Breaking News
VSK Foundation Jaipur Logo - विश्व संवाद केंद्र जयपुर
विश्व संवाद केंद्र, जयपुर ( VSK Foundation Jaipur )

जलमग्न धरा के संकट-हर्ता है भगवान वराह, उनका संदेश हम सभी के लिए विशेष है!

By डॉ. मयंक चतुर्वेदी September 14, 2026
लेख › समसामयिक
जलमग्न धरा के संकट-हर्ता है भगवान वराह, उनका संदेश हम सभी के लिए विशेष है!
सनातन धर्म की अवतार परंपरा में भगवान वराह का प्राकट्य संपूर्ण ब्रह्मांडीय चेतना के उत्कर्ष और संतुलन की युगांतकारी घटना है। वस्‍तुत: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला वराह प्राकट्योत्सव मानव सभ्यता को संकटों से उबरने का शाश्वत संदेश देता है। इसका पूरा संदर्भ देखें तो जब महाबली असुर हिरण्याक्ष का आतंक अपनी चरम सीमा पर था और वह सोने (भौतिक संपदा) के अंतहीन लालच में पूरी पृथ्वी (माता भूदेवी) को चुराकर महासागर के अगाध अंधकार (रसातल) में ले गया, तब सृष्टि का आधार ही संकट में पड़ गया। ऐसे प्रलयंकारी समय में, जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी की नासिका से आधे पुरुष और आधे महाबली वन्य जीव (वराह) के रूप में अवतार लिया। उन्होंने उस अत्याचारी असुर का वध किया और अथाह जलराशि को चीरते हुए धरती को अपने दांतों पर उठाकर सुरक्षित स्थापित किया।

शास्त्रीय साक्ष्य और पौराणिक प्राकट्य का दर्शन

भगवान वराह की प्रामाणिकता का वर्णन हमें सबसे पहले इसके मूल बीज संसार के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में भी मिलते हैं। कृष्णा यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रारंभ में जब चारों ओर सिर्फ जल ही जल था, तब प्रजापति ने वराह रूप धारण कर जल में प्रवेश किया और पृथ्वी को नीचे से ऊपर उठाकर स्थापित किया। श्रीमद्भागवत महापुराण (तृतीय स्कंध, अध्याय 13, श्लोक 30) में उनके समुद्र से बाहर आने के अलौकिक दृश्य का वर्णन करते हुए ऋषियों ने स्तुति की है-

“उत्थाय सादौ रसातलात्मजां, बिभ्रत्स्वदंष्ट्राग्रकुलाचलेन्द्रवत्। बभौ तदा नीलघनो महानदी-प्रवाहविच्छिन्न इवाद्रिरुच्चकैः॥”

इसका अर्थ है कि जब भगवान वराह पृथ्वी माता को अपने दांतों की नोक पर उठाकर ऊपर आए, तो वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कोई विशाल नीला पहाड़ किसी महानदी के तीव्र प्रवाह को चीरकर गर्व से ऊपर खड़ा हो गया हो। 12वीं शताब्दी के महान कवि जयदेव ने भी अपने दशावतार स्तोत्र में लिखा है कि भगवान के तीक्ष्ण दांतों के अग्रभाग पर यह विशाल पृथ्वी इस प्रकार टिकी हुई थी, मानो पूर्णिमा के उज्ज्वल चंद्रमा के भीतर उसका छोटा सा प्राकृतिक धब्बा समाया हुआ हो।

