शेखावाटी साहित्य संगम का शुभारंभ: राज्यपाल बागड़े बोले—साहित्य समाज की चेतना का संवाहक, शेखावाटी शौर्य और त्याग की धरती
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वीएसके डेस्क
October 09, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
सीकर, 9 अक्टूबर। राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि साहित्य समाज की संवेदनाओं, संस्कारों और सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्ति देता है। साहित्यिक आयोजन विचारों के आदान-प्रदान, ज्ञान के विस्तार और नए चिंतन को प्रोत्साहित करने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। साहित्य सृजन में अभिव्यक्ति के साथ संयम और मर्यादा का पालन भी आवश्यक है। राज्यपाल शुक्रवार को सीकर के सालासर रोड स्थित गोविंदम रिसॉर्ट में आयोजित शेखावाटी साहित्य संगम के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
श्री केशव संस्कृति प्रन्यास एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय ‘शेखावाटी साहित्य संगम’ का शुक्रवार को शुभारंभ हुआ। महोत्सव में भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रीय चेतना, शिक्षा, साहित्य और लोकसंस्कृति से जुड़े विविध विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
शौर्य, त्याग और उद्यमशीलता शेखावाटी की विशिष्ट पहचान
राज्यपाल बागड़े ने कहा कि शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की समृद्ध परंपराओं के लिए विख्यात है। राष्ट्ररक्षा के साथ शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में भी इस अंचल के लोगों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। यहां अनेक परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी सशस्त्र सेनाओं में सेवाएं दे रही है। क्षेत्र में स्थापित शहीद स्मारक शेखावाटी की गौरवशाली सैन्य परंपरा और मातृभूमि के प्रति समर्पण की याद दिलाते हैं।
राजस्थान की लोकसंस्कृति में निहित राष्ट्रप्रेम की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यहां बचपन से ही साहस, त्याग और मातृभूमि की रक्षा के संस्कार दिए जाते रहे हैं। उन्होंने राजस्थानी लोकसाहित्य की उन प्रसिद्ध पंक्तियों का उल्लेख किया, जिनमें माता अपनी संतान को पालने से ही मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रेरित करती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा का वैश्विक महत्व रेखांकित
भारतीय साहित्य और दर्शन की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा का प्रभाव विश्व के विभिन्न देशों तक पहुंचा है। रामायण, महाभारत और उपनिषद जैसे ग्रंथ आज भी देश-विदेश में अध्ययन और चिंतन के विषय हैं। उन्होंने वेदों के विदेशी भाषाओं में हुए अनुवाद तथा भारतीय साहित्य के प्रति विदेशी विद्वानों की रुचि की भी चर्चा की।
राज्यपाल ने गणित और विज्ञान के विकास में भारतीय मनीषियों के योगदान का उल्लेख करते हुए शून्य की अवधारणा को गणितीय ज्ञान के इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशन और प्रसार में गीता प्रेस, गोरखपुर तथा हनुमान प्रसाद पोद्दार के योगदान का भी स्मरण किया।
शिक्षा में बौद्धिक विकास के साथ नैतिकता और संस्कारों पर बल
शिक्षा व्यवस्था पर विचार व्यक्त करते हुए राज्यपाल ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था को भारतीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता थी। उन्होंने विद्यालयी शिक्षा में सुधार पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यार्थियों में बौद्धिक क्षमता के साथ नैतिकता, विवेक, व्यावहारिक समझ और संस्कारों का विकास भी आवश्यक है।
उन्होंने वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी प्राप्ति में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी महत्वपूर्ण है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक मूल्य राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
वंदे मातरम् और कश्मीर के ऐतिहासिक प्रसंगों की चर्चा
