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मचकुंड मेला : जहां आस्था और लोक-संस्कृति एक साथ जीवंत होती है

By डॉ. ईश्वर बैरागी September 18, 2026
लेख › समसामयिक
मचकुंड मेला : जहां आस्था और लोक-संस्कृति एक साथ जीवंत होती है
राजस्थान के धौलपुर की पहचान चंबल और लाल पत्थरों से है। इसकी पहचान समृद्ध ऐतिहासिक विरासत से भी है। इसी विरासत में एक नाम तीर्थराज मचकुंड का है। यह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि पुराणों से जुड़ी आस्था का केंद्र है। मचकुंड की धार्मिक स्मृतियां भगवान श्रीकृष्ण, राजा मुचुकुंद और कालयवन की कथा से जुड़ी हैं। इसकी आस्था की परंपरा यहीं समाप्त नहीं होती। सिख परंपरा से भी मचकुंड का गहरा ऐतिहासिक संबंध है। यही विविध धार्मिक स्मृतियां मचकुंड को धौलपुर की विशिष्ट पहचान बनाती हैं। धौलपुर शहर से लगभग चार किलोमीटर दूर स्थित मचकुंड सरोवर के चारों ओर मंदिरों की श्रृंखला है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में इसे तीर्थों का भांजा कहा जाता है। वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना रहता है, लेकिन प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी और षष्ठी को लगने वाला मेला इस प्राचीन तीर्थ को जीवंत लोकपर्व में बदल देता है। मचकुंड सरोवर भारतीय स्मृति में उस कथा का प्रतीक है, जहां युद्ध से थका एक राजा वैराग्य और विश्राम चुनता है, भगवान श्रीकृष्ण अपनी रणनीति से संकट का समाधान करते हैं और अंततः एक अहंकारी शक्ति का अंत होता है। इस पौराणिक कथा के केंद्र में हैं राजा मुचुकुंद। राजा मुचुकुंद मचकुंड की धार्मिक परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण पात्र हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 51वें अध्याय में मुचुकुंद की कथा आती है। शुकदेव जी राजा मुचुकुंद का परिचय देते हुए कहते हैं—
“स इक्ष्वाकुकुले जातो मान्धातृतनयो महान्। मुचुकुन्द इति ख्यातो ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः॥”
मचकुंड मेला : जहां आस्था और लोक-संस्कृति एक साथ जीवंत होती है
अर्थात् मुचुकुंद इक्ष्वाकु वंश में जन्मे और राजा मान्धाता के पुत्र थे। वे महान, धर्मनिष्ठ और अपने संकल्प एवं वचन के प्रति दृढ़ थे। भारतीय पुराण परंपरा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच लंबे युद्ध में राजा मुचुकुंद ने देवताओं की सहायता की। लंबे समय तक युद्ध करते-करते वे अत्यंत थक गए। जब देवताओं ने उनसे वर मांगने को कहा तो उन्होंने भौतिक सुख-संपत्ति के बजाय निर्बाध और गहरी निद्रा का वर मांगा। उन्हें वर मिला कि जो भी उनकी निद्रा भंग करेगा, वह उनकी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा। इसके बाद मुचुकुंद एक गुफा में जाकर सो गए। इसी कालखंड में भगवान श्रीकृष्ण का सामना कालयवन नामक शक्तिशाली योद्धा से हुआ। कालयवन भगवान श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए उस गुफा तक पहुंचा, जहां राजा मुचुकुंद सो रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण गुफा में प्रवेश कर आगे निकल गए। कालयवन ने अंधकार में सोए हुए मुचुकुंद को श्रीकृष्ण समझ लिया और उन्हें पैर से ठोकर मारकर जगाया। मुचुकुंद ने जैसे ही आंखें खोलीं, उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी और वह तत्काल भस्म हो गया। यही कथा मचकुंड की धार्मिक पहचान का केंद्रीय आधार बनती है। स्थानीय परंपरा इस घटना को धौलपुर के मचकुंड क्षेत्र से जोड़ती है। हालांकि पुराण में वर्णित गुफा के आधुनिक भौगोलिक स्थान की पहचान को ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में अलग से देखा जाना चाहिए; धार्मिक परंपरा में मचकुंड को इसी कथा का स्थल माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार मचकुंड का नाम राजा मुचुकुंद से जुड़ा है। उन्हें सूर्यवंशी परंपरा का महान राजा माना जाता है और स्थानीय परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि वे भगवान श्रीराम से अनेक पीढ़ियां पहले हुए थे। यह तथ्य मचकुंड को केवल कृष्ण कथा से ही नहीं बल्कि इक्ष्वाकु-सूर्यवंश की प्राचीन स्मृति से भी जोड़ता है। मान्यता है कि देश के विभिन्न तीर्थों की यात्रा और स्नान के बाद मचकुंड में स्नान करने से तीर्थयात्रा की पूर्णता मानी जाती है। इसी धार्मिक विश्वास के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मचकुंड सरोवर पवित्र तीर्थ है। सरोवर के आसपास अनेक प्राचीन मंदिर हैं। एक धार्मिक स्रोत यहां 108 मंदिरों की श्रृंखला है। एक किलोमीटर की परिक्रमा की परंपरा भी है। मचकुंड का मेला इस धार्मिक विरासत को जनजीवन से जोड़ता है। मेले में आसपास के क्षेत्रों के साथ दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। वे सरोवर में स्नान, पूजा-अर्चना, दीपदान, परिक्रमा और मंदिरों में दर्शन करते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यहां लोकजीवन भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ दिखाई देता है- दुकानें, ग्रामीण बाजार, खान-पान, खिलौने, घरेलू वस्तुएं, धार्मिक सामग्री और लोक-सांस्कृतिक गतिविधियां मेले को जनजीवन के उत्सव में बदल देती हैं। सिख परंपरा से भी मचकुंड का गहरा संबंध है। सरोवर के निकट स्थित ऐतिहासिक शेर शिकार गुरुद्वारा सिखों के गुरु श्री गुरु हरगोविंद साहिब की मचकुंड यात्रा की स्मृति से जुड़ा है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु हरगोविंद साहिब मचकुंड पहुंचे थे। इसी दौरान एक खूंखार शेर से लोगों को बचाने के लिए गुरु साहिब ने शेर का सामना किया। इसी घटना की स्मृति में शेर शिकार गुरुद्वारा स्थापित हुआ। यहां गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश और लंगर की परंपरा भी रही है। भारत में मेला केवल खरीद-बिक्री का स्थान नहीं रहा; वह समाज के मिलने, संवाद करने और सांस्कृतिक स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी रहा है। यह मेले सामाजिक समरसता के बड़े जीवंत केंद्र होते हैं। मंचकुंड मेले की भी यही विशेषता है, यहां आने वाला प्रत्येक जन जात-पांच और उंच- नीच के बंधनों से मुक्त होकर यहां आस्था की डुबकी लगाता हैं। मचकुंड अतीत और वर्तमान के बीच खड़ा वह सांस्कृतिक सेतु है, जो बताता है कि भारतीय परंपरा केवल पुस्तकों में नहीं रहती—वह तीर्थों, मेलों, लोकविश्वासों और जनजीवन में सांस लेती है। मचकुंड की महिमा का बखान करते हुए अनेक ब्रज पदों की रचना हुई है। इन्हीं में से कुछ पद है जो यहां देना प्रासंगिक है-
मचकुंड धाम सुहावनो, धौलपुर की धरती धाम। तीरथ सबको भांजो कहैं, पूजैं सकल जहान॥ मुचकुंद महाराज की, अमर रही है आन। जागे जिनकी दृष्टि तैं, भस्म भयो कालयान॥ कान्हा लीला भूमि यह, पावन भयो मुकाम। कुंड किनारे मंदिरन में, गूंजै हरि को नाम॥ देवछठ को मेला भरै, उमड़ै भक्तन भीर। डूबकी लगावैं प्रेम सौं, पावैं मन को पीर॥ ब्रज, बुंदेल अउ राजपूताना, आवैं धरि विश्वास। मचकुंड की महिमा न्यारी, मिटै मनन की प्यास॥ जाको भाग बड़े होय, मचकुंड आवै धाय। ढोक लगाय मुचकुंद की, मनवांछित फल पाय॥

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