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आदर्श राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज का अच्छा होना प्राथमिक शर्त – डॉ. मोहन भागवत

"कानून से अधिक जनजागृति आवश्यक, समाज को गौभक्त बनाएं तो स्वतः रुक जाएगी गौ-हत्या"

By चंद्रशेखर April 07, 2026
समाचार › देश-विशेष
आदर्श राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज का अच्छा होना प्राथमिक शर्त – डॉ. मोहन भागवत
वृन्दावन (मथुरा), 07 अप्रैल 2026। संत श्रीमद्जगद्गुरू द्वाराचार्य श्रीमलूकदास महाराज की 452वीं जयंती के अवसर पर आयोजित संत सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि एक सशक्त और आदर्श राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज का अच्छा होना प्राथमिक शर्त है। उन्होंने धर्म, प्रजातंत्र, गौ-रक्षा और भारत की वैश्विक भूमिका पर गहन विचार रखे। उपस्थित संत-महंतों, माताओं-बहनों और प्रबुद्ध नागरिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने संतों की महिमा का बखान किया। उन्होंने कहा कि संतों का स्वभाव पर्वत के समान होता है, जो दूसरों के छोटे से भी सद्गुण को विशाल बनाकर प्रस्तुत करते हैं। प्रजातंत्र और समाज के चरित्र पर उन्होंने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अच्छे लोगों का आगे आना नितांत आवश्यक है। उन्होंने कहा, "अपना प्रजातंत्र है, इसलिए इसमें अच्छे लोग आने चाहिए। जब मैं 'अच्छे लोग' कहता हूँ, तब किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष की ओर निर्देश नहीं करता; बल्कि जो वास्तव में अच्छा है, मैं उसकी बात करता हूँ, क्योंकि जो अच्छा है, वह हमेशा अच्छा ही करेगा।" उन्होंने कहा कि व्यवस्था में किसी अच्छे व्यक्ति के पहुँचने से पहले, आम लोगों का अच्छा होना जरूरी है। "चूँकि यह एक प्रातिनिधिक प्रजातंत्र है, जहाँ हम अपने प्रतिनिधि खुद चुनकर भेजते हैं। इसलिए यदि हम स्वयं बुरे बने रहेंगे, तो हमारे प्रतिनिधि भी बुरे ही होंगे।" उन्होंने कहा कि हम खुद जितना अच्छा बनेंगे, उतने ही अच्छे लोगों को वहाँ (शीर्ष पर) पहुँचने से फिर कोई नहीं रोक सकता। गौ-रक्षा और जन-जागृति गौ-रक्षा और समाज में जन-जागृति की आवश्यकता पर उन्होंने कहा कि केवल व्यवस्था या कानून बना देने से समस्याएं हल नहीं होतीं। जैसे "लाल बत्ती तभी काम करती है, जब लोग उसे मानते हैं। असली सामर्थ्य व्यवस्था में नहीं, बल्कि समाज में है।" उन्होंने कहा, "सत्ता में बैठे लोगों के मन में गौ-रक्षा की इच्छा है, लेकिन किसी भी साहसी कदम को उठाने से पहले समाज में इसके प्रति एक व्यापक विचार होना चाहिए।" उन्होंने स्पष्ट किया कि असली कार्य जनजागृति का है। यदि जनभावना मजबूती से खड़ी हो जाए, तो व्यवस्था को उसे मानना ही पड़ता है। "समाज को आप गौभक्त बना दीजिए, गौ-हत्या अपने आप रुक जाएगी।" वर्तमान वैज्ञानिक युग में गौ-माता के प्रति दृष्टिकोण पर सरसंघचालक ने कहा कि हमें केवल 'गाय हमारी माता है' की श्रद्धा तक ही सीमित नहीं रहना है, बल्कि विज्ञान के आधार पर भी इसकी महत्ता को स्थापित करना है। आज के तथाकथित विज्ञान युग में हमें लोगों को यह सिखाना और प्रशिक्षित करना होगा कि हमारी देशी गाय भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए कितनी फायदेमंद है। उन्होंने गाय के दूध के औषधीय गुणों, पंचगव्य के फायदों और कृषि क्षेत्र में इसके लाभों को जन-जन तक पहुँचाने और लोगों को प्रशिक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब हम इन वैज्ञानिक तथ्यों के साथ समाज में जागरूकता बढ़ाएंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब गौ-रक्षा पूरे भारतवर्ष की सामूहिक इच्छा बन जाएगी और वह संकल्प तत्क्षण पूर्ण होगा।
आदर्श राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज का अच्छा होना प्राथमिक शर्त – डॉ. मोहन भागवत