आध्यात्मिक संदर्भ: अज्ञान के दलदल से चेतना का ऊर्ध्वगमन

वस्‍तुत: आध्यात्मिक और सूक्ष्म दृष्टिकोण से, भगवान वराह की यह कथा प्रत्येक मनुष्य की आंतरिक यात्रा की व्याख्या करती है। इस दर्शन में पृथ्वी 'आत्मा या शुद्ध चेतना' का प्रतीक है, जबकि हिरण्याक्ष हमारे भीतर छिपे 'अहंकार, लोभ और वासना' का सूचक है। वह गहरा महासागर जिसमें पृथ्वी डूब गई थी, वह कोई साधारण जल न होकर 'भवसागर' यानी 'संसार का अज्ञान रूपी अंधकार' है। जब जीव काम, क्रोध और सांसारिक मोह-माया के जाल में फंसकर अज्ञान के गहरे दलदल में इस कदर डूब जाता है कि उसे बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं सूझता, तब साक्षात ईश्वरीय कृपा (भगवान वराह) चेतना की गहराइयों में उतरती है। वे जीव को माया के बंधनों से मुक्त कराकर पुनः ज्ञान के प्रकाश में ऊपर लाते हैं। इसके अतिरिक्त, शास्त्रों में उन्हें 'यज्ञ-वराह' कहा गया है, जिनके शरीर के प्रत्येक अंग को यज्ञ की विभिन्न सामग्रियों और वेदों की ऋचाओं से जोड़ा गया है। उनके चारों पैर चार वेद हैं, उनके दांत यज्ञ का स्तंभ हैं, और उनका उदर यज्ञ की वेदी है। यह स्वरूप जीवन स्वयं में एक 'यज्ञ' होना चाहिए का संदेश देता है। यानी कि निःस्वार्थ भाव से समाज के कल्याण के लिए कर्म करना ही हमारे जीवन का ध्‍येय होना चाहिए। योग विज्ञान में भी वराह अवतार का संबंध मानव शरीर के 'मूलाधार चक्र' (पृथ्वी तत्व) से है। भगवान वराह रूपी संकल्प शक्ति हमारी सोई हुई ऊर्जा (कुण्डलिनी) पर चोट करती है और उस दबी हुई चेतना को ऊपर उठाकर सहस्रार चक्र (परम ज्ञान) की ओर ले जाती है। यही मोक्ष मार्ग है। यही सद्गति है और यहीं से माया के सभी बंधनों से मुक्‍ति मिलती है।

समानता, समावेशन और नारी गरिमा की पुनर्स्थापना

एक अवतार के रूप में भगवान विष्णु ने सिंह (नृसिंह) या राजा (श्रीराम) का रूप न लेकर एक वन्य जीव 'वराह' (सूकर) का रूप चुना, जिसे समाज आमतौर पर उपेक्षित या अशुद्ध मानता है। भगवान द्वारा यह रूप धारण करने का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश एक यह भी है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई भी जीव, जाति या समाज का कोई भी वर्ग हीन या त्याज्य नहीं है। सभी का अपने काल, स्‍थ‍िति में परिणामकारी महत्‍व है। आज के संदर्भ में यदि देखें तो यह अवतार समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और जातिवाद जैसी कुप्रथाओं पर गहरा प्रहार करते हुए समानता और समावेशिता का पाठ भी पढ़ाता है। यह दर्शाता है कि गरिमा रूप या कुल से अधिक इस बात पर निर्भर करती है कि आपके द्वारा समाज के लिए किए गए महान कार्यों में आप कहां स्‍थि‍त हैं। वहीं, इस कथा का दूसरा बड़ा सामाजिक पहलू नारी अस्मिता और मातृशक्ति की सुरक्षा से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। पौराणिक आख्यानों में पृथ्वी को 'भूदेवी' यानी एक स्त्री और माता के रूप में चित्रित किया गया है। हिरण्याक्ष द्वारा उनका बलपूर्वक अपहरण करना महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों और उनके अधिकारों के हनन को दर्शाता है। भगवान वराह का मुख्य उद्देश्य ही एक असहाय स्त्री (माता पृथ्वी) की रक्षा करना और उन्हें उनका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाना था। यह आज के समाज को सचेत करता है कि महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के लिए पूरी व्यवस्था को हमेशा तत्पर रहना चाहिए। साथ ही, हिरण्याक्ष के अंत का संदेश यही है कि प्राकृतिक संसाधनों (जमीन, पानी, खनिज) पर किसी एक शक्तिशाली व्यक्ति या समूह का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। इन पर समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति का भी समान अधिकार है, जिसका कि बहुत अधिक जिक्र आधुनिक राजनीतिक समय में विचारक, पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय, श्रीराम शर्मा, दत्‍तोपंथ ठेंगड़ी जैसे विद्वानों ने किया है।

पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति का पोषण

यदि हम भगवान वराह के संदेश को वैश्विक पटल पर देखें, तो वे दुनिया के पहले 'पर्यावरण रक्षक' के रूप में सामने आते हैं। जब पृथ्वी पानी में डूब गई थी, तो वह एक प्रकार का प्राकृतिक असंतुलन था, जहाँ जीवन का अस्तित्व ही समाप्त होने की कगार पर था। भगवान वराह ने समुद्र के भीतर जाकर पृथ्वी को बाहर निकाला और उसे एक निश्चित कक्षा और संतुलन में स्थापित किया। इस पूरी प्रक्रिया का संदेश साफ है, यही कि पृथ्वी के पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखना हमारा सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय दायित्व है। यदि मनुष्य अंधाधुंध औद्योगीकरण और प्रदूषण के जरिए धरती का तापमान बढ़ाता रहा और समुद्र का जलस्तर बढ़ता रहा, तो पूरी सभ्यता फिर से जलमग्न हो जाएगी। फिर वेदों का यह महामंत्र कि माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥अथर्ववेद (12.1.12), "पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ", भगवान वराह के कार्यों में साक्षात चरितार्थ होता है। पश्चिमी विचारधारा जहाँ पृथ्वी को उपभोग की वस्तु मानती है, वहीं वराह दर्शन हमें धरती एक जीवित इकाई है का संदेश दे रहा है। वस्‍तुत: जब हम पृथ्वी को माता मानेंगे, तो हम उसका शोषण न कर उसका पोषण करेंगे, जोकि आज के समय में 'सतत विकास' की वैश्विक अवधारणा को बल देता है। भगवान ने एक वन्य जीव का रूप धारण करके यह भी सिद्ध किया है कि इस पृथ्वी पर मनुष्यों समेत जंगलों और मूक पशु-पक्षियों का भी समान रूप से अधिकार है। निश्‍चित ही यह सच ही है कि वैश्विक कल्याण तभी संभव है जब मनुष्य सह-अस्तित्व की भावना को अपनाए।

वैश्विक शांति और भविष्य का शाश्वत मार्ग

ऐसे में अंत में सिर्फ इतना ही कहना है कि भगवान वराह जयंती मानव जाति के सुनहरे भविष्य को सुधारने का एक व्यावहारिक मार्ग है। ऐतिहासिक रूप से भी, भारत के स्वर्ण युग कहे जाने वाले गुप्त काल में राजाओं ने राष्ट्र को बाहरी आक्रमणकारियों से बचाने के संकल्प के रूप में भगवान वराह को अपना प्रतीक चुना था, जिसके साक्ष्य मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित उदयगिरि की गुफाओं की विशाल वराह प्रतिमा में आज भी देखे जा सकते हैं। आज के इस पावन प्राकट्योत्सव पर भगवान वराह का यही मूल संदेश है कि मनुष्य अपने भीतर के भौतिक लालच को मारकर अपनी चेतना को ऊपर उठाए, महिलाओं का सम्मान करे, समाज के शोषित वर्ग को गले लगाए और अपनी धरती माता के पर्यावरण की रक्षा करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस संदेश को अपने जीवन में उतार ले, तो संपूर्ण विश्व में शांति, समृद्धि और प्रकृति का संतुलन पुनः स्थापित हो सकता है। (लेखक केंद्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड की एडवाइजरी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

Related Articles

शिकागो से विश्वमंच तक: जब स्वामी विवेकानंद ने भारत की आत्मा का परिचय दुनिया से कराया

11 सितंबर 1893 को गूंजे वे शब्द, जिन्होंने पश्चिम के सामने भारत की आध्यात्मिक शक्ति का परिचय दिया

Sep 11, 2026

6 सितंबर 1889 : सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शरत चंद्र बोस का जन्म

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इन्ही ने प्रेरित किया था

Sep 07, 2026

जाहरवीर गोगाजी : वीरता, लोकहित और सामाजिक समरसता के लोकनायक

गौ-रक्षा, जनरक्षा और त्याग की ऐसी लोकगाथा, जो सदियों बाद भी राजस्थान की जनचेतना में जीवित है

Sep 05, 2026