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संत रविदास के बेगमपुरा से एआई तक, भविष्य के भारत पर मंथन

शेखावाटी साहित्य संगम के अंतिम दिन चार सत्रों में संत साहित्य, शिक्षा, इतिहास और राष्ट्रबोध पर चर्चा; राजस्थानी भाषा को व्यवहार में अपनाने पर जोर

By वीएसके डेस्क October 11, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
संत रविदास के बेगमपुरा से एआई तक, भविष्य के भारत पर मंथन
सीकर, 11 अक्टूबर। संत रविदास के बेगमपुरा की संकल्पना से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में शिक्षा की चुनौतियों तक, शेखावाटी साहित्य संगम के अंतिम दिन भविष्य के भारत से जुड़े विभिन्न विषयों पर मंथन हुआ। वक्ताओं ने संत रविदास के सामाजिक विचारों, भारतीय ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक नायकों के नेतृत्व गुणों और साहित्य में राष्ट्रबोध पर अपने विचार रखे। इस दौरान राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के साथ उसे घर-परिवार और व्यवहार में अपनाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया। सालासर रोड स्थित गोविंदम रिसॉर्ट में श्री केशव संस्कृति प्रन्यास और पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय साहित्य संगम का रविवार को समापन हुआ। अंतिम दिन चार सत्रों के साथ चित्रकला, सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं।
संत रविदास के बेगमपुरा से एआई तक, भविष्य के भारत पर मंथन

बेगमपुरा में समानता और निर्भय समाज की कल्पना

पहले सत्र 'संत रविदास जी की वर्तमान में प्रासंगिकता' में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने संत रविदास के सामाजिक चिंतन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बेगमपुरा की संकल्पना के माध्यम से समानता, सामाजिक समरसता और शोषण से मुक्त समाज के विचार को सामने रखा। चर्चा में ऐसे समाज की कल्पना को प्रमुखता दी गई, जहां किसी व्यक्ति को भय और भेदभाव का सामना न करना पड़े। वक्ताओं ने श्रम की प्रतिष्ठा, कर्मयोग और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ते हुए युवा पीढ़ी के लिए संत रविदास की शिक्षाओं की प्रासंगिकता बताई। सत्र का संचालन इंदुशेखर तत्पुरुष ने किया।
बेगमपुरा में समानता और निर्भय समाज की कल्पना

एआई के दौर में सोचने और निर्णय लेने की क्षमता जरूरी

दूसरे सत्र 'ज्ञान की विरासत और तकनीक की रफ्तार' में उच्च शिक्षा विभाग, अजमेर के अतिरिक्त निदेशक प्रो. अनिल दाधीच ने शिक्षा व्यवस्था में आ रहे बदलावों और तकनीक की भूमिका पर चर्चा की। सत्र में सवाल उठा कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से कुछ ही क्षणों में सवालों के जवाब मिल सकते हैं, तो विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, सवाल करने और सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित की जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में शिक्षा को रोजगार और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने पर भी विचार रखे गए। 'गुरुकुल से गूगल तक' की यात्रा का उल्लेख करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय, भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री की उपलब्धता, विद्यार्थियों की रुचि के अनुरूप शिक्षा तथा नवाचार और स्टार्टअप के अवसरों पर चर्चा हुई। सत्र का संचालन अमित झालानी ने किया।

इतिहास से सीखें नेतृत्व, निर्णय क्षमता और सामूहिकता

तीसरे सत्र 'रणभूमि से बोर्डरूम तक : ऐतिहासिक योद्धाओं का नेतृत्व और युवाओं के लिए प्रासंगिकता' में स्प्रिंग बोर्ड के इतिहास विषय विशेषज्ञ राजवीर सिंह चलकोई ने ऐतिहासिक नायकों के नेतृत्व गुणों पर विचार रखे। उन्होंने चर्चा के दौरान व्यक्तिगत साहस के साथ समाज के सहयोग, सामूहिक शक्ति, निर्णय क्षमता और विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करने की इच्छाशक्ति के महत्व को रेखांकित किया। रानी पद्मिनी से जुड़ी शौर्य और जौहर की ऐतिहासिक स्मृतियों के संदर्भ में स्वाभिमान, त्याग और सामूहिक शक्ति जैसे विषयों पर भी बात हुई। इतिहास के कम चर्चित नायकों के योगदान को सामने रखने के साथ ऐतिहासिक नेतृत्व और आधुनिक प्रबंधन के बीच संबंधों पर चर्चा की गई। कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, लोगों को साथ लेकर चलने और सामूहिक उत्तरदायित्व निभाने जैसे गुणों को युवाओं के लिए उपयोगी बताया गया।

'अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन भाषा के प्रति कर्तव्य भूल जाते हैं'

इसी सत्र में राजस्थानी भाषा की मान्यता के सवाल पर राजवीर सिंह चलकोई ने कहा कि भाषा के सम्मान के लिए उसे व्यवहार में अपनाना भी जरूरी है। उन्होंने श्रोताओं से सवाल किया कि जब घरों में और सार्वजनिक मंचों पर हिंदी या अंग्रेजी का अधिक प्रयोग किया जाता है, तो राजस्थानी को मान्यता दिलाने की मांग के साथ उसे बोलचाल में अपनाने के प्रयास भी होने चाहिए। चलकोई ने कहा कि आज अधिकारों की बात पहले और कर्तव्यों की बात बाद में होती है। नई पीढ़ी को इस प्रवृत्ति से बचाने की जरूरत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व पर जोर दिया। उनके अनुसार, बच्चे अपनी भाषा में अधिक सहजता से सीख और समझ सकते हैं। सत्र का संचालन दिवस कुमार ने किया।

साहित्य में भारत की पहचान और लेखकों का दायित्व

समापन सत्र 'साहित्य में भारत' में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलगुरु प्रो. कुमुद शर्मा ने भारतीय साहित्य में राष्ट्रबोध, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे। सत्र में साहित्य और समाज के संबंधों पर चर्चा हुई। भारतीय साहित्य में लोकजीवन, परंपराओं, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति के साथ भविष्य के भारत के निर्माण में लेखकों, कवियों और विचारकों की भूमिका पर भी विचार किया गया। वक्ताओं ने नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं, लोकसंस्कृति और साहित्यिक विरासत से जोड़े रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। सत्र का संचालन जयपुर की सुनीता जी ने किया।
साहित्य में भारत की पहचान और लेखकों का दायित्व

चित्रों में विकसित भारत, लोकगीतों और नृत्यों में राजस्थानी संस्कृति

साहित्य संगम के तीसरे दिन चित्रकला, पोस्टर, सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा दिखाई। विद्यालय और महाविद्यालय स्तर की चित्रकला प्रतियोगिता में 'विकसित भारत-2047' तथा 'शेखावाटी की कला एवं संस्कृति' विषयों पर चित्र बनाए गए। स्कूल, कॉलेज और ओपन श्रेणी में आयोजित सामूहिक लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रतियोगिताओं में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। प्रत्येक समूह को प्रस्तुति के लिए पांच मिनट का समय दिया गया। साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, इतिहास और समकालीन तकनीकी चुनौतियों पर केंद्रित तीन दिवसीय शेखावाटी साहित्य संगम का इन कार्यक्रमों के साथ समापन हुआ।

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