गौ-रक्षा और जन-जागृति

गौ-रक्षा और समाज में जन-जागृति की आवश्यकता पर उन्होंने कहा कि केवल व्यवस्था या कानून बना देने से समस्याएं हल नहीं होतीं। जैसे "लाल बत्ती तभी काम करती है, जब लोग उसे मानते हैं। असली सामर्थ्य व्यवस्था में नहीं, बल्कि समाज में है।" उन्होंने कहा, "सत्ता में बैठे लोगों के मन में गौ-रक्षा की इच्छा है, लेकिन किसी भी साहसी कदम को उठाने से पहले समाज में इसके प्रति एक व्यापक विचार होना चाहिए।" उन्होंने स्पष्ट किया कि असली कार्य जनजागृति का है। यदि जनभावना मजबूती से खड़ी हो जाए, तो व्यवस्था को उसे मानना ही पड़ता है। "समाज को आप गौभक्त बना दीजिए, गौ-हत्या अपने आप रुक जाएगी।" वर्तमान वैज्ञानिक युग में गौ-माता के प्रति दृष्टिकोण पर सरसंघचालक ने कहा कि हमें केवल 'गाय हमारी माता है' की श्रद्धा तक ही सीमित नहीं रहना है, बल्कि विज्ञान के आधार पर भी इसकी महत्ता को स्थापित करना है। आज के तथाकथित विज्ञान युग में हमें लोगों को यह सिखाना और प्रशिक्षित करना होगा कि हमारी देशी गाय भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए कितनी फायदेमंद है। उन्होंने गाय के दूध के औषधीय गुणों, पंचगव्य के फायदों और कृषि क्षेत्र में इसके लाभों को जन-जन तक पहुँचाने और लोगों को प्रशिक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब हम इन वैज्ञानिक तथ्यों के साथ समाज में जागरूकता बढ़ाएंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब गौ-रक्षा पूरे भारतवर्ष की सामूहिक इच्छा बन जाएगी और वह संकल्प तत्क्षण पूर्ण होगा।

धर्म और करुणा

उन्होंने कहा कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने भीतर के अहंकार को मारना होगा। धर्म की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा, "धर्म के चार पैर होते हैं - सत्य, करुणा, शुचिता (पवित्रता) और तपस। इनमें करुणा सबसे अनिवार्य है, क्योंकि बिना करुणा के धर्म की कल्पना ही नहीं की जा सकती।" धर्म का उद्भव ही इस विचार से हुआ है कि यह सृष्टि निरंतर चलती रहे। उन्होंने कहा, "सृष्टि चलती रहे, इसलिए हम सबको मिल-जुलकर रहना चाहिए। यही धर्म का मूल स्वभाव है।" उन्होंने कहा कि जब मनुष्य का जीवन पवित्र (शुचितापूर्ण) और अहंकार से पूरी तरह मुक्त हो जाता है, तभी उसके भीतर सच्ची करुणा जन्म लेती है। श्रोताओं को स्वार्थ से परमार्थ की ओर ले जाने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा, "जब हम अहंकार छोड़ते हैं, तो सहज ही हम 'मैं और मेरा' की जगह 'मैं नहीं, तुम ही' के भाव में चले जाते हैं। और जब यह अवस्था आ जाती है, तो फिर इस संसार में सबका दुख, हमारा अपना दुख बन जाता है।"
धर्म और करुणा

भारतवर्ष का विश्व-गुरु स्वरूप

उन्होंने कहा, "भारतवर्ष ही इस विश्व की आत्मा है। भारतवर्ष रहेगा, तभी यह विश्व बचेगा। जब भारतवर्ष अपने पूर्ण वैभव के साथ खड़ा होगा, तभी पूरे विश्व में पूर्ण वैभव और सुख-शांति आएगी।" उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतवर्ष अपने आध्यात्मिक प्रकाश से पूरी दुनिया को आलोकित करे क्योंकि अब समय आ गया है कि भारतवर्ष एक विश्व गुरु देश के नाते फिर से खड़ा होकर दुनिया को एक नई सुखी सुंदर दुनिया बनाएगा, ये मेरा विश्वास है। उसके लिए संघ भी काम करता है, संत भी काम करते हैं।

संतों का सानिध्य और हमारा कर्तव्य

संत समाज को आश्वस्त करते हुए उन्होंने कहा, "संत लोग बेखौफ होकर अपना काम करेंगे, और एक रक्षक के रूप में 'डंडा लेकर' हम उनके दरवाजे पर मुस्तैद खड़े रहेंगे। यह हमारी ड्यूटी (कर्तव्य) है और हम इसे पूरी निष्ठा के साथ सदा निभाते रहेंगे।"

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