राज्यपाल बागड़े ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान दिए जाने संबंधी घोषणा का उल्लेख किया। उन्होंने राष्ट्रगीत के गायन को लेकर अतीत में हुए विरोध तथा कारावास से जुड़े प्रसंगों की भी चर्चा की।
कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और नियंत्रण रेखा से संबंधित ऐतिहासिक घटनाक्रम पर अपने विचार रखे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, अखंडता और मातृभूमि की रक्षा के महत्व को रेखांकित किया।
बाहरी सुरक्षा के लिए शस्त्र, आंतरिक सुरक्षा के लिए शास्त्र आवश्यक
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. अविनाश सिंह पंवार, निदेशक, सेंटर फॉर इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस (सीईजी), तकनीकी शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार, जयपुर एवं प्रख्यात सामाजिक विचारक
ने कहा कि राष्ट्र की बाहरी सुरक्षा के लिए शस्त्र आवश्यक हैं, जबकि आंतरिक सुरक्षा के लिए शास्त्रों का विशेष महत्व है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में ज्ञान और वैचारिक चेतना की भूमिका पर प्रकाश डाला।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. युद्धवीर सिंह ने की। उन्होंने विश्वविद्यालय में संचालित पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी दी।
समारोह में प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद्, साहित्यकार, जनप्रतिनिधि, विद्यार्थी और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। इस अवसर पर सीकर की स्केच कलाकार अपूर्वा ने राज्यपाल को उनका हस्तनिर्मित रेखाचित्र भेंट किया।
वैचारिक सत्रों में राष्ट्रीय विषयों और समकालीन चुनौतियों पर मंथन
साहित्य संगम के पहले दिन उद्घाटन समारोह के पश्चात जनसंख्या परिवर्तन, कश्मीर और वंदे मातरम् जैसे विषयों पर वैचारिक सत्र आयोजित हुए।
आयोजन मंडल की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, 10 अक्टूबर को जेन-जी, तकनीक तथा हल्दीघाटी के ऐतिहासिक संदर्भों से लेकर समकालीन वैश्विक चुनौतियों तक विभिन्न विषयों पर चर्चा होगी। महोत्सव के अंतिम दिन 11 अक्टूबर को संत रविदास के विचार, ज्ञान एवं तकनीक, रणभूमि से बोर्डरूम तक नेतृत्व के विभिन्न आयाम तथा साहित्य में भारत जैसे विषयों पर वैचारिक सत्र आयोजित किए जाएंगे।
सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में राजस्थानी परंपराओं की झलक
शेखावाटी साहित्य संगम के पहले दिन आयोजित साफा-पगड़ी बांधने और मेहंदी प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। साफा-पगड़ी प्रतियोगिता में लोकेन्द्र सिंह ने प्रथम, जसवन्त सिंह ने द्वितीय और माधु सिंह ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं, 50 से अधिक प्रतिभागियों की मेहंदी प्रतियोगिता में अंजना प्रथम, किरण द्वितीय और आकांक्षा जांगिड़ तृतीय स्थान पर रहीं। सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाण-पत्र तथा विजेताओं को स्मृति-चिह्न एवं सम्मान-पत्र प्रदान किए गए।
आयोजन के दूसरे दिन 10 अक्टूबर को राजस्थानी लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा प्रतियोगिताएं होंगी। वहीं, 11 अक्टूबर को चित्रकला, सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताओं के साथ महोत्सव का समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित होगा।
पुस्तक मेले में प्रतिष्ठित प्रकाशनों की पुस्तकें उपलब्ध
शेखावाटी साहित्य संगम के अंतर्गत आयोजित पुस्तक मेले में देश के प्रतिष्ठित प्रकाशनों की साहित्य, इतिहास, दर्शन, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तक मेले में पाठकों को विभिन्न विषयों की पुस्तकों से परिचित होने का अवसर मिल रहा है। विद्यार्थियों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों के लिए यह मेला विशेष आकर्षण का केंद्र है।
तीन दिवसीय शेखावाटी साहित्य संगम में साहित्यिक विमर्श, भारतीय ज्ञान परंपरा और लोकसंस्कृति को एक मंच पर लाया गया है। आयोजन में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और पाठकों की सहभागिता से विविध विषयों पर संवाद को प्रोत्साहन मिल रहा है।