारिद्र्य की नहीं, अपितु अपने शब्द-सामर्थ्य पर विश्वास की है। निश्चित ही, हिंदी दिवस का गौरव इसी विश्वास में निहित है।
महत्त्वपूर्ण यह भी कि जिस भाषा के शब्द वेदों से विज्ञान तक, कालिदास से हिमशिखरों तक, नक्षत्रों से निगरानी-तंत्र तक, धरती से अंतरिक्ष तक और सामाजिक संस्कार से राष्ट्रीय संकल्प तक सहज यात्रा कर सकते हों, उसकी संभावनाओं का आकाश सीमित कैसे हो सकता है?
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आज का भारत अपनी शक्ति द्रुत गति से अर्जित कर रहा है और हिंदी उसकी अभिव्यक्ति का प्रखर माध्यम बन रही